Swargvibha
Dr. Srimati Tara Singh
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उसने दूध पिलाया है

 

उसने दूध पिलाया है


बाप की लाश घर पर पड़ी और थी और अंतिम संस्कार की तैयारी में जुटा हुआ था। सबको सताना, छीनना, लूटमार और शहर का उच्चकोटि का शराब माफिया था। शासन के सभी लोगों से पूरा

तालमेल था। उसे इतनी फुरसत न थी कि बाप की मौत पर चंद आंसू बहा सके, कभी उसने कोई अच्छा काम भी नहीं किया था, सामान लाया और लाश को अर्थी पर लिटाने तक जब कोई न आया तो उसकी बेचैनी बढ़ गई, उसने 7-8 गंदी गालियां अपने साथियों को दी- साले लूट का माल में हिस्सा लेने चले आते थे, हरामियों को न जाने कितनी बोतलें ऐसे ही पिला दी, सबको एक-एक बाईक दे रखी है- वह सोवने लगा- अर्थी को कंधा देने के लिए कम से कम चार व्यक्ति तो चाहिए ही- वह अकेला तो कंधा देने से रहा। उसने कुछ समय इंतजार किया, इधर-उधर देखा और फिर उसी समय मंडी गया और हाथ ठेला ले आया। उस ठेले पर जैसे तैसे ... अपनी पत्नी को बुला कर पानी मंगवा कर ठेले को धोकर उस पर अपनी पत्नी की मदद से अपने पिता की अर्थी को चढ़ाया और फिर धकेलता-धकेलता स्वयं ही शमशान तक ले गया। जीवन में पहली बार ढेला खींचा .... ।


आज जीवन में पहली बार उसे इस बात का एहसास हुआ कि प्रत्येक व्यक्ति के लिये दूसरे व्यक्ति का कितना महत्व है। समाज में हर व्यक्ति कितना महत्वपूर्ण है, समाज का क्या महत्व है ? अपने इर्द गिर्द रहने वाले व्यक्तियों का, अपनों का क्या महत्व है ? गैंग के लोगों के दिमाग में कितनी मुहब्बत है, जिनके लिये वह सदैव तत्पर रहता था। श्मशान पंहुचा! उसने देखा! यहां पर भयंकर भीड़ है, और बराबर आने वाले साईकिल से और पैदल आ रहे हैं। किसी से उसने पूछा- यह काहे का मेला है, मैं तो पहली बार आया हूँ। ये सब लोग मेरे मुहल्ले के लोग हैं।

मेला नहीं! भाई यह गुड्डू पहलवान के बाप की अर्थी है, आज भी गुड्डू पहलवान की वजह से लोग घर खुला छोड़ कर चले जाते हैं, सबकी मुर्दनी में जाना, अपने पास से पैसा लगाना, छोटे-मोटे गुण्डे उसके डर से इस एरिया में नहीं आते, जब कोई लड़की की शादी गांव में होती है, जूठे बर्तन और सफाई खुद करता है, कचौड़ी-पूड़ी की दुकान है, इतना बिकता है, मगर 9 बजे बंद करके गरीबों को मुफ्त खिलाता है- और हर वक्त कहता है-ऊपरवाला दे रहा है तभी तो हो रहा है-मैं कोई साथ लेकर खुद आया नहीं था।

- आज पूरी सड़क फूलों से लाल है यह बेटे के कर्मों का फल है- और वह आगे बढ़ गये। - वह बाप की अर्थी लिये कुछ देर खड़ा रहा, फिर एक तरफ भीड़ से बचकर निकला और सुनसान जगह पर ठेले पर रखी लाश को रास्ते में जो नदी पर पुल पढ़ता था उस पुल से अपने बाप की लाश को नीचे नदी में गिरा दिया - और फिर सोचने लगा- इससे ज्यादा मैं क्या कर सकता हूँ ? मैंने कुछ बोया ही नहीं- तो फसल कहाँ से होगी।

आज पहली बार- एक पेड़ के तने की आढ़ में वह ऐसा रोया- जैसे कोई बाँध फट गया हो और उसकी आँखों से सारा गंदा खून बह कर निकल गया।- साथ में उसकी पत्नी भी रोने लगी। वह वापस आते हुए सोचने लगा- कि अपने बाप की अर्थी पर चार आदमी भी न जुटा सका। .. और यह सोचते सोचते अपने जीवन को सारे रास्ते घिक्कारते हुए, और लानत है ऐसी औलाद पर उसने दुबारा सर दे मारा, लेकिन तुरन्त उसे एहसास हुआ अभी तो पिता की अर्थी निकली है, अभी तो माँ के लिए भी चार आदमी की जरूरत पड़ेगी और वह अपने घर की तरफ अपनी पत्नी के साथ दौढ़ते दौढ़ते वापस पहुँचा। माँ के पैर पकड़कर रोने लगा, मुझे मारो, खूब मारो, मैं इसी .. ।

- आज वह सोचता जा रहा था माँ की अर्थी के लिये इससे बहुत ज्यादा आदमी होने चाहिए, जिस माँ ने उसे दूध पिलाया है, उसी के खून से तो हूँ मैं इस संसार में, उसका कर्ज भी तो उतारना है, उसने मेरे लिये क्या क्या किया, सब कुछ किया, मगर मैंने उनके लिये कुछ नहीं किया, फिर घार-धार आंसू बहाते हुए, अपने घर को चलते-चलते सोच रहा था- अब अपने जीवन में कुछ ऐसे काम करूँगा जिससे समाज का भला हो, अपना भला तो सभी करते हैं, अपनी कमाई का कुछ हिस्सा समाज के कुछ अच्छे कार्यों में सहयोग के रूप में लगाऊँगा, और तेज-तेज चलने लगा। प्रायश्चित के आंसू ... ।

- और अब वह पहले से काफी बदल चुका था- और उसने निश्चय किया माँ की अर्थी में रास्ते में फूल ही फूल होने चाहिए, खुद भी अचछा जीवन जीओ और औरों को भी प्रेरित करो, और उसने समाज में होने वाले उन सभी उत्कृष्ठ कार्यों में हिस्सा लेना शुरू कर दिया, और अपना जीवन और सुन्दर तरीके से जीने लगा, लोगों के सुख-दुख में खड़ा होने लगा, क्योंकि वह जीवन की इस सच्चाई को अच्छी तरह समझ चुका था .. और यह मानकर चल रहा था, यदि आज हम जीवन में कुछ अच्छा करते हैं तो ऊपर वाला देखता है, वह हमारे लिये अच्छा ही करेगा। ...

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