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Dr. Srimati Tara Singh
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आँसू जब प्रार्थना बनते हैं — तब माँ बोलती है

 

आँसू जब प्रार्थना बनते हैं — तब माँ बोलती है

[माँ — वह अस्तित्व, जहाँ ईश्वर भी शरण पाते हैं]

[जहाँ शब्द मौन हो जाएँ, वहाँ माँ का प्रेम बोलता है]



संसार की समस्त सृष्टि में यदि कोई शक्ति ईश्वर से भी ऊपर है, तो वह है — माँ की ममता।  वह ममता एक ऐसी दिव्य ज्योति है, जो अंधकारमय युगों में भी दिशा दिखाती है; एक ऐसा असीम सागर है, जिसकी तरंगें हर तूफ़ान को निस्तब्ध कर देती हैं। माँ का स्नेह केवल भाव नहीं — अस्तित्व का मूल मंत्र है; वह अदृश्य धागा, जो गर्भ में जीवन की रचना करता है और मृत्यु के पार भी आत्मा को बाँधे रखता है। जब ईश्वर सृष्टि की रचना करते हैं, तब माँ उसे अपने अंश से पोषित करती हैं। उनकी करुणा में समूचे ब्रह्मांड की शक्तियाँ समाहित हैं; उनका हृदय वह मंदिर है, जहाँ सृष्टि का हर जीव शरण पाता है। माँ वह आदिशक्ति हैं, जिनके आँचल में संसार अपनी पहली साँस लेता है, और जिनकी गोद में अंतिम विश्राम पाता है। देवता भी जिनके चरणों में नमन करते हैं — क्योंकि माँ का प्रेम ही वह परम सत्य है, जो ईश्वर की सृष्टि को पूर्णता प्रदान करता है। 

जन्म के उस अलौकिक क्षण से, जब शिशु की पहली किलकारी माँ के हृदय को स्पर्श करती है, उसी पल माँ का स्नेह एक दैवी चमत्कार बन जाता है। वह नवजात केवल माँ का अंश नहीं — उसकी आत्मा का प्रतिबिंब होता है, जो नौ महीनों तक उसकी धड़कनों के संगीत में पला, उसके रक्त से पोषित हुआ। माँ अपनी रातों की नींद, अपने सुख, अपनी थकान — सब विस्मृत कर देती है; उसकी लोरी में संसार की सबसे मधुर धुन बसती है। बच्चे की एक मुस्कान उसके लिए अमृत का प्याला बन जाती है, और एक आँसू उसके हृदय में समुद्र सी वेदना जगा देता है। माँ की गोद इस धरती का प्रथम स्वर्ग है — जहाँ भय का अस्तित्व नहीं, केवल सुरक्षा की गरमाहट है; जहाँ दुःख नहीं, बस प्रेम की असीम छाया है। यह स्नेह न शब्दों में बँधता है, न समय में थमता — यह उतना ही अनंत है जितना हिमालय की अटल चोटियाँ, जो कभी झुकती नहीं।

माँ का प्रेम जीवन की प्रथम शिक्षा है, जो बच्चे को अस्तित्व का अर्थ सिखाती है। जन्म से लेकर बाल्यावस्था तक वह हर कदम पर साथ होती है — रेंगते शिशु को सहारा देती है, पहला शब्द सिखाती है, गिरने पर आँचल से आँसू पोंछती है। बच्चे की छोटी-सी सफलता पर उसका हृदय गर्व से भर उठता है, और असफलता में उसके आँसू प्रार्थना बन जाते हैं। फिर भी वह कभी श्रेय नहीं लेती; बस मुस्कुराकर कहती है — “तुम खुश रहो, यही मेरी पूजा है।”रातों को जागकर दवा पिलाना, परीक्षा की चिंता करना, दोस्तों के झगड़ों में मध्यस्थ बनना — यही माँ का नित्य धर्म है। वह चट्टान सी अडिग, दीपक सी उजली और सागर सी विशाल होती है। उसके स्नेह से बच्चा सीखता है धैर्य, त्याग और निःस्वार्थता — वे गुण जो जीवन को अर्थ देते हैं। माँ का प्रेम केवल भावना नहीं, यह परिवार की आधारशिला है — जो पिता की मेहनत को दिशा देता है, भाई-बहनों के संबंधों में ऊष्मा भरता है। उसके हाथों से बने भोजन में स्वाद नहीं, आशीर्वाद होता है; त्योहारों की व्यस्तता में उसकी मुस्कान ही घर का उत्सव बन जाती है। जहाँ माँ होती है, वहाँ केवल दीवारें नहीं होतीं — वहाँ घर जीवित होता है, वहाँ हर कोना प्रेम की धड़कन से गूंजता है। 

बेटियों के प्रति माँ का स्नेह अमृत से भी अधिक मधुर और सागर से भी अधिक गहरा होता है। समाज भले कहे कि “बेटी पराया धन है”, पर माँ के लिए वह उसकी आत्मा का प्रतिबिंब, उसकी अधूरी प्रार्थना का उत्तर और उसके अस्तित्व की निरंतरता होती है। बचपन से ही माँ बेटी को न केवल चलना सिखाती है, बल्कि उड़ना भी सिखाती है — किताबों की दुनिया में, खेल के मैदान में, और जीवन के हर सपने में उसका हाथ थामे रहती है। जब विदाई का क्षण आता है, तो माँ की आँखों से आँसू नहीं, बल्कि आशीर्वाद की गंगा बहती है — “हे प्रभु, मेरी बिटिया को सदा सुखी रखना, उसके आँचल में हमेशा मुस्कानें बुनती रहना।” ससुराल की दूरी भी इस प्रेम को कम नहीं कर पाती — फोन पर वही चिंता, त्योहारों पर वही स्नेहभरे उपहार, और हर बात में मायके की एक मधुर छाया। जब बेटी किसी दुःख में हो, तो माँ का एक वाक्य — “सब ठीक होगा, चिंता मत करो” — उसके लिए किसी दैवी वरदान से कम नहीं। यह बंधन केवल भावनाओं का नहीं, बल्कि पीढ़ियों को जोड़ने वाला अमर सूत्र है — वही सूत्र जो बेटी को आगे चलकर माँ बनने की प्रेरणा देता है।

और जब नाती-पोते आते हैं, तो माँ की ममता जैसे पुनर्जन्म लेती है। उम्र की सीमाएँ मिट जाती हैं —फिर लोरियाँ गाती है, पुराने दिनों की कहानियाँ दोहराती है। पोते की मुस्कान में वह अपना खोया हुआ बचपन देखती है, उनकी शरारतों में फिर जीवन का संगीत सुनती है। उसकी दुआएँ अब और विस्तृत हो जाती हैं — “मेरे बच्चों के बच्चे सदा हँसते रहें, सदा खिलखिलाते रहें।” यह प्रेम जीवन को दूसरा वसंत देता है, थकान को ऊर्जा में और अनुभव को आशीर्वाद में बदल देता है। माँ उस कल्पवृक्ष के समान है — जिसकी जड़ें ममता हैं, शाखाएँ संतानों की मेहनत, और फल उसका असीम आशीर्वाद। वह न केवल परिवार को जीवित रखती है, बल्कि उसे प्रेम का जीवंत वृक्ष बना देती है — जो हर युग में अपनी छाँव से जीवन को शीतल करता है।

बुढ़ापे में भी माँ का स्नेह पर्वत-सा अटल और दीपक-सा अविचल रहता है। काँपते कदमों से वह अब भी घर को सँभालती हैं, दर्द में डूबी होने पर भी पहला प्रश्न यही करती हैं — “सब ठीक तो है?” उनकी पीड़ा मौन रहती है, पर चिंता मुखर — यही माँ की सबसे सुंदर परिभाषा है। वह सिखाती हैं कि सच्चा प्रेम वह है जो स्वयं को भूलकर भी दूसरों की खुशी में मुस्कुराना जानता है। माँ केवल एक शब्द नहीं, वह सभ्यता की प्रथम रचयिता  हैं — जिनसे करुणा का प्रवाह, क्षमा का सार और सहानुभूति का अर्थ जन्म लेते हैं। उनका शाश्वत मंत्र — “सर्वे भवन्तु सुखिनः” — सृष्टि के हृदय में पवित्रता भर देता है।

माँ व्यक्ति नहीं, वह भावना हैं — जो नदियों की तरह बहती हैं, सूर्य की तरह आलोक फैलाती हैं। उनका प्रेम हमारी ढाल है, उनकी दुआएँ हमारी अमूल्य पूँजी। जहाँ माँ नहीं होती, वहाँ संसार अधूरा है — जैसे दीप बिना ज्योति, जैसे मंदिर बिना प्रार्थना। आप वह दीपशिखा हैं जो हर अंधकार को आलोक में बदल देती हैं, वह प्रार्थना हैं जो हर संकट को शांत कर देती है, और वह ममता हैं जिसके स्पर्श से मानवता को अपना अर्थ मिलता है। माँ, आपका स्नेह समय की सीमाओं से परे, अनंत और अमिट है — और हमारी कृतज्ञता उतनी ही शाश्वत, जितनी आपकी करुणा।


कृति आरके जैन, बड़वानी (मप्र)


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