Swargvibha
Dr. Srimati Tara Singh
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ये सत्य ही नहीं परम सत्य है

 

ये सत्य ही नहीं परम सत्य है


अपनों और सांस्कारिक व्यक्तियों को प्रसन्न करना - पत्थर पर दूब उगाना जबकि परमात्मा को प्रसन्न करना - उसके स्मरण में दो अश्रु बहाना काफी है। परमात्मा ने मानव को आकृति के रूप में बनाया, हमने इसका क्या किया ?- भोग विलास में अति धन के आगमन से, विलासी, घृणित एवं रोगी बनाकर या, सुधार कर, बिगाड़ कर, या स्वस्थ रक्खा-विचार करते रहें, कभी पूर्ण पतन न होगा। मनुष्य के चोले में- मनुष्यता, मानवता, छमा एवं परोपकार की भावना नहीं-फिर भी 'मानव' हैं, इससे बड़ा घोखा क्या हो सकता है धोखा देते रहते हैं खाते रहते हैं, धोखा खाते रहते और एक दिन चले जाते हैं। आना-और जाना परमात्मा की प्रकृति का क्रम है-मगर हम अपने को जीवन अवधि में अच्छा बना लें, अपने कर्मों से अपने को अमर बना लें-ये हमारे हाथ में है।

व्यभिचारी, घूसखोरी का पैसा भी प्रारब्ध से आना था निश्चित है- वह सत्यता से भी आता- मगर हम जैसा रास्ता बनाते हैं, पैसा उसी रास्ते से आता है- यह हमारे ऊपर निर्भर है। अति धन, रूप, मान, पद, गुण मनुष्य को प्रायः पतन की ओर ही ले जाते हैं। जो मानव इनका सदुपयोग कर परोपकार में लगा दे वही वीर हैं, वो परम भगवतकृपा पात्र है। सदाचार, ईमानदार एवं भगवतभक्त ही बड़ी से बड़ी विपत्ति को आसानी से झेलने में समर्थ है। मेरा तन, मन और धन सदाचार परोपकार, एवं सद्विचार में लगें-बस ! प्रभु से यही प्रार्थना है।

संसार में कौन किसे सुख देता है, कौन किसे दुःख देता है ? कौन किसका मित्र है, कौन किसका शत्रु ? यथार्थ में - अपने किये हुए कर्म से ही सुख और दुःख की उत्पत्ति होती है। कितना भी बड़ा धनवान, रूपवान या गुणवान या कुछ भी हो चरित्रवान नहीं हो एक दिन विनाश निश्चित है। वो कितना भी दरिन्दा हो यदि चरित्रवान है तो एक दिन उच्च शिखर पर पहुँचना निश्चित है। जो शक्ति को बल पर विजय प्राप्त करता है, वो शत्रु पर अपूर्ण विजय ही प्राप्त करता है। अपितु प्रेम के दो मीठे बोल से पूर्ण विजय प्राप्त हो जाती है। प्रेम और एहसान से मरा व्यक्ति पूर्ण रूप से मर जाता है- जबकि शस्त्र से मारा केवल शरीर से ही मरता है। बुराई करने वालों के विषय में बुरी बात मत सोचें, वे नदी के तट पर उगे वृक्ष की तरह स्वयं नष्ट हो जायेंगे।

जब तक हम अपने सुख और आवश्यकताओं का ब्योरा नहीं बनाएंगे और सुखी होने का अहसास नहीं करेंगे! तब तक हम कभी सुखी नहीं रह सकते। बगैर लक्ष्य निर्धारित किये कभी लक्ष्य तक नहीं पहुँच सकते- कारण मंजिल पर पहुँचने के बाद भी हम भटकते ही रह जायेंगे। प्रसन्न रहें! ये प्रभु की साक्षात् कृपा होगी। दुःख का मूल कारण यदि जीवन में कोई है तो वो है हमेशा दूसरे से अपेक्षा का भाव, और हम उसी में सुख ढूंढते हैं क्योकि हमें उसमें सुख की आशा दिखती है, और जब वो अपेक्षा रूपी आशा जिसमें हम सुख ढूंढ़ रहे होते हैं वो पूरी नहीं होती हम दुःखी होने लगते हैं। अपने हैं, रिश्तेदार हैं, सम्बन्धी हैं- यह सत्य दिखाई देता है, परन्तु इस सत्यृ को भी समझना होगा कि मृत्ये के बाद कोई किसी का नहीं होता और न ही कभी किसी का था, न हो सकता है- यही जीवन का परम सत्य है।

इस संसार में आये हैं, मानव जन्म मिला है, पूरे संसार में रहें, सांसारिक प्राणियों के बीच रहें, सांसारिक पारिवारिक, कार्यों को अच्छे से सम्पन्न करते हुए, माया के थपेड़े खाते हुए, अपने इस शरीर को इस संसार में रखें- मगर अपना मन उस परमपिता परमेश्वर में लगायें, उसको हमेशा अपने इर्द गिर्द महसूस करते हुए कर्म करें और ये मानकर चलें वह लाखों आँखों वाला हम को देख रहा है और जब उसका ध्यान निरन्तर ध्यान सुमिरन करते हुये कर्म करेंगे तो हमसे गलत काम नहीं होंगे- अर्थात प्रभु का साथ ऐसे जैसे जड़- संसार में कमल की भांति नाल परमात्मा की गोद में।

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