अति पावन पर्व है अक्षय तृतीया
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| 5:56 AM (47 minutes ago) | |||
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"न माधव समो मासो न कृतेन युगं समम्।
न च वेद समं शास्त्रं न तीर्थ गंगयां समम्।।"
चूँकि माधव मास का पर्यायवाची वैशाख मास होता है इसलिये उपरोक्त श्लोक का अर्थ हुआ - वैशाख मास के समान कोई मास नहीं है, सत्ययुग के समान कोई युग नहीं हैं, वेद के समान कोई शास्त्र नहीं है और गंगाजी के समान कोई तीर्थ नहीं है।इसलिये वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की अक्षय फलदायी तृतीया, जिसे अक्षय तृतीया माना गया है, के समान कोई तिथि नहीं है ।अब आपकी जानकारी हेतु प्रस्तुत है अक्षय तृतीया से सम्बन्धित न केवल अनेकों में से कुछ रोचक पौराणिक घटनाएं [जो इतिहास के पन्नों में अपना विशेष स्थान बना चुके हैं ] बल्कि सुख-शान्ति, समृद्धि प्रदायक उपाय --
०१] भविष्य पुराण के अनुसार इस तिथि की युगादि तिथियों में गणना होती है यानि सतयुग और त्रेता युग का प्रारम्भ आज ही के दिन हुआ था ।
०२] अक्षय तृतीया के दिन प्रभु विष्णु के 3 अवतारों की पूजा की जाती है । एक भगवान परशुराम, दूसरा नर नारायण और तीसरा हयग्रीव।
०३] एक रोचक तथ्य यह भी जान लें कि प्रभु विष्णु के छठे अवतार भगवान परशुराम उन आठ पौराणिक पात्रों में से एक हैं जिन्हें अमरता का वरदान प्राप्त है और इसी अमरता के चलते ही यह तिथि अक्षय मानी गयी है।
०४] ऐसी मान्यता है कि माता लक्ष्मी और प्रभु श्री विष्णु का विवाह इसी दिन हुआ था।
०५] आज ही के दिन माँ गंगा का अवतरण धरती पर हुआ था यानि भगीरथ जी तपस्या के बाद गंगा जी को इसी दिन धरती पर लाए थे.।
०६] ब्रह्मा जी के पुत्र अक्षय कुमार का अवतरण भी आज ही के दिन हुआ था ।
०७] मान्यता है कि भंडार और रसोई की देवी माता अन्नपूर्णा जिनका दूसरा नाम 'अन्नदा' है, का जन्म भी अक्षय तृतीया के दिन हुआ था।
०८] आज ही के दिन प्रभु महादेव कुबेर की तपस्या से खुश हो ऐश्वर्य का आशीर्वाद दिया जिससे उन्हें माता लक्ष्मी की प्राप्ति हुई ।
०९] कुबेरजी ने भी तुरन्त ही माता लक्ष्मीजी की पूजा इसी दिन से ही प्रारम्भ कर दी,कुबेरजी द्वारा प्रारम्भ की गयी इसी माँलक्ष्मीजी की पूजा की परंपरा के आधार पर ही भारत में अक्षय तृतीया वाले दिन लाल कपड़े में नए बही खाते शुरू किए जाते हैं ।
१०] द्वापर युग में प्रभु श्रीकृष्ण के परम बाल सखा सुदामा अक्षय तृतीया के दिन ही प्रभु श्रीकृष्ण से मुलाकात कर उपहार में उन्हें बड़े ही संकोच के साथ सूखे चावल भेंट किए थे जिसके चलते उनके भौतिक जीवन का उद्धार हुआ।
११] महर्षि वेदव्यासजी और श्री गणेशजी द्वारा इस शुभ दिन से ही महाकाव्य महाभारत के लेखन का प्रारंभ हुआ था।
१२] चीरहरण के वक्त द्रौपदी की पुकार पर प्रभु श्रीकृष्ण ने आज ही के दिन उसे चीरहरण से बचा कर उसकी इज्जत की रक्षा करी ।
१३] अक्षय तृतीया के दिन ही पाण्डव ज्येष्ठ युधिष्ठिर को वरदान स्वरुप वह अक्षय पात्र मिला जिसमें रखी हुई भोजन सामग्रियां तब तक अक्षय रहेंगीं, जब तक द्रौपदी परोसती रहेगी।
१४] अक्षय तृतीया के पावन अवसर पर ही द्वापर युग के साथ महाभारत युद्ध का भी समापन हुआ था ।
१५] प्रसिद्ध पवित्र तीर्थस्थल श्री बद्री नारायण जी के कपाट भी अक्षय तृतीया वाली तिथि से ही दर्शनार्थ खोले जाते हैं।
१६] साल में एक ही बार अक्षय तृतीया के पावन अवसर पर वृंदावन के श्रीबांकेबिहारी जी मंदिर में भक्तों को श्री विग्रह चरण के दर्शन होते हैं अन्यथा बाकी दिनों में पूरे साल चरण वस्त्रों से ढके रहते हैं।
१७] बसन्त पंचमी से प्रारम्भ हुए लकड़ी के चयन पश्चात अक्षय तृतीया वाले दिन से ही जगन्नाथ पूरी में आयोजित होने वाली रथयात्रा की तैयारी बलराम, सुभद्रा और श्रीकृष्ण के रथों के निर्माण के साथ आरम्भ होती है ।
०२] अक्षय तृतीया के दिन प्रभु विष्णु के 3 अवतारों की पूजा की जाती है । एक भगवान परशुराम, दूसरा नर नारायण और तीसरा हयग्रीव।
०३] एक रोचक तथ्य यह भी जान लें कि प्रभु विष्णु के छठे अवतार भगवान परशुराम उन आठ पौराणिक पात्रों में से एक हैं जिन्हें अमरता का वरदान प्राप्त है और इसी अमरता के चलते ही यह तिथि अक्षय मानी गयी है।
०४] ऐसी मान्यता है कि माता लक्ष्मी और प्रभु श्री विष्णु का विवाह इसी दिन हुआ था।
०५] आज ही के दिन माँ गंगा का अवतरण धरती पर हुआ था यानि भगीरथ जी तपस्या के बाद गंगा जी को इसी दिन धरती पर लाए थे.।
०६] ब्रह्मा जी के पुत्र अक्षय कुमार का अवतरण भी आज ही के दिन हुआ था ।
०७] मान्यता है कि भंडार और रसोई की देवी माता अन्नपूर्णा जिनका दूसरा नाम 'अन्नदा' है, का जन्म भी अक्षय तृतीया के दिन हुआ था।
०८] आज ही के दिन प्रभु महादेव कुबेर की तपस्या से खुश हो ऐश्वर्य का आशीर्वाद दिया जिससे उन्हें माता लक्ष्मी की प्राप्ति हुई ।
०९] कुबेरजी ने भी तुरन्त ही माता लक्ष्मीजी की पूजा इसी दिन से ही प्रारम्भ कर दी,कुबेरजी द्वारा प्रारम्भ की गयी इसी माँलक्ष्मीजी की पूजा की परंपरा के आधार पर ही भारत में अक्षय तृतीया वाले दिन लाल कपड़े में नए बही खाते शुरू किए जाते हैं ।
१०] द्वापर युग में प्रभु श्रीकृष्ण के परम बाल सखा सुदामा अक्षय तृतीया के दिन ही प्रभु श्रीकृष्ण से मुलाकात कर उपहार में उन्हें बड़े ही संकोच के साथ सूखे चावल भेंट किए थे जिसके चलते उनके भौतिक जीवन का उद्धार हुआ।
११] महर्षि वेदव्यासजी और श्री गणेशजी द्वारा इस शुभ दिन से ही महाकाव्य महाभारत के लेखन का प्रारंभ हुआ था।
१२] चीरहरण के वक्त द्रौपदी की पुकार पर प्रभु श्रीकृष्ण ने आज ही के दिन उसे चीरहरण से बचा कर उसकी इज्जत की रक्षा करी ।
१३] अक्षय तृतीया के दिन ही पाण्डव ज्येष्ठ युधिष्ठिर को वरदान स्वरुप वह अक्षय पात्र मिला जिसमें रखी हुई भोजन सामग्रियां तब तक अक्षय रहेंगीं, जब तक द्रौपदी परोसती रहेगी।
१४] अक्षय तृतीया के पावन अवसर पर ही द्वापर युग के साथ महाभारत युद्ध का भी समापन हुआ था ।
१५] प्रसिद्ध पवित्र तीर्थस्थल श्री बद्री नारायण जी के कपाट भी अक्षय तृतीया वाली तिथि से ही दर्शनार्थ खोले जाते हैं।
१६] साल में एक ही बार अक्षय तृतीया के पावन अवसर पर वृंदावन के श्रीबांकेबिहारी जी मंदिर में भक्तों को श्री विग्रह चरण के दर्शन होते हैं अन्यथा बाकी दिनों में पूरे साल चरण वस्त्रों से ढके रहते हैं।
१७] बसन्त पंचमी से प्रारम्भ हुए लकड़ी के चयन पश्चात अक्षय तृतीया वाले दिन से ही जगन्नाथ पूरी में आयोजित होने वाली रथयात्रा की तैयारी बलराम, सुभद्रा और श्रीकृष्ण के रथों के निर्माण के साथ आरम्भ होती है ।
१८] आखातीज वाले दिन पितृ-तर्पण करने का भी माहात्म्य है अर्थात पितृ-तर्पण करना अक्षय फलदायी होता है। क्योंकि पितरों के तृप्त होने पर ही घर में सुख-शांति-समृद्धि व दिव्य संताने जन्म लेंगी ।
१९] इसी प्रकार आज के दिन अपने से सभी श्रेष्ठ जनों [ माता-पिता, गुरुजन वगैरह ] का आशीर्वाद अवश्य प्राप्त करना चाहिये क्योंकि उनकी विशेष प्रसन्नता, संतुष्टि व आशीर्वाद का फल भी अक्षय रहेगा।
२०]अक्षय तृतीया जैन धर्मावलम्बियों के महान धार्मिक पर्वों में से एक है। इस दिन जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर श्री ऋषभदेव भगवान,जिन्हें भगवान आदिनाथ भी कहा जाता है, ने एक वर्ष की पूर्ण तपस्या करने के पश्चात इक्षु (शोरडी-गन्ने) रस से पारायण किया था । इसी कारण से जैन धर्म में इस दिन को अक्षय तृतीया के साथ साथ इक्षु तृतीया भी कहते हैं । इसलिये अक्षय तृतीया कहिये या इक्षु तृतीया वाला यह दिन भगवान आदिनाथ, जैनों के पहले भगवान की स्मृति में मनाया जाता है।
इस साल राजस्थान के तीन प्रमुख शहर बीकानेर अपनी स्थापना का ५३९वां जन्मदिन, तो झीलों का शहर उदयपुर इस अक्षय तृतीया को ४७३ साल का हो रहा है। राजस्थान के नागौर शहर की स्थापना महाभारत काल में हुई थी और तब इसे अहिछत्रपुर नगरी के नाम से जानते थे।यहाँ ध्यान देने वाला तथ्य यह है कि नागौर की भी स्थापना अक्षय तृतीया के दिन ही हुयी थी।
अन्त में पाठकों की जानकारी के लिये बताना चाहूँगा कि आखा बीज को बीकानेर नगर की स्थापना हुयी और आखा तीज को पतंगें उडा़कर उत्सव मनाया गया था। इसलिये इन दोनों दिनों परम्परागत रूप से मूँग,मोठ, बाजरे व गेहूँ का खीचड़ा व ठण्डी इमलाणी के साथ साथ चार परतों वाला [फोर फोल्ड] के फुल्के और हरी पत्तियों वाली चन्दलिये की सब्जी बनती है । वहीं अक्षय द्वितीया पर लोग घरों में पूजा करके नई मटकी डालते हैं।यहीं नहीं स्थापना दिवस वाले दिन दिनभर पंतगबाजी का दौर भी चलता है।इन्हीं सब को किसी कवि ने " डागलियै चढ किनो उडासो, मिल सगला रमझोल मचासो, खिचडलो घी भर-भर खासो, इमलोणि रो रस भी पासो, छायी मनडे ऊमंग अपार, आयो आखातीज रो त्यौहार" पंक्तियों के माध्यम से अपनी खुशी ब्यक्त की है।
इस बार बीकानेरवासी अपने नगर का स्थापना दिवस खुसनुमा वातावरण में बड़े ही धूमधाम से मनायेंगे। साथ ही नगर संस्थापक राव बीकाजी की समाधि स्थल पहुँच उनकी प्रतिमा को माल्यार्पण कर याद भी किया जाएगा।
इसलिये स्थापित परम्परा को निभाते हूये मटकी का पूूूजन कर, सर्वेषां मंगलं भूयात् सर्वे सन्तु निरामयाः। सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद् दुःख भागभवेत्।। [– ग. पु. अ. 35.51] के सिद्धान्त अनुसार जहाँ घर, परिवार, कुटुम्ब, बिरादरी, शहर, प्रदेश, भारत देश व विश्व की खुशहाली की प्रार्थना की जा रही है, वहीं खीचड़े, इमलाणी वगैरह का ठाकुरजी को अरोगा कर प्रसाद लिया जायेगा।
अन्त में निष्कर्ष यही है कि यह समय, हमें आत्म विवेचन की प्रेरणा देता है अर्थात अपनी योग्यता को निखारने के साथ क्षमता / सामर्थ्य को भी बढाने के लिये, हर दृष्टि से अतिउत्तम माना जाता है।
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