Swargvibha
Dr. Srimati Tara Singh
Administrator

जिस दिन ‘मैं’ से बड़ा हो गया रिश्ता

 

क्षमावाणी — जिस दिन ‘मैं’ से बड़ा हो गया रिश्ता

एक दिन ‘कौन सही था’ से आगे जाना होगा

एक क्षमा, शायद किसी रिश्ते की आखिरी साँस बचा ले

------------------------------------------------------------------------------------------


कुछ रिश्ते टूटते नहीं, बस उनके बीच अदृश्य दीवार खड़ी हो जाती है। उसकी ईंटें अक्सर दोनों तरफ के लोग रखते हैं—एक शब्द इधर से गया, जवाब उधर से आया, फिर चुप्पी और देखते-देखते दूरी बन गई। मनुष्य रिश्ते बनाता है, पर अपनी बात और अहं बचाने में ऊर्जा लगा देता है। यहीं क्षमावाणी कहती है—एक बार अपनी बात नहीं, अपने भीतर को देखो। वह आत्मा से पूछती है—क्या बचाकर रखा है हमने, पुरानी नाराज़गी या कोई अपना? दिगंबर जैन परंपरा में यह आत्मावलोकन, क्षमा और संबंधों में जमी कठोरता को पिघलाने का अवसर है। इसे केवल धार्मिक परंपरा मानना इसके मानवीय अर्थ को सीमित करना होगा। आज मनुष्य को क्षमा से अधिक अपनी प्रतिक्रियाओं से मुक्ति की जरूरत है।

आज हमारे पास संवाद के साधन अधिक हैं, लेकिन सुनने का धैर्य लगातार कम होता जा रहा है। संदेश गलत समझा गया तो मन में गांठ, उत्तर देर से मिला तो शिकायत, प्रशंसा नहीं मिली तो खटास, बात काटी गई तो अहं को चोट और अपेक्षा अधूरी रही तो रिश्ता कटघरे में खड़ा हो गया। छोटी-छोटी घटनाएँ जुड़कर शिकायतों का अभिलेखागार बन जाती हैं, जिसे मिटाने के बजाय हम बार-बार खोलते रहते हैं। क्षमावाणी उसी पुराने अभिलेखागार को साफ करने का अवसर है। वह पूछती है—भीतर आखिर ऐसा क्या जमा है, जिसे हम छोड़ नहीं पा रहे? कई बार थकान परिस्थितियों से नहीं, वर्षों से ढोई जा रही भावनाओं से होती है।

क्षमा का अर्थ यह नहीं कि सामने वाला सही था, अन्याय उचित था या अपनी गरिमा छोड़ दी जाए। क्षमा का गहरा अर्थ है—मैं अपने भीतर किसी दूसरे के व्यवहार को हमेशा के लिए जगह नहीं दूँगा। चोट देने वाला जिम्मेदार था; उसे वर्षों तक ढोना हमारा अपना बोझ बन जाता है। कई बार शिकायत करने वाला आगे बढ़ चुका होता है, जबकि हम उसी घटना को बार-बार दोहराते रहते हैं। वह सामने नहीं होता, फिर भी उसकी कही बात हमारे वर्तमान को प्रभावित करती रहती है। क्षमावाणी पूछती है—क्या हर पुरानी शिकायत को आज भी अपने वर्तमान का हिस्सा बनाए रखना जरूरी है?

सबसे कठिन काम है मन से कहना—“अब छोड़ भी दो।” कहना सरल, करना कठिन। क्षमा माँगने के लिए अहम् को पीछे हटाना पड़ता है। “मुझे क्षमा करें” तभी सार्थक है, जब भीतर से निकले। “मैंने तुम्हें क्षमा किया” तभी अर्थपूर्ण है, जब बदले की इच्छा न हो। इसलिए क्षमावाणी केवल दो लोगों का संवाद नहीं, मनुष्य और उसके ‘मैं’ के बीच की बातचीत है। संघर्ष कई बार दूसरों से नहीं, अपने भीतर से होता है—मैं सही था, मुझे ही क्यों झुकना चाहिए? यहीं ‘मैं’ बड़ा हो जाता है। क्षमावाणी इस ‘मैं’ को मिटाती नहीं, छोटा करती है। ‘मैं’ छोटा होता है तो रिश्तों के लिए जगह बनती है।

हमारी स्मृति विचित्र है। सैकड़ों अच्छी बातें पीछे छूट जाती हैं, लेकिन एक कठोर वाक्य वर्षों तक याद रहता है। किसी की अच्छाई धुंधली पड़ सकती है, पर एक क्षण की कटुता निशान छोड़ जाती है। क्षमावाणी स्मृति मिटाने को नहीं कहती, बल्कि सिखाती है—घटना याद रखो, पर उसका विष मत ढोओ। भूल जाना हमेशा हमारे हाथ में नहीं, लेकिन उस स्मृति को वर्तमान पर शासन करने देना या नहीं, यह हमारे हाथ में है। अतीत नहीं बदल सकते, पर तय कर सकते हैं कि वह आज को कितना प्रभावित करे। क्षमा स्मृति के विरुद्ध नहीं, उस पर अपने अधिकार की घोषणा है। सामने वाला बदले या न बदले, यदि हम अपने भीतर बदलते हैं, तो क्षमा की शक्ति वहीं है।

आज असहमति को दुश्मनी बनने में देर नहीं लगती। विचार अलग हुआ नहीं कि व्यक्ति गलत ठहरा दिया जाता है; बात पसंद नहीं आई तो जवाब देना जरूरी लगता है। हम प्रतिक्रिया देने में इतने तेज हो गए हैं कि उससे पहले विचार के लिए जगह ही नहीं बचती। ऐसे समय में क्षमावाणी सिखाती है—हर बात का उत्तर देना जरूरी नहीं, हर चोट का हिसाब रखना जरूरी नहीं और हर गलती को जीवनभर की सजा बनाना जरूरी नहीं। कभी मौन उत्तर होता है, कभी छोड़ देना स्वतंत्रता। एक क्षण रुकना, क्रोध को पहचानना और तय करना कि इस बात को आगे बढ़ाना भी है या नहीं—यही आत्मसंयम है।

इस बार क्षमा केवल कहने की नहीं, भीतर से निभाने की हो। संदेश भेजने या औपचारिक रूप से “मिच्छामि दुक्कडम्” कहने तक बात सीमित न रहे। उस व्यक्ति को याद करें, जिससे बात बंद है; उस चेहरे को, जिसे देखकर मन सख्त हो जाता है; उस रिश्ते को, जिसमें गलती तय करते-करते रिश्ता पीछे छूट गया। फिर स्वयं से पूछें—क्या मुझे सही साबित होना है या हल्का होना है? सही होना और शांत होना हमेशा साथ नहीं चलते। क्षमावाणी किसी पर उपकार नहीं, अपने भीतर का बोझ उतारने का अवसर है। हमसे भी जाने-अनजाने किसी का मन दुखा होगा और किसी ने हमारा। हम सभी किसी की कहानी में अपराधी भी हैं और आहत भी।

शायद क्षमावाणी का असली अर्थ किसी के सामने हाथ जोड़ना नहीं, बल्कि अपने भीतर जमी कठोरता से हाथ खोल देना है, जिसे हम वर्षों से मुट्ठी में भींचे हुए हैं। कुछ चेहरे, कुछ शब्द, कुछ घटनाएँ हमारे साथ चलती रहती हैं—हम उन्हें भूलना नहीं चाहते, पर हर बार याद करके स्वयं घायल होते रहते हैं। क्षमा उस स्मृति को मिटाती नहीं, उसके भीतर छिपे दर्द से हमें अलग कर देती है। तब समझ आता है कि बीते हुए को बदलना हमारे हाथ में नहीं, लेकिन उसके साथ जीने का ढंग हमारे हाथ में है। शायद क्षमावाणी का सबसे सुंदर क्षण वही है, जब मन किसी दूसरे से नहीं, पहले स्वयं से कहता है—अब इस बोझ के साथ आगे नहीं जाना।


कृति आरके जैन

शिक्षाविद्

बड़वानी (मप्र)

ईमेल:kratijainemail@gmail.com

Powered by Froala Editor

LEAVE A REPLY
हर उत्सव के अवसर पर उपयुक्त रचनाएँ