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जब जिम्मेदारियां अलार्म से पहले जाग जाती हैं

 

जब जिम्मेदारियां अलार्म से पहले जाग जाती हैं

एक स्त्री, कई भूमिकाएँ और अंतहीन अपेक्षाएँ

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·      कृति आरके जैन


सुबह की पहली रोशनी के साथ जब शहर जागता है, तब एक कामकाजी मां पहले ही कई लड़ाइयाँ जीत चुकी होती है। अलार्म की आवाज़ से पहले उसकी जिम्मेदारियां जाग जाती हैं—बच्चे का टिफिन, घर की व्यवस्था, और मन में चलती दफ्तर की सूची। वह आईने में खुद को देखती है, मुस्कान ओढ़ती है और बाहर निकल पड़ती है, जैसे सब कुछ सहज हो। पर इस सहजता के पीछे छिपा है एक कठिन संघर्ष, जहां मातृत्व और करियर के बीच संतुलन साधना रोज़ की परीक्षा बन चुका है। यह संघर्ष दिखाई नहीं देता, पर हर सांस में महसूस होता है।

आधुनिक समाज कामकाजी मां से दोहरी पूर्णता की अपेक्षा करता है। घर में वह आदर्श मां हो, और कार्यस्थल पर समर्पित पेशेवर। इन अपेक्षाओं के बीच उसकी थकान को अक्सर स्वाभाविक मान लिया जाता है। समय उसके लिए केवल घड़ी की सुई नहीं, बल्कि लगातार पीछा करने वाला दबाव है। सुबह से रात तक भूमिकाएं बदलती रहती हैं, पर विश्राम की जगह नहीं बनती। समस्या समय की कमी नहीं, बल्कि उस व्यवस्था की है जो एक व्यक्ति से हर मोर्चे पर उत्कृष्टता चाहती है। जब तक इस सोच को नहीं बदला जाएगा, संतुलन एक चुनौती ही बना रहेगा।

समय प्रबंधन कामकाजी माताओं के जीवन का सबसे जटिल अध्याय है। एक ओर मीटिंग्स और डेडलाइंस हैं, दूसरी ओर बच्चे की ज़रूरतें और परिवार की अपेक्षाएं। इस भागदौड़ में निजी समय सबसे पहले बलि चढ़ता है। नींद कम होती जाती है, और थकान जमा होती जाती है। समाधान केवल अधिक मेहनत नहीं, बल्कि समझदारी से चुनी गई प्राथमिकताएं हैं। डिजिटल टूल्स, साझा कैलेंडर और स्पष्ट सीमाएं दिनचर्या को सरल बना सकती हैं। जब मां अपने समय को महत्व देती है, तभी वह दूसरों के लिए भी बेहतर बन पाती है।

भावनात्मक अपराधबोध कामकाजी माताओं की सबसे गहरी पीड़ा है। दफ्तर में बिताया हर अतिरिक्त घंटा उन्हें यह सोचने पर मजबूर करता है कि कहीं वे अपने बच्चे से कुछ छीन तो नहीं रहीं। समाज मातृत्व को पूर्ण त्याग से जोड़ देता है, जिससे यह अपराधबोध और गहरा हो जाता है। पर सच्चाई यह है कि एक मानसिक रूप से संतुलित मां ही बच्चे को सुरक्षित माहौल दे सकती है। आत्मस्वीकृति, माइंडफुलनेस और अपने प्रयासों को स्वीकार करना इस बोझ को हल्का करता है। जब मां खुद को दोषी मानना छोड़ती है, तभी वह वास्तव में मजबूत बनती है।

करियर की राह पर मातृत्व अक्सर एक अदृश्य दीवार बन जाता है। मातृत्व अवकाश के बाद लौटने पर अवसरों में कमी, क्षमता पर संदेह और धीमी प्रगति कई महिलाओं का अनुभव है। यह धारणा कि मां कम प्रतिबद्ध होती है, वास्तविकता से परे है। मातृत्व महिलाओं को बेहतर योजनाकार, अधिक संवेदनशील और मजबूत निर्णयकर्ता बनाता है। इस अनुभव को कमजोरी नहीं, योग्यता के रूप में देखा जाना चाहिए। मेंटरशिप, नेटवर्किंग और निरंतर कौशल विकास से महिलाएं इस दीवार को तोड़ सकती हैं और अपने लिए नई राह बना सकती हैं।

सामाजिक दबाव कामकाजी माताओं के आत्मविश्वास को लगातार चुनौती देता है। रिश्तेदारों की टिप्पणियां, परंपरागत सोच और अनचाही सलाह उन्हें हर फैसले पर कटघरे में खड़ा करती हैं। यह दबाव उन्हें यह महसूस कराता है कि वे कभी पर्याप्त नहीं हैं। लेकिन यही संघर्ष आत्मबल का स्रोत भी बन सकता है। जब महिलाएं अपनी कहानियां साझा करती हैं और एक-दूसरे का साथ देती हैं, तो यह दबाव कमजोर पड़ने लगता है। सामूहिक आवाज़ धीरे-धीरे सामाजिक सोच को बदलने की ताकत बन जाती है।

लचीली कार्य नीतियां कामकाजी माताओं के लिए संतुलन की मजबूत नींव हैं। घर से काम, फ्लेक्सी टाइम और चरणबद्ध वापसी जैसी व्यवस्थाएं उन्हें निरंतरता देती हैं। तकनीक ने इस संतुलन को और सहज बना दिया है। कंपनियों को समझना होगा कि यह सहूलियत नहीं, बल्कि प्रतिभा में निवेश है। सरकारी स्तर पर समान अभिभावक अवकाश और बाल देखभाल सुविधाएं इस बदलाव को स्थायी बना सकती हैं। जब व्यवस्था सहयोगी होती है, तो महिलाएं निडर होकर आगे बढ़ती हैं।

सपोर्ट सिस्टम कामकाजी मां की सबसे बड़ी ताकत होता है। परिवार, जीवनसाथी और मित्र जब जिम्मेदारियां साझा करते हैं, तो संघर्ष हल्का हो जाता है। डे-केयर, विश्वसनीय सहायक और मानसिक स्वास्थ्य समर्थन इस यात्रा को संतुलित बनाते हैं। साझेदारी का अर्थ केवल मदद नहीं, बल्कि बराबरी है। जब घरेलू जिम्मेदारियां साझा होती हैं, तो रिश्ते मजबूत होते हैं और मां अकेली नहीं पड़ती। यह सहयोग उसे थकने नहीं देता, बल्कि आगे बढ़ने की ऊर्जा देता है।

स्व-देखभाल और आत्मविकास कामकाजी माताओं के लिए विलास नहीं, आवश्यकता है। योग, ध्यान, रचनात्मक रुचियां और सीखने की ललक उन्हें भीतर से मजबूत बनाती हैं। स्वयं के लिए समय निकालना कमजोरी नहीं, दूरदर्शिता है। ऑनलाइन पाठ्यक्रम और कौशल उन्नयन आत्मविश्वास को नया आयाम देते हैं। जब महिला स्वयं को विकसित करती है, तो उसका सकारात्मक प्रभाव परिवार और कार्यस्थल दोनों पर पड़ता है। छोटे-छोटे कदम लंबे समय में बड़े परिवर्तन लाते हैं।

कामकाजी माताओं की यह यात्रा कठिन जरूर है, पर असंभव नहीं। हर चुनौती उन्हें अधिक सशक्त बनाती है, हर समाधान नई दिशा दिखाता है। मातृत्व बोझ नहीं, शक्ति है और करियर सपना नहीं, अधिकार। जब समाज, परिवार और व्यवस्था साथ चलते हैं, तब एक सशक्त मां का निर्माण होता है। और सशक्त मां ही वह आधार है, जिस पर संवेदनशील समाज और उज्ज्वल भविष्य खड़ा होता है। यही संतुलन आने वाले समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है।


कृति आर के जैन

बड़वानी (मप्र)

संपर्क: 79992 40375

ईमेल: kratijainemail@gmail.com

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