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मां की अनकही ममता: नववर्ष का सच

 

मां की अनकही ममता: नववर्ष का सच

[खुशियों की ध्वनि में छुपा मातृत्व का दर्द]

[हर नए साल की रौनक में छुपी अनकही दास्तान]


नववर्ष की रातें अपनी रौशनी से जगमगाती हैं, आतिशबाजियों की रंग-बिरंगी झिलमिलाहट में डूबी हुई। हवा में हंसी और संगीत की गूँज घुल-मिल जाती है, लोग एक-दूसरे को गले लगाते हैं, नए सपनों और उमंगों की शुभकामनाएँ देते हैं। पर इसी चमक-दमक के बीच, एक कोने में बैठी वो अकेली मां, चुपचाप अपने आंसुओं को पोंछती है। उसकी आंखों की नमी किसी क्षणिक दुःख की नहीं, बल्कि जीवन भर के अनकहे त्याग की गहरी गवाही है। वह मां, जिसने कभी अपने बच्चों के लिए नींद का बलिदान किया था, अब जब उसके बच्चे अपनी दुनिया में खोए हैं, उसके घर में केवल एक सन्नाटा है। ये नववर्ष की रौशनी उसके लिए एक कड़वी हकीकत बन जाती है – हकीकत यह कि समय कितनी बेरहम चाल से सब कुछ बदल देता है।

वो मां खिड़की से बाहर झांकती है,  रंग-बिरंगी रौशनियों की झिलमिलाहट में खोई हुई। उसके हाथ में पुरानी तस्वीरें होती हैं—बच्चे छोटे थे, गोद में खेलते थे, नववर्ष के उत्साह में नए कपड़े पहनकर मुस्कुराते थे। बाहर की दुनिया जश्न में डूबी होती है, लेकिन उसके दिल में एक गहरा खालीपन उठता है। बच्चे कभी-कभी फोन करते हैं, जल्दी-जल्दी कहते हैं, "मां, खुश रहो, हम ठीक हैं।" मगर ये जुबान का सुखद अहसास भी झटपट खत्म हो जाता है। मां समझती है—जिम्मेदारियां हैं, करियर है, उनका परिवार है। फिर भी, उसकी आंखों की नमी थमती नहीं। ये नमी उस अनकहे बलिदान की कहानी कहती है, जो उसने कभी किसी से साझा नहीं की। पति साथ छोड़ गए, रिश्तेदार दूर हो गए, लेकिन मां अडिग रही। नववर्ष की यह रौनक उसके लिए एक आईना है, जो उसकी अकेलीपन की गहराई को और उजागर करता है।

सुबह होती है नववर्ष की, लोग नए संकल्पों की बातें करते हैं—स्वास्थ्य, सफलता, यात्राएं। लेकिन उस मां का संकल्प हर साल एक ही रहता है—बच्चे सुरक्षित और खुश रहें। वह मंदिर जाती है, प्रार्थना करती है, और लौटकर घर में वही मौन उसका इंतजार करता है। बाहर की दुनिया नई शुरुआतों से भरी होती है, सोशल मीडिया पर खुशियों की झलकियाँ बिखरी रहती हैं। लेकिन उसके फोन में सिर्फ पुरानी यादें और पुराने संदेश ही बचे रहते हैं। उसकी नमी आंसुओं में बदल जाती है, जब वह सोचती है—कब बच्चे घर लौटेंगे। समाज मां को मजबूत कहता है, लेकिन मजबूती के पीछे का दर्द कोई नहीं समझता। नववर्ष की ये चमक उसके लिए एक व्यंग्य बन जाती है—सारी दुनिया बदल रही है, लेकिन उसका इंतजार जस का तस है। वह इंतजार जो साल दर साल और गहरा होता जाता है।

उस मां की यादें उसे हर पल घेर लेती हैं, जब वह अकेले चाय की प्याली थामे बैठी रहती है। बचपन की वो दौड़-भाग, त्योहारों की तैयारियां, रात भर जागकर बीमार बच्चे की सेवा—सब कुछ फिल्म की तरह आंखों के सामने घूम जाता है। अब घर के कोने-कोने में केवल खामोशी का राज है, दीवारें गवाह हैं उसके अनगिनत त्यागों की। बच्चे दूर शहरों में बस गए, अपनी नई जिंदगियां संवार रहे हैं, लेकिन मां का मन अभी भी पुराने पते पर अटका है। वह सोचती है कि काश एक बार फिर वो हंसी-ठिठोली घर में गूंजे, वो छोटे हाथ उसका आंचल पकड़ें। स्वास्थ्य उसका साथ छोड़ने लगा है, दवाइयां रोज की साथी बन गई हैं, मगर शिकायत किसी से नहीं। नववर्ष की ये रात उसे याद दिलाती है कि जीवन की असली संपत्ति रिश्ते हैं, जो समय की धारा में कहीं बह न जाएं। उसकी नमी में छिपा है वो ममता का सागर, जो कभी सूखता नहीं।

उस मां की रातें अब लंबी हो गई हैं, जहां नींद आती है तो सपनों में बच्चे फिर छोटे होकर लौट आते हैं। वह पुरानी अलमारी खोलती है, बच्चों के छोटे-छोटे कपड़े सहलाती है, जो सालों से वैसे ही पड़े हैं। हर कपड़े में बसी है वो खुशबू—दूध की, मिट्टी की, त्योहारों की। बाहर आतिशबाजी की आवाजें गूंजती हैं, लेकिन उसके कानों में केवल बच्चों की पुरानी हंसी कौंधती है। वह सोचती है कि समय ने कितनी जल्दी सब कुछ छीन लिया—पति की साथ, रिश्तेदारों की चहल-पहल, घर की रौनक। अब केवल कैलेंडर की तारीखें बदलती हैं, मगर उसका दिल उसी पुराने नववर्ष पर अटका है, जब पूरा परिवार एक साथ होता था। उसकी नमी में छिपा है वो अपार ममता का खजाना, जो कभी खाली नहीं होता। नववर्ष की ये चमक उसे बस इतना याद दिलाती है कि जीवन की सबसे बड़ी खुशी साथ में होती है, अकेले नहीं।

फिर भी, उस मां की आंखों में नमी के साथ एक अजीब सी चमक भी होती है। वह चमक उम्मीद की है, विश्वास की है, और अनकहे धैर्य की है। वह जानती है कि उसके बच्चे उसे कभी भूलेंगे नहीं, बस जीवन की तेज़ भागदौड़ में कहीं खो गए हैं। वह खुद को समझाती है, हल्की मुस्कान देती है, और प्रार्थना करती है कि सब ठीक रहें। उसकी नमी में डूबा है वह अपार प्यार, जो समय के साथ भी कम नहीं होता। मां का दिल कभी शिकायत नहीं करता; वह अपनी खुशी को बच्चों की मुस्कान में ढूँढ लेती है।नववर्ष की बाहरी रौशनी क्षणिक है, लेकिन उसके भीतर की रोशनी हमेशा जलती रहती है। उसकी नमी एक मूक प्रार्थना बन जाती है, जो सीधे ईश्वर तक पहुँचती है—बच्चों की सलामती, उनके सपनों की पूर्णता के लिए। इसी नमी में छिपी है वह अदृश्य शक्ति, जो दुनिया की सबसे बड़ी व्यवस्थाओं को पीछे से संभालती है।

और यही वो सच्चाई है जो हमें झकझोरती है। लाखों मांएं ऐसी हैं, जो नई साल की चमक में अकेले अपनी नमी छिपाती हैं। हम जश्न मनाते हैं, लेकिन क्या कभी सोचा कि हमारी सफलता की चमक में मां की वो नमी शामिल है? एक फोन कॉल, एक छोटा सा विजिट, एक गर्मजोशी भरा गले लगाना – ये छोटी चीजें उस नमी को खुशी की चमक में बदल सकती हैं। नया साल सिर्फ कैलेंडर का बदलना नहीं, दिलों का जुड़ना है। उस अकेली मां की नमी हमें याद दिलाती है कि सच्ची खुशी रिश्तों में होती है, चकाचौंध में नहीं। इस नए साल, चलिए संकल्प लें – मां को कभी अकेला नहीं छोड़ेंगे। उनकी आंखों की नमी को हमारी मुस्कान से पोछ देंगे। यही सच्ची नई शुरुआत होगी। 


कृति आरके जैन

बी-87, महावीर नगर, बड़वानी (मप्र) – 451 551 

संपर्क – 79992 40375 (व्हाट्सएप्प)



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