मुसाफिरों का अपना घर नहीं होता
Dr K P Sudhanshu
मुसाफिरों का अपना घर नहीं होता,
जैसे जानवरों का अपना पर नहीं होता।
जहाँ शाम ढले, वहीं रात गुज़र जाती है,
हर पड़ाव अपना, मगर सफ़र नहीं होता।
कभी राहें ही अपना पता बन जाती हैं,
हर किसी को मुकम्मल शहर नहीं होता।
कुछ लोग उम्र भर घर की तलाश में रहते हैं,
हर किसी के नसीब में घर नहीं होता।
जो बाँट दे दर्द किसी अनजान राहगीर का,
उससे बढ़कर कोई हमसफ़र नहीं होता।
मंज़िल मिले या न मिले इस ज़िंदगी में,
सच्चा मुसाफिर कभी बेख़बर नहीं होता।
चलते रहना ही उसकी पहचान है प्रकाश
ठहर जाए तो फिर वह मुसाफिर नहीं होता।
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