???? शहर में मां की तकलीफ ????
आसमान में झांकती इमारतें
जब भूल जाती है शहर को
जड़ों से दूर होकर
होने लगता है एहसास अकेलेपन का
दीवारें घूमती दिखाई देती है मां के सपनों में |
दीवारों में कैद मां
एक दिन भी गुजार नहीं पाती शहर में
हंसता हुआ गांव बुलाने लगता है उसको अपने पास
गलियों की परछाई करती है उसका पीछा
अंगुली पकड़ कर जहां चलता रहता है चांद मां के साथ-साथ |
दीवारें डराती है उसे
जब कमरे में कैद मां
दीवारों से करती है सवाल
जानती होती अगर गांव का रास्ता
पैदल ही चली जाती अपने घर
शायद पगडंडी से आता उसे
दिखाई दे जाता अपना बेटा
जो मां को लेने आ पहुंचता
गांव से दूर
शहर की दालान पर |
डर लगता है उसको
कहीं मां गिर न जाए
खेत की मेढ़ से
हो न जाए उसे कुछ
रखता है मां का पूरा ख्याल
इतना मां को याद है
कभी नहीं भूलती गांव की गलियां
गांव के रास्ते
जीवन में चढ़े पहाड़ |
मां का मन नहीं लगता शहर में
साफ झलकती है उदासी उसके चेहरे की
शहर में न ठहर पाने की तकलीफ
उसे तो चाहिए बात करने के लिए
गांव के लोग, अपने खेत, अपनी पगडंडिया, रास्ते सिर उठाए पहाड़
लाठी के सहारे चलते अपने हम उम्र
पिता के साथ का साया |
उसे नहीं पसंद शहर का अकेलापन
दीवारों में कैद होना
भीड़ का अशांत माहौल
गाड़ियों का शोर-शराबा
उसे चाहिए गांव का शांत वातावरण
अपनी जिंदगी के आखिरी दिन बिता सके जहां वह आराम से
जीवन की भाग दौड़ ने उसे बना दिया है असहाय |
जिंदगी खत्म हो जाती है
लेकिन कभी समाप्त नहीं होता मां शब्द
हमेशा बनी रहती है इस दुनिया में मां |
डॉ जयपाल ठाकुर
प्रवक्ता-हिंदी
नालागढ़ हिमाचल प्रदेश
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