Swargvibha
Dr. Srimati Tara Singh
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इस दिवाली आसमान नहीं

 

इस दिवाली आसमान नहीं, अपना नजरिया रोशन कीजिए

उत्सव वही, जो हर जीव के चेहरे पर मुस्कान लाए

जिस खुशी में किसी की आँखें नम हों, वह कैसी दिवाली?

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दिवाली की रात कहीं खुशियों के धमाके गूँजते हैं, तो कहीं यही गूँज खौफ बन जाती है। आसमान में फूटता एक पटाखा किसी बच्चे को माँ की गोद में दुबकने, हृदय रोगी को बेचैन होने, बुजुर्ग को रातभर जागने और बेजुबान जानवर को पलंग के नीचे छिपने पर मजबूर कर देता है। उत्सव का यह अनदेखा दर्द अब शहरों की सोच बदल रहा है। लोग समझने लगे हैं कि अपनी खुशी के लिए दूसरों का सुकून छीनना जरूरी नहीं। यही वजह है कि कुछ परिवार धमाकों के बजाय दीयों की रोशनी, अपनों का साथ और सुकून भरी रात चुन रहे हैं। ‘साइलेंट दिवाली’ का बढ़ता चलन इसी नई संवेदना का प्रतीक है। यह केवल पटाखों से दूरी नहीं, बल्कि दूसरों के दर्द को समझने और उनके सुकून का सम्मान करने की सामाजिक पहल है।

शहरों में बढ़ता शोर सुकून दुर्लभ बना रहा है। हॉर्न, निर्माण कार्यों की ठक-ठक, बाजारों का कोलाहल और मोबाइल की सूचनाएँ सुबह से ही कानों को चैन नहीं लेने देतीं। दिवाली पर पटाखे ध्वनि-प्रदूषण बढ़ा देते हैं। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अनुसार, आवासीय क्षेत्रों में रात का ध्वनि स्तर 45 और शांत क्षेत्रों में 40 डेसिबल से अधिक नहीं होना चाहिए। दिल्ली, पुणे और गाजियाबाद में दिवाली की रात यह स्तर अक्सर 70 से 90 डेसिबल तक पहुँच जाता है। दिल्ली के करोल बाग में 2025 की दिवाली पर 93.5 डेसिबल दर्ज हुआ। एक जोरदार पटाखा 140 से 160 डेसिबल तक शोर पैदा कर सकता है, जो नजदीक से जेट विमान के उड़ान भरने के शोर के लगभग बराबर है। यानी, चंद पलों का मनोरंजन गंभीर ध्वनि-आघात बन सकता है।

पटाखों का शोर थम जाता है, लेकिन उसका असर शरीर और मन पर देर तक रहता है। ध्वनि प्रदूषण दिखाई नहीं देता, फिर भी भीतर तक नुकसान पहुँचाता है। छोटे बच्चों का श्रवण तंत्र अभी विकसित हो रहा होता है, जबकि बुजुर्गों और हृदय रोगियों के लिए अचानक होने वाले धमाके परेशानी बढ़ा सकते हैं। चिकित्सकीय अध्ययन अत्यधिक शोर को तनाव हार्मोन बढ़ने, नींद टूटने और हृदय संबंधी जोखिमों से जोड़ते हैं। इसका असर पशु-पक्षियों पर भी पड़ता है। पालतू कुत्ते-बिल्लियाँ डरकर छिप जाते हैं और पक्षी घबराकर बसेरों से उड़ जाते हैं। अस्पतालों के मरीज बेचैन रहते हैं और परिवार रातभर परेशान होते हैं। आखिर किसी की खुशी दूसरों के स्वास्थ्य, नींद और मानसिक शांति से बढ़कर कैसे हो सकती है?

बदलाव तब आता है, जब लोग नियमों के डर से नहीं, दूसरों की तकलीफ समझकर व्यवहार बदलते हैं। पुणे के कई मोहल्लों में निवासी समूहों ने हाल के वर्षों में शांत दिवाली मनाने का फैसला किया है। किसी ने पालतू जानवरों का डर देखा, किसी ने अस्पताल के मरीजों की परेशानी महसूस की, तो किसी ने धमाकों के बीच बच्चों को कानों पर हाथ रखे पाया। इन अनुभवों ने उन्हें समझाया कि त्योहार की खुशी दूसरों का सुकून छीनकर नहीं मनानी चाहिए। तमिलनाडु के कुछ गाँवों में पक्षियों की सुरक्षा के लिए दशकों से बिना पटाखों के दिवाली मनाई जाती है। वहाँ प्रकृति के साथ सह-अस्तित्व अपनाया गया है। अब शहर भी इसी सोच को अपना रहे हैं और मनुष्यों के साथ पशु-पक्षियों के सुकून को महत्त्व दे रहे हैं।

लॉकडाउन ने शहरों को शांति का महत्त्व समझाया। सड़कें सूनी हुईं, यातायात थमा और बरसों से गूँजता शोर अचानक कम हो गया। लोगों ने महसूस किया कि शांति केवल शोर का अभाव नहीं, बल्कि जीवन की जरूरत है। घरों में रहने के अनुभव ने मानसिक स्वास्थ्य के प्रति भी जागरूक किया। सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों ने इस बदलाव को दिशा दी। पटाखों के इस्तेमाल, समय-सीमा और ग्रीन पटाखों को लेकर नियम बने, लेकिन असली बदलाव परिवारों के फैसलों से आ रहा है। कई घरों में आतिशबाजी के बजाय दीये, रंगोली, फुलझड़ियों और पारिवारिक मेल-मिलाप को प्राथमिकता मिल रही है। कानून पटाखे चलाने का समय तय कर सकता है, मन में संवेदना नहीं जगा सकता। यह काम सामाजिक समझ ही कर सकती है।

शांत दिवाली शहरों को वह सुकून लौटा सकती है, जिसे वे विकास की दौड़ में पीछे छोड़ आए हैं। कल्पना कीजिए, जब बुजुर्ग बेखौफ बरामदे में बैठे हों, अस्पताल के पास रहने वाला मरीज चैन से सो रहा हो, बच्चे दादा-दादी की कहानियाँ सुन रहे हों और पालतू जानवर धमाकों से घबराकर न छिप रहे हों। पड़ोस से हँसी सुनाई दे और बातचीत के लिए आवाज ऊँची न करनी पड़े। यह दृश्य किसी बड़े आयोजन से कम उत्सवपूर्ण नहीं। यहाँ किसी की खुशी दूसरे की परेशानी नहीं बनती। चुप्पी नीरसता नहीं, बल्कि रिश्तों की आवाज सुनने का अवसर है। दीये, घरों की रौनक और अपनों का साथ ही अपने आप में पूरा उत्सव हैं। आखिर दिवाली प्रकाश का पर्व है, पटाखों का शोर उसकी पहचान नहीं।

फिर भी इस बदलाव की राह आसान नहीं है। पटाखों का कारोबार, बाजार का दबाव, बच्चों का आकर्षण और पुरानी आदतें लोगों को पुराने ढर्रे पर लौटाती हैं। कई इलाकों में तय समय-सीमा के बावजूद देर रात तक आतिशबाजी होती है। कुछ लोगों को लगता है कि पटाखों के बिना दिवाली का उत्साह फीका पड़ जाएगा। लेकिन परंपरा का उद्देश्य लोगों को जोड़ना है, डराना नहीं। सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का पालन तभी संभव है, जब नागरिक भी अपनी जिम्मेदारी समझें। मोहल्लों की सामूहिक पहल, परिवारों के छोटे फैसले और बच्चों में संवेदनशीलता जगाने के प्रयास इस बदलाव को स्थायी बना सकते हैं। ‘साइलेंट दिवाली’ अभी हर घर की पसंद नहीं बनी है, लेकिन इसकी स्वीकार्यता बढ़ रही है।

दिवाली की सार्थकता धमाकों में नहीं, उन चेहरों की मुस्कान में है, जिन्हें इस रात सुकून मिले। त्योहार की खुशी दूसरों की शांति छीनकर नहीं, उन्हें साथ लेकर मनाने में है। एक दीया जलाने के लिए किसी के घर की नींद बुझाना जरूरी नहीं। ‘साइलेंट दिवाली’ केवल पटाखों से दूरी नहीं, बल्कि सामाजिक संवेदना और जिम्मेदारी का संकल्प है। शहरों को तय करना है कि उनकी पहचान धमाकों से बनेगी या ऐसी संवेदनशीलता से, जिसमें मनुष्यों के साथ पशु-पक्षियों के लिए भी जगह हो। रोशनी का पर्व तभी सार्थक है, जब उसकी चमक भय नहीं, सुकून फैलाए। दीये हर साल जलते हैं, लेकिन इस बार यदि हमारी खुशी किसी दूसरे के जीवन में भी शांति भर सके, तो वही दिवाली का सबसे सुंदर उपहार होगा।


कृति आर के जैन

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