मेरी मर्जी
◆ कोमल वाधवानी 'प्रेरणा'
“राधा तू बड़ी खुसकिस्मत है री ! तेरा बेटा अलग रैने के बाद भी एक कोस चलकर रोज़ तेरी ख़बर लेने को आता है, वो बी बिना नागा !" कमला मन-ही-मन अपनी ईर्ष्या छुपाए, पर प्रत्यक्ष में मुँह से प्रशंसा के पुष्प झराते बोली।
"सो तो है। पहले मुन्ना पयदल ही चलकर आता था। ये देख मेरा जी दुखता। मेंने मनहिं किया, पर वो नईं माना। बोला अम्मा, तुझे देखे बगैर मुझे चैन नहीं पड़ता।" राधा ने भी जरा इतराते हुए ही जवाब दिया।
"अच्छा, अगर अइसा था तो...तो काहे को अलग हो गया...दूसरा मकान ले लिया...हें ?" कमला की आंखों के सामने अपने बेटे का चेहरा घूम गया, जो 'अब तू मेरा मरा मुंँह देखे' की धमकी देता निकला तो फिर आज तक नहीं लौटा था।
"वो अपनी मरजी से नईं, मेरी मरजी से गया है। मेंने ही उसे अलग घर के लिए राजी किया।" अंदर की बात का खुलासा करते राधा के सुर में भरा गर्वोक्ति का भाव कमला से छुप न सका।
"काहे हो ?" आश्चर्य से फटी आँखों से कमला पूछने लगी, "अपनी आँख के तारे को अपने से दूर करते तेरा कलेजा न फटा ? कित्ती निठुर है री तू...छि:...!"
"अब तोहे का बताऊँ कमला ! मुन्ना की बहू उसे सरवण कुमार...सरवण कुमार...कय रोज-रोज ताने मारे। कलेश से मेरा-उसका जीना दूभर कर देवे। मुन्ना का दुख माँ से कइसे सहन होवे ? ऐं ? तू बता ? सो अलग रैने कू कइना पड़ा।" राधा ने मानो सचमुच चैन की सांँस ली।
"कमला, अब मुन्ना भी सुखी तो मैं भी सुखी ! नईं क्या ?"
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