Swargvibha
Dr. Srimati Tara Singh
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मैं अपना जिस्म बेचकर ...

 

मैं अपना जिस्म बेच कर ...

हाथ में लाल डिब्बा लिये जब वह दरवाजे पर गया, रंग बिरंगी झालरें फाटक की चौखट को घेरे खड़ी थी। आज शांती की वर्षगांठ थी, हमेशा उसके पिता, एक अच्छी सी दावत सी कर डालते हैं क्योंकि उनका बड़ा दबदबा है व तमाम ठेके उन्हीं के नाम से चलते हैं।
राजन उसके घर के पास ही गली के दूसरे मोड़ पर रहता है, उसके साथ खेला भी है व सहपाठी भी है। दोनों एक दूसरे को काफी करीब से जानते हैं और प्यार भी करते हैं। हमेशा की तरह आज राजन आया है, मगर उसके हाथ में सिर्फ टाईप किये पन्नों की गड्डी और उसके ऊपर एक लिफाफा रिबन से बंधा है। उसने अबकी बार यह उपहार खुद उसके हाथ में दिया है, आज उसका चेहरा हमेशा से काफी उदास है, न जाने ऐसा क्यों है?
लोग कहते हैं इधर एक साल से उसे न जाने क्या हो गया है, अपना खत बढ़ाये, एक धारीदार कमीज और पैंट पहने अक्सर मुहल्ले के पास वाले पार्क में बैठा रहता है। कलम से कुछ लिखा करता है। उसने टाइप किये पन्नों से एक और पन्ना निकाला है, जो किसी कापी का मालूम पड़ता है उसमें लिखा है- मुझे 2000 रूपयों की जरूरत है, जो कुछ मेरे पास था- वह मैंने लगा दिया है, मोर्चे पर लड़ने वाले जवानों को यह किताबें भेजनी हैं, उनमें गति भी है, गीत भी है। इन पन्नों को मैंने एक समय खाकर पैसों से टाइप करवाया है। तुम्हें मालूम है- मेरी आर्थिक स्थिति क्या है? मेरा इतना ही लिखना काफी है।
पत्र पढ़ने के बाद शांती की आंखों में कुछ नमी सी आ गई थी, उसे मालूम है उसके बाबू हड्डी को गोस्त के भाव से बेचते हैं, पैसे के लिये कभी-कभी वह जिन्दा हड्डयां भी मंगवा कर रख लेते हैं। यह उनसे कैसे कहें? क्या कहें? राजन की कहानियों एवं गीतों के बारे में वह खूब अच्छी तरह से जानती है। एक दो बार उसके गीत अखबार में भी छप चुके हैं। आज उसने उसके सारे गीत पढ़ डाले थे, कई बार उसकी आंखों से बरबस आंसू भी निकले हैं, वतन के नाम पर उसकी यह कुर्बानियां आज इन पन्नों में सिमटी पड़ी है। उसे छपना चाहिये, छपकर लोगों की आंखों के आगे जाना होगा।
चाहिए। उसने निश्चय किया- आज अपने बाबू से कहेगी, नतीजा जो कुछ भी बाबू भोजन पर बैठे, शान्ती ने कहा-उसे 2000 रूपयों की जरूरत है, सामने वाले राजन को यह किताब छपवानी है। वह अवारा ! जो दिन भर बगल वाले पार्क में बैठा रहता है, तुम्हें क्या हो गया है और उसने तुमसे कहा कैसे? उसने यह पत्र भेजा है, जिसमें 2000 के लिये लिखा है।
उसकी इतनी हिम्ममत, जो तुम्हें इस तरह से पत्र भेजे, मैं कल ही उसको यहां से बंधवा कर दूर भेज दूंगा। बेचारे के पास वैसे ही खाने के लिये पैसे नहीं हैं, जाने किस तरह से अपनी गुजर कर रहा है। आप पहले खुद इनको पढ़कर देख लीजिये। शान्ती बेटी! मैं उसकी सकल से भी नफरत करता हूँ, मेरे सामने बार-बार उसका नाम न लो और वह उठाकर चले गये थे। वह हफ्ता पूरा होते-होते 2000 की शराब पी डालते हैं। सप्लाई विभाग में क्या होता है? कैसे होता है? दुनिया जानती है, मगर जिन्दगी एक ऐसी लम्बी, लम्बाई है, जिसके एक ओर गहरी खाईं और दूसरी ओर ऊँचे पहाड़ हैं। आज के युग में जहां पैसा है वहां शराब की बोतलें भी उन्हें नहीं बहा पाती हैं, जहां नहीं है, छिटाक-छिटाक भर अन्न के लिये लोग तरस रहे हैं। दुनिया में गरीब और अमीर की जोड़ी भगवान ने अपने हाथ से बनाई है।
उसने मां जी से कहा था- राजन को बुला दो। कई बार मना करने पर राजी हो गई है। काफी जिद की है, पर मांजी से बुलाने को राजी हो गई है। उसने राजन को अपने घर बुलाया है, उसे खुद भी अपने आपसे इतनी नफरत हो गई है कि जहां भी कहीं जाता है, अखबार बिछा पर बैठता है, उसने आते ही पूछा-क्या काम है माँ जी? तुमने कुछ रुपयों के लिये शान्ती से कहा था। किताब वगैरह छपवानी थी।
लड़ाई चल रही है, कुछ गीत वगैरह लिखे हैं व दो तीन कहानियां हैं, जवानों को भेज दी जावेगी, उनको ऐसे गीतों की सख्त जरूरत है। तुम्हारे लिये शान्ती के बाबू जी से कहा था, शान्ती ने भी कहा था मगर वह कुछ उल्टा बोलकर चले गये, ये कागज वापस ले जाओ, मेरे पास भी नहीं है, जो मैं तुम्हें दे देती। शान्ती शायद लड़खड़ा कर गिर गई थी, इंसानों के चलते-फिरते यह देर देते हैं।
जब कभी चलते-चलते रुक जाते हैं, तब दूसरे लोग उन पर और कूढ़ा फेंक राजन बोला- मेरे पिता जी ने मुझसे पहले ही कहा था कि ये धंधा तेरी नसल को बरबाद कर देगा। शान्ती ने देखा था-उसकी आंखों के आंसू शायद हमेशा-हमेशा के लिये सूख गये थे। उसे न दर्द होता था, न खुशी थी। ठीक है, ठीक कहते हो, उसने धोती के आंचल से अपनी आंखें पोंछ लीं। रास्ते में गली के मोड़ पर रज्जन बाई का कोठा था, वह पहले भी एक दो बार आ चुका था। सोचा-जब दुनिया के सारे दरवाजे बन्द हो जाते हैं, तब इंसान यहाँ आता है। गम गलत करने के लिये दुनिया यहाँ आती है। रज्जन बाई ने कुछ दिनों से नाचना गाना बन्द कर दिया था, अल्लाह ने जीने के लिये और भी रास्ते बनाये हैं, दो रोटियों के लिये जिस्म बेच ... ।
उसके दिल में एक बात यह बैठ गई थी- कि न जाने कितने लोगों की जिन्दगी बरबाद करने के बाद भी उसे सुकून नहीं मिल रहा है, जरूर कुछ न कुछ उससे भूल हो रही है। दो रोटियों के लिये इतना बड़ा गुनाह उससे कबूल नहीं हो रहा था। उसकी भी तम्मना थी कि मरने के बाद भी लोग उसे याद कर, दुनिया से सब चले जावेंगे, उसे भी जाना है। दरवाजे पर किसी ने दस्त दी। खट-खट .... देखा ! राजन पेट के दर्द से कराह रहा था। दरवाजा खोला राजन को ठीक से बैठाया, राजन कुछ हांफ सा रहा था।
रज्जन बाई! तुमसे कुछ मांगने आया हूँ, मुझे किताब छपवानी है, मुझे दो हजार रूपयों की जरूरत है, गीतों के पन्नों का बन्डल हाथ से छूटा तो-पन्ने बिखर गये। पहले पानी, चाय तो पी लो। मुझे मालूम है कि तुम गीत लिखते हो। तुम्हारे बारे में तुमसे ज्यादा ..... । -उसने कहा। सरहद पर जवानों को भेजना है, हो सकता है, मेरा क्या है? मैं तो ऐसे ही मर जाऊंगा, मुझे कुछ भी नहीं चाहिये। तुम्हें मेरी उमर लग जावे। करोड़ों में कभी-कभी ऐसे लोग पैदा होते हैं, जो अपने मुल्क के लिये इस तरह से सोचते हैं। एक-एक पन्ने को समेटते हुए-वह फफक-फफक कर रो पड़ी। इन्सान जब अन्दर से जागता है तो उसे उजाला ही उजाला दिखाई पड़ता है। तुमने मेरे से पहले क्यों नहीं कहा?
मैंने सोचा था-बाबू जी से मगर उन्होंने शराबी कहकर घर से निकाल दिया। अच्छा ही किया। खुदा को यह नेक काम मेरे हाथ से ही करवाना था। खुदा की ऐसी ही मरजी है, मगर मेरे पास तो इतनी बड़ी रकम है नहीं! फिर कैसे होगा? यह पन्ने एक-एक करके ऐसे ही उड़ जावेंगे। बिखर जायेंगे?
नहीं राजन ! यह मेरी मुट्ठी में आ गये हैं। मैं अपना जिस्म बेचकर तुमको रूपये लाकर दूंगी। तेरी इस सहादत में मेरा जिस्म भी काम आयेगा। आज मुझे अपने जिस्म पर फक्र हो रहा है। आज रात में अल्लाह से इबादत करूंगी, जिस्म बेचूंगी, कला बेचूंगी, पता नहीं ऐसा नेक काम दुबारा मिले या न किले।
इस रास्ते पर जिसने जो किया-खुदा ने उसे कबूल किया है और उसका चेहरा दमदमाने लगा एक बूंद आंखों से निकलकर बाहर आ गई थी। आज उसकी आँखों से खून टपकने लगा, अपने मुल्क के लिये इस देश की औरतों ने क्या नहीं किया है? मैं भी औरत हूँ, पेशा मेरा कोई भी रहा हो, हड्रिडयों में हिन्दुस्तान का ही खून है।
बराती लाल के यहां यूं ही लौड़ी को दौड़ा दिया कि रज्जन बाई तुम्हारे यहां मुजरा करना चाहती है। जब पचासों बार उनके बुलाने पर वह 'न' कर चुकी थी। कोठे पर आना सख्त मना कर दिया था और आज .... ।
कोठी में कोहराम मच गया। लाला बराती लाल के पास यह काम व्यापार का अंग था। खुद भी नेता थे और नेतागिरी को ही व्यापार बना लिया था। औरत के अंगों का प्रदर्शन ही उनका मुख्य व्यापार था, मुजरे करवाना, पार्टियाँ करवाना और उसमें सब लोगों को बुलवाना ... । आज उन्होंने फोन पर फोन करके छः घण्टे में ही सड़क नालियाँ तक साफ करवा दी थीं। सडकों पर पानी छिड़कवा दिया, न जाने कहाँ-कहाँ तक होता आया है।
लाउडस्पीकर बांधे जाने लगे। रूप की नगरी बम्बई में यह कारोबार सदा से शहर के शीर्ष अधिकारी, ऊँचे से ऊँचे आदमी अपनी-अपनी गाड़ियों से आने लगे। कोठी के बाहर गाड़ियों का सैलान आ गया। शराब की खुशबू से आदमी क्या जानवर तक हिनहिनाने लगे। अपनी पूरी उम्र में मुजरे पर ऐसी सजावट रज्जन बाई ने न देखी थी न सुनी थी। सात बजे शाम से बराती लाल ने कार पर कार भेजनी शुरू कर दी थी।
लोगों ने देखा था-रज्जन बाई अपने कोठे पर कुछ खुदा से इबादत कर रही थी-उसने कहा-तुम चलो! मैं आ रही हूँ। नहीं साथ में चलो-उसने कहा। इन्तजार की घड़ियां धक्का-मुक्की और शोर-शराबे के बीच से खत्म हुई तो रज्जन बाई का रिक्शा पहुँचा, बगल में, राजन को थामे बैठी थी। किसी तरह से लोगों ने 'राजन' एक कोने पर बैठा दिया था और वह घुंघरू पहनने अन्दर चली गई थी। लोग कहते हैं- जब वह घुंघरू पहनकर आई थीं उसके चेहरे से रोशनी निकल रही थी, वह इतना खुश थी जैसे वह शादी के मंडप में जा रही हो, बार-बार ये ही सोचती थी। आज मेरे देश को मेरी कला की जरूरत है, मेरे जिस्म की जरूरत है, जब कभी दुनिया में तवायफों का जिक्र आयेगा, मेरा भी जिक्र जरूर आवेगा, मेरी यह सहादत खुदा को कुबूल करनी ही पड़ेगी और उसने नाचना शुरू कर दिया था। तबले सारंगी वाले ठीक से बैठ नहीं पाये थे।
आज उसको न सुर सुनाई पड़ रहे थे, न ताल सुनाई पड़ रहे थे, न उसे कोई दिखाई पड़ रहा था, वह नाचती ही चली जा रही थी, अपने खुदा के सामने वह नाच रही थी। तबले-सारंगी वाले थक-थक कर भागने लगे थे। भीड़ पर भीड़ बढ़ती जा रही थी, तमाम लोग जो फब्तियां कसते थे। एकदम शान्त थे, उसकी सलामती की कामना कर रहे थे। रात एक बजे के आसपास उसको पैर रूके थे, एक पैर के घुंघरू भी टूट कर कहीं छिटक गये थे। दूसरे पैर से खून के धब्बे फर्स को लाल किये जा रहे थे।
उसने सामने दीवार पर लगे खुदा के चित्र को आदाब किया और राज को पुकारा। उसकी निगाह जब फर्श पर पड़ी थी, उसने देखा था-फर्श पर नोटों की तह के ऊपर वह खड़ी थी। राजन भइया! दो हजार रुपए गिन कर उठा लो! और सबको हाथ जोड़कर खड़ी हो गई थी।
यह मैंने अपने लिये नहीं किया है, यह पैसा मेरा नहीं है, खुदा के हुक्म से अपने देश के लिये किया है, राजन को गीतों को छपवाकर सरहद पर नौजवानों को भेजना है, उसी के लिये दो हजार ले जा रही हूँ। बाकी पैसा सरहद के नौजवानों की विधवाओं में बटवा देना और वह घुंघरू उतारकर, वहीं छोड़कर राजन के साथ चल दी थी।
लोगों ने देखा था जिन्दा लाशें बेचने और खरीदने वालों को आज रज्जन बाई ने पूरा का पूरा खरीद लिया था। लाला बरातीलाल जड़ बनकर वहीं फर्श पर बैठ गये थे। वह इस तरह से रो रहे थे, जैसे-उनके अन्दर का कुछ मर गया हो। ये दोनों, अपनी कला बेंचकर देश के लिये अपनी कुर्बानी दे रहे हैं, मेरा ऊपरवाला क्या करेगा? मैं इस गुनाह की सजा कैसे पूरी करूंगा। मेरे भगवान मेरा क्या होगा? और फफक कर रोने लगे थे। भगवान मेरा क्या होगा?
कहते हैं! उन्होंने रात में ही सारी शराब की बोतलों को सड़क पर फिकवां दिया था, कमरे से सारे झाड़ फनूस उतरवा कर बाहर फिकवा दिये थे। उन्होंने सोचा था इस हाल में बैठकर नहीं करेंगे। रज्जन बाई की एक फोटो लगायेंगे।
आज थोड़ा समय गुजर गया है, लोग कहते हैं उसकी कुर्बानियों की याद आते ही, रज्जन के गीतों की धुन बजने पर सरहद के जवानों के अंग अपने आप फड़कने लगते हैं। रज्जन बाई का जिक्र आते ही लोगों की आंखें नम हो जाती हैं। लाला बराती लाल की उस हवेली में सत्संग भजन चलता है, भीड़ उतनी है, लोगों की शक्लें वैसी ही हैं, केवल विचारों का फर्क है। रज्जन बाई भी कभी-कभी आती हैं, उनके स्वागत में लोग उन्हें रंजना जी, रंजना जी, कह कर घेर लेते हैं। भजन कीर्तन मजलिसों का दौर चलता रहता है।
जो लोग दूसरों के लिये जीते हैं दूसरों के लिये मरते हैं-उनकी कुर्बानियों पर भगवान और इंसान दोनों आंसू बहाते हैं। लाला बराती लाल भी लोगों को अपने हाथ से जल पिलाते हैं, लोगों के जूतों को उठाकर अलमारी में लगाते हैं-जब इंसान अन्दर से जागता है, उजाला अपना दामन फैलाकर उसके सामने खुद खड़ा हो जाता है। रज्जन बाई भी इस काम में उनका हाथ बटाती है। रज्जन के गीत बजते हैं। भजन सत्संग और मजलिस भी चलती है।


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