Swargvibha
Dr. Srimati Tara Singh
Administrator

मलेरिया उन्मूलन का मार्ग

 

जनभागीदारी से जनविजय  मलेरिया उन्मूलन का मार्ग

एक मच्छर, लाखों जिंदगियाँ—कब खत्म होगा यह आतंक?

भारत की उपलब्धि, विश्व की उम्मीद  —मलेरिया उन्मूलन का नया दौर

--------------------------------------------------------------------------------


जब दुनिया स्वास्थ्य के एक अहम मोड़ पर खड़ी है, तब 25 अप्रैल—विश्व मलेरिया दिवस चेतावनी और संकल्प दोनों का संदेश देता है। इस वर्ष का थीम “मलेरिया को समाप्त करने के लिए प्रतिबद्ध: अब हम कर सकते हैं, अब हमें करना ही होगा।” स्पष्ट चुनौती है। एनोफिलीज मच्छर अब भी हर साल लाखों परिवारों को प्रभावित करता है। डब्ल्यूएचओ वर्ल्ड मलेरिया रिपोर्ट 2025 के अनुसार, 2024 में वैश्विक स्तर पर अनुमानित 28.2 करोड़ मामले और 6.10 लाख मौतें दर्ज हुईं, जिनमें 94-95 प्रतिशत बोझ अफ्रीकी क्षेत्र पर है। फिर भी प्रगति उल्लेखनीय है: 2000 के बाद से अब तक 230 करोड़ मामले और 1.4 करोड़ मौतें टलीं। 2024 में अकेले 1 मिलियन जीवन बचे और 47 देश तथा एक क्षेत्र मलेरिया-मुक्त घोषित हो चुके हैं। ये आंकड़े केवल संख्या नहीं, बल्कि मानवीय साहस और सामूहिक प्रयासों का प्रमाण हैं। जलवायु परिवर्तन और दवा-प्रतिरोध के बावजूद विज्ञान उम्मीद जगा रहा है—यह लड़ाई जीती जा सकती है, यदि संकल्प दृढ़ और प्रयास सतत रहें।

विश्व पटल पर मलेरिया आज भी गरीबी और असमानता का सबसे कड़ा सच है। 2024 में उप-सहारा अफ्रीका में 26.5 करोड़ मामले और लगभग 5.79 लाख मौतें हुईं। एथियोपिया, मेडागास्कर और यमन जैसे देशों में मामलों में उछाल देखा गया। फिर भी दक्षिण-पूर्व एशिया में सुधार जारी है। भारत ने 2017–2023 में मामले 69 प्रतिशत घटाकर 20 लाख किए, मौतें 68 प्रतिशत कम कीं (2015 से कुल लगभग 80 प्रतिशत कमी)। 2024 में भारत हाई बर्डन हाई इम्पैक्ट समूह से बाहर निकलकर लक्ष्य-सिद्धि का उदाहरण बना। ग्रामीण स्वास्थ्य कार्यकर्ता, आशा दीदियां और नेशनल वेक्टर बोर्न डिजीज कंट्रोल प्रोग्राम जैसे प्रयासों ने यह बदलाव रचा। जलवायु परिवर्तन, दवा-प्रतिरोध, बढ़ता शहरी जलजमाव और फंडिंग की कमी चुनौतियां बनी हुई हैं। अब समय है पुरानी रणनीतियों को नई तकनीक से जोड़ने का।

भारत की सफलता—प्रेरणा का सशक्त स्रोत। आदिवासी अंचलों से महानगरों तक मच्छरदानी वितरण, लार्वीसाइडिंग और त्वरित निदान ने ठोस प्रभाव डाला। 2025 के आँकड़ों में अधिकांश जिलों में स्थानीय संक्रमण नियंत्रित है; 160 से अधिक जिलों ने 2022-2024 के बीच शून्य स्वदेशी मामले दर्ज किए। लक्ष्य स्पष्ट—2027 तक शून्य स्वदेशी मामले और 2030 तक मलेरिया मुक्त भारत। यह केवल सरकार नहीं, हर गाँव, हर स्कूल, हर परिवार की सामूहिक जिम्मेदारी है। युवा स्वयंसेवक ड्रोन से लार्वा नियंत्रण कर रहे हैं, ऐप के माध्यम से लक्षणों की सटीक रिपोर्टिंग हो रही है। जब एक देश इतनी तीव्र गति से आगे बढ़ सकता है, तो दुनिया क्यों नहीं? भारत का मॉडल अब अफ्रीकी देशों के लिए प्रेरक मार्गदर्शक बन रहा है।

सबसे सशक्त कवच—रोकथाम ही किफायती और असरदार उपाय है। मच्छरदानी, इनडोर स्प्रेइंग, स्वच्छता और समय पर जांच-इलाज से 80 प्रतिशत तक मामले रोके जा सकते हैं। नई वैक्सीन आरटीएस, एस और आर-21 बच्चों में गंभीर मलेरिया को काफी हद तक घटा रही हैं—आर-21 ने मौसमी क्षेत्रों में 75 प्रतिशत तक प्रभावशीलता दिखाई है, जबकि दोनों वैक्सीन मिलाकर मौसमी केमोप्रिवेंशन के साथ 75 प्रतिशत तक सुरक्षा प्रदान करती हैं। जीन एडिटिंग, अगली पीढ़ी के कीटनाशक और ड्यूल-एक्टिव इंसेक्टिसाइड ट्रीटेड नेट्स प्रयोगशालाओं से निकल रहे हैं। पर ये साधन तब तक निष्प्रभावी हैं, जब तक अंतिम व्यक्ति तक न पहुंचें। ग्रामीण भारत में अब भी कई जगह जागरूकता की कमी है। स्कूलों में मलेरिया शिक्षा अनिवार्य करनी होगी। हर घर में मच्छरदानी, हर जलस्रोत स्वच्छ—यही छोटे कदम बड़े बदलाव लाएंगे।

इस जंग के असली प्रहरी—समर्पित स्वास्थ्यकर्मी हैं, जो दिन-रात मरीजों की सेवा में डटे हैं। अफ्रीका के सुदूर गांवों से भारत के दुर्गम जंगलों तक वे जोखिम उठाकर निरंतर काम कर रहे हैं। सरकारों को अब बजट दोगुना करना होगा, निजी क्षेत्र को सक्रिय रूप से शोध में जोड़ना होगा। अंतरराष्ट्रीय सहयोग को और सशक्त बनाना अनिवार्य है। जलवायु परिवर्तन मच्छरों का दायरा बढ़ा रहा है, इसलिए पर्यावरण संरक्षण भी मलेरिया नियंत्रण का अहम हिस्सा बन गया है। जब हम सब मजबूती से एकजुट होंगे, तभी यह लड़ाई निर्णायक रूप से जीती जा सकेगी।

अब हर नागरिक की भूमिका निर्णायक और अनिवार्य बन चुकी है। क्या आपने अपने घर के आसपास जलजमाव पूरी तरह रोका? क्या बच्चों को बचाव के प्रभावी तरीके सिखाए? क्या अपने इलाके में सक्रिय जागरूकता अभियान चलाया? छोटे-छोटे कदम—पुराने टायर हटाना, गमलों का पानी नियमित बदलना, मच्छरदानी का सही उपयोग—मिलकर महामारी की रफ्तार थाम सकते हैं। सोशल मीडिया पर प्रमाणिक जानकारी फैलाएं, स्थानीय नेतृत्व से ठोस और त्वरित कदमों की मांग करें। जब हर व्यक्ति सजग और जिम्मेदार बनेगा, तभी मलेरिया का नामोनिशान मिटेगा।

समय का यह निर्णायक मोड़ हमें पुकार रहा है—25 अप्रैल अब महज़ एक दिन नहीं, परिवर्तन का सशक्त बिगुल है। “अब हम कर सकते हैं, अब हमें करना ही होगा” केवल नारा नहीं, सामूहिक संकल्प और प्रतिबद्धता बने। एक ऐसी दुनिया की कल्पना करें जहाँ कोई बच्चा मलेरिया से न मरे, कोई माँ अपने बच्चे को खोकर न रोए। भारत इस दिशा में ठोस और निरंतर कदम बढ़ा चुका है। अब पूरी मानवता को इसी पथ पर संगठित होकर आगे बढ़ना है। आइए, मिलकर मलेरिया को इतिहास के पन्नों में सदा के लिए दर्ज कर दें—ताकि आने वाली पीढ़ियाँ इसे सिर्फ पढ़ें, कभी सहें नहीं।


कृति आरके जैन

सृजनिका

बड़वानी (मप्र)

ईमेल:kratijainemail@gmail.com


Powered by Froala Editor

LEAVE A REPLY
हर उत्सव के अवसर पर उपयुक्त रचनाएँ