हिंसा की पौधे हमने बोई, अब फल देखकर हैरान हैं
[बच्चों के हाथ रंगे हैं, मगर दाग हमारे हैं]
[बचपन को चाहिए परवरिश, मिल रही है निगरानी]
हम बच्चों के भविष्य को लेकर बेहद चिंतित रहते हैं। जन्म लेते ही अच्छे स्कूल की तलाश शुरू हो जाती है। फिर कोचिंग, प्रतियोगिता और करियर की दौड़ जुड़ जाती है। मगर इस पूरी कवायद में एक जरूरी सवाल पीछे छूट जाता है—बच्चा अच्छा इंसान भी बन रहा है या नहीं? पंचकूला के एक सरकारी स्कूल में आठ साल के बच्चे ने छह साल की मासूम बच्ची पर ईंट और गमले से हमला कर दिया। घटना सीसीटीवी में कैद हुई तो समाज की नींद खुली। टीवी पर बहसें छिड़ गईं और अखबार चिंता जताने लगे। लेकिन सवाल है कि इतनी कम उम्र में बच्चे के भीतर इतनी हिंसा आई कहाँ से? किसने उसके मन में यह सोच भरी कि किसी को चोट पहुँचाना ताकत है? और हम अब तक क्या करते रहे?
घटना सामने आते ही स्कूल की सुरक्षा व्यवस्था कठघरे में आ गई। कैमरे लगे थे, लेकिन निगरानी कौन कर रहा था? कर्मचारी कितने थे और बच्चों की सुरक्षा का जिम्मा किस पर था? प्रशासन कहाँ चूका? सवाल जरूरी हैं, लेकिन हर बड़ी घटना के बाद हम एक दोषी खोजकर बाकी सबको बरी कर देते हैं। स्कूल पर कार्रवाई होगी, अधिकारी निलंबित होगा, जाँच समिति रिपोर्ट देगी और फिर मामला अगली खबर के नीचे दब जाएगा। मगर उन स्कूलों का क्या, जहाँ रोज धमकियाँ और मारपीट होती हैं? वहाँ न फुटेज सामने आती है, न बहस छिड़ती है। परिवार भी कहकर पल्ला झाड़ लेते हैं—बच्चे हैं, लड़ते रहते हैं। जब तक खून न बहे, हम हिंसा को शरारत मानकर अनदेखा करते रहते हैं।
बच्चों के प्रति घर में भी हमारी जिम्मेदारी कम नहीं है। बच्चा मोबाइल माँगता है और हम थमा देते हैं। वह चुप हुआ तो घर में शांति हो गई। माता-पिता काम में लग गए और मोबाइल उसका साथी बन गया। वह क्या देखता है, कौन-से खेल खेलता है और उसके मन पर क्या असर पड़ता है, इसकी फिक्र किसे है? तकनीक से परिचित कराना और बच्चे को उसके हवाले करना अलग बातें हैं। बच्चा हिंसक दृश्य देखता है, आक्रामक खेल खेलता है और गुस्से भरी भाषा सुनता है। हम नहीं सोचते कि वह इससे क्या सीख रहा है। पंचकूला की घटना में भी आरोपी बच्चे के हिंसक गेम खेलने की बात सामने आई। यह अकेला कारण नहीं, लेकिन सवाल है—बच्चों की डिजिटल दुनिया पर निगरानी कौन रख रहा है?
विद्यालयों में भी स्थिति अलग नहीं है। अनुशासन का अर्थ चुपचाप बैठना और आदेश मानना रह गया है। शिक्षक पाठ्यक्रम, प्रबंधन परीक्षा परिणाम और अभिभावक अंकों की दौड़ में जुटे हैं। इस बीच बच्चे का मन अनदेखा रह जाता है। कोई बच्चा धमकाता है, मारता है या प्रताड़ना झेलता है, तो इसे सामान्य झगड़ा मानकर टाल दिया जाता है। शिक्षक पाठ पढ़ाते हैं, लेकिन बच्चे की मनःस्थिति नहीं समझ पाते। अच्छे अंक लाने वाला प्रतिभाशाली कहलाता है, पर अच्छे व्यवहार को कितनी अहमियत मिलती है? हम गणित के सवाल हल करना सिखाते हैं, गुस्से पर काबू पाना नहीं; आगे बढ़ना सिखाते हैं, हार स्वीकार करना नहीं। फिर बच्चों के व्यवहार पर हैरान होते हैं।
समस्या केवल हिंसा करने वाले बच्चों की नहीं, उसे चुपचाप सहने वालों की भी है। कितने माता-पिता जानते हैं कि उनका बच्चा स्कूल में डर के कारण खामोश रहता है? कितने शिक्षक रोज अपमान झेलने वाले बच्चे की पीड़ा पहचानते हैं? गाँवों और छोटे शहरों में कई घटनाएँ बदनामी या समझौते के नाम पर दबा दी जाती हैं। पीड़ित को ही चुप करा दिया जाता है। परिवार की इज्जत बच जाती है, लेकिन बच्चे का आत्मविश्वास टूट जाता है। दूसरी ओर, हिंसा करने वाले बच्चे को लगता है कि थोड़े शोर के बाद सब सामान्य हो जाएगा। इससे समस्या और गहरी होती है। ऐसे बच्चे की जवाबदेही तय करने के साथ उसके व्यवहार के कारण समझकर सुधार की व्यवस्था भी जरूरी है।
सरकारों का रवैया भी जाना-पहचाना है। घटना होते ही बाल अधिकार आयोग संज्ञान लेता है, शिक्षा विभाग रिपोर्ट माँगता है, पुलिस जाँच करती है और अधिकारी बैठकें बुलाते हैं। फिर कैमरे लगाने, सुरक्षा बढ़ाने और काउंसलिंग के निर्देश जारी होते हैं। कागजों पर सब दुरुस्त दिखता है, लेकिन हकीकत क्या है? कितने विद्यालयों में प्रशिक्षित काउंसलर हैं? कितनों में नियमित मनोवैज्ञानिक परामर्श होता है? कितने शिक्षकों को तनाव और आक्रामकता के संकेत पहचानने का प्रशिक्षण मिला है? कितने विद्यालयों में कैमरों की निगरानी और सुरक्षित शिकायत व्यवस्था है? इन सवालों के जवाब बिना निलंबन और जाँच को समाधान मानना आत्मसंतोष है। सुरक्षा का उद्देश्य सबूत जुटाना नहीं, घटना रोकना है।
बच्चों को अच्छा नागरिक बनाने की जिम्मेदारी भी हम एक-दूसरे पर टालते रहते हैं। माता-पिता स्कूल को, स्कूल घर के संस्कारों को और समाज सरकार को दोष देता है। शिकायतें सबके पास हैं, लेकिन जिम्मेदारी कोई नहीं लेता। बच्चों को उपदेश खूब मिलते हैं, उदाहरण कम। हम चाहते हैं कि वे गुस्सा न करें, लेकिन उनके सामने खुद गुस्से से बात करते हैं। उनसे सम्मान की अपेक्षा रखते हैं, जबकि घर में अपमानजनक भाषा का प्रयोग करते हैं। चाहते हैं कि वे मोबाइल से दूर रहें, लेकिन परिवार का हर सदस्य अपनी स्क्रीन में डूबा रहता है। बच्चों को सीख देने से पहले हमें अपने आचरण की पाठशाला सुधारनी होगी।
पंचकूला की घटना को सनसनीखेज खबर बनाकर भुला देना आसान है। कुछ दिन बाद दूसरी घटना होगी, बहसें होंगी और हम दिनचर्या में लौट जाएँगे। लेकिन बचपन की समस्याएँ बच्चों के मन में गहरी होती जाती हैं। इसलिए कैमरों के साथ घरों में संवाद और विद्यालयों में संवेदनशीलता बढ़ानी होगी। प्रशिक्षित काउंसलर, सुरक्षा निरीक्षण, प्रभावी शिकायत व्यवस्था, शिक्षक प्रशिक्षण और अभिभावक मार्गदर्शन जरूरी हैं। बच्चों को सिखाना होगा कि असली ताकत दूसरों को डराने में नहीं, अपने गुस्से पर नियंत्रण और दूसरों के सम्मान में है। बच्चे अचानक हिंसक नहीं बनते; उनकी परवरिश, शिक्षा और सामाजिक वातावरण भी उनके व्यवहार को गढ़ते हैं। बच्चों का भविष्य वही समाज गढ़ता है, जो आज उन्हें सही दिशा देता है।
कृति आरके जैन
शिक्षाविद्
बड़वानी (मप्र)
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