घर का तापमान: स्त्री के भीतर चलती ऋतुएँ
[घर के उत्थान–पतन में स्त्री की निर्णायक भूमिका]
घर केवल दीवारों और छत से बना ढाँचा नहीं होता, वह एक जीवंत चेतना है, जो प्रतिदिन मनुष्यों के व्यवहार, भावनाओं और निर्णयों से आकार लेती और बदलती रहती है। यह ऐसी व्यवस्था है जो दिखाई कम देती है, पर हर क्षण अपना असर छोड़ती है। इसमें पुरुष और स्त्री दोनों की भूमिका होती है, किंतु यह भी निर्विवाद सत्य है कि घर का सूक्ष्म संतुलन प्रायः महिलाओं के हाथों में रहता है। प्रत्यक्ष रूप से नहीं, किसी अधिकार या आदेश के माध्यम से नहीं, बल्कि अपने स्वभाव, संवेदना और मौन प्रभाव से। वे नेतृत्व का दावा नहीं करतीं, निर्देश नहीं देतीं, फिर भी वातावरण की दिशा अक्सर वही तय करती हैं। यही कारण है कि घर का स्वरूप कई बार स्त्री की मानसिक स्थिति और भावनात्मक अवस्था का प्रतिबिंब बन जाता है।
यह मान लेना भी उचित नहीं कि हर महिला जिम्मेदारी उठाना चाहती है। कुछ स्त्रियाँ उसे स्वेच्छा से स्वीकार करती हैं, कुछ उससे दूरी बनाए रखना चाहती हैं, और कुछ परिस्थितियों के दबाव में उसे ओढ़ लेने को विवश हो जाती हैं। फिर भी सामाजिक ढाँचा ऐसा है कि घर की भावनात्मक ज़िम्मेदारी अंततः उन्हीं के हिस्से आ जाती है। वे चाहें या न चाहें, उनका व्यवहार, उनकी प्रतिक्रिया और उनकी चुप्पी घर के वातावरण को प्रभावित करती है। यह प्रभाव किसी आदेश से नहीं, बल्कि उस अदृश्य उपस्थिति से जन्म लेता है जो दिखती कम है, पर हर क्षण महसूस की जाती है — और चुपचाप घर की दिशा तय कर देती है।
महिलाएँ घर को केवल संचालित नहीं करतीं, वे उसके स्वभाव की रचना करती हैं। वे तय करती हैं कि घर में संवाद बहता रहेगा या चुप्पी जम जाएगी, अपनापन साँस लेगा या औपचारिकता हावी होगी, सहयोग पनपेगा या तनाव फैलता जाएगा। यह सब किसी लिखित नियम या तय व्यवस्था से नहीं चलता, बल्कि उनके रोज़मर्रा के व्यवहार से आकार ग्रहण करता है। एक हल्की मुस्कान, एक तीखा वाक्य, एक मौन ठहराव या एक संवेदनशील संवाद — ऐसे ही सूक्ष्म क्षण मिलकर घर का व्यापक चरित्र गढ़ते हैं। इसी कारण कहा जाता है कि घर का वातावरण प्रायः स्त्री के मन की प्रतिध्वनि होता है।
यह भी उतना ही यथार्थ है कि जब स्त्री पर अपेक्षाओं का भार आवश्यकता से अधिक लाद दिया जाता है, तब यही शक्ति धीरे-धीरे दबाव में बदलने लगती है। समाज उससे हर भूमिका निभाने की आशा करता है, पर उसे चयन की स्वतंत्रता बहुत कम देता है। यदि कोई स्त्री जिम्मेदारी से दूरी बनाना चाहे तो उसे लापरवाह ठहरा दिया जाता है, और यदि वह जिम्मेदारी उठा ले तो उसे स्वाभाविक मान लिया जाता है। यही दोहरा मानदंड घर के भीतर तनाव की जड़ बनता है, जो समय के साथ रिश्तों को भीतर ही भीतर खोखला करने लगता है।
घर को गढ़ना या बिगाड़ना स्त्री के हाथ में है — इस कथन का आशय तभी स्पष्ट होता है जब “बिगाड़ने” के अर्थ को सही संदर्भ में समझा जाए। बिगाड़ना हमेशा टकराव, कटुता या हिंसा का रूप नहीं लेता। कई बार यह भावनात्मक दूरी, उपेक्षा या संवाद के अभाव के रूप में सामने आता है। जब स्त्री भीतर से थक जाती है, सुनी नहीं जाती या उसकी भूमिका को हल्का समझ लिया जाता है, तब वह अनजाने ही घर से अपना जुड़ाव ढीला करने लगती है। यह कमी दिखाई नहीं देती, पर धीरे-धीरे घर की आत्मा को रिक्त करती चली जाती है।
इसके विपरीत, जब वही स्त्री सम्मान, सहभागिता और भरोसे का अनुभव करती है, तो उसका प्रभाव सहज ही चमत्कारी हो उठता है। तब वह घर को केवल सुव्यवस्थित नहीं रखती, बल्कि उसे संवेदनशील और जीवंत बना देती है। वह बच्चों को संवाद की भाषा सिखाती है, बड़ों के भीतर धैर्य का विस्तार करती है और रिश्तों में संतुलन का सूत्र पिरोती है। ऐसी स्त्री आदेश नहीं देती, दिशा सुझाती है; नियंत्रण नहीं करती, समन्वय रचती है। उसका असर शोर में नहीं, स्थायित्व में दिखाई देता है — शांत, पर दूर तक फैलता हुआ। यही वह अदृश्य शक्ति है जो घर को केवल टिकाऊ नहीं, अर्थपूर्ण भी बनाती है।
यह समझना आवश्यक है कि हर स्त्री एक-सी नहीं होती। कोई नेतृत्व करना चाहती है, कोई सहयोग में सहज होती है, और कोई केवल शांति के साथ अपना जीवन जीना चाहती है। कठिनाई तब उत्पन्न होती है जब समाज सभी से एक ही भूमिका निभाने की अपेक्षा करता है। घर तभी संतुलित रह पाता है जब स्त्री को अपनी भूमिका स्वयं चुनने की स्वतंत्रता मिले — जब उसकी इच्छा, उसकी सीमा और उसकी क्षमता का आदर किया जाए। क्योंकि थोपी गई जिम्मेदारियाँ सृजन नहीं करतीं, वे केवल थकान, असंतोष और भीतर की रिक्तता को जन्म देती हैं।
यह स्वीकार करना होगा कि घर का बनना या बिगड़ना किसी एक व्यक्ति की मंशा का परिणाम नहीं, बल्कि स्त्री की भावनात्मक अवस्था से गहराई से जुड़ा होता है। वह प्रत्यक्ष रूप से सत्ता में न होकर भी प्रभाव के केंद्र में होती है। उसकी चुप्पी, उसकी सहमति और उसकी असहमति — सब मिलकर घर की दिशा तय करती हैं। इसलिए यदि समाज सचमुच सुदृढ़ और संवेदनशील घर चाहता है, तो उसे महिलाओं से केवल जिम्मेदारी नहीं, अधिकार और सम्मान भी देना होगा। क्योंकि घर ईंटों से नहीं, स्त्री के भीतर चलने वाले उस संसार से बनता है जो पूरे परिवेश को आकार देता है।
कृति आरके जैन
बी-87, महावीर नगर, बड़वानी (मप्र)
संपर्क – 79992 40375 (व्हाट्सएप्प)
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