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Dr. Srimati Tara Singh
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संस्कारी बनें! जो बोया उसी को काटना पड़ेगा

 

संस्कारी बनें! जो बोया उसी को काटना पड़ेगा


58 वर्षीय सोनकर जी नगर महापालिका में काफी अच्छी पोस्ट पर थे 3 लड़के, 2 लड़कियां, सब ठीक चल रहा था, उठक-बैठक, गलत लोगों के सन्सर्ग से पहले शराब, फिर जुए, फिर लड़के को विधायकी लड़ाने का शौक पैदा हो गया, लड़के सब लम्बे-चौड़े, दबंग थे, कोई व्यापार था नहीं था, यहाँ बैठना-वहाँ बैठना, पुलिस के मुखबर और तमाम छोटे लोगों का पैसा लेकर काम करने लगे, फिर बड़े-बड़े काम सोनकर जी से मिलकर काम करवाने लगे।

सोनकर जी का सीना 60 इंच, और आस पास ख्याति बढ़ने लगी, खुश होकर उन्होंने लड़कों को अपने प्रभाव से लाइसेन्सी पिस्टल दिला दी। शादी-ब्याह के सम्बन्ध आने लगे-बोले-विधायक बन जायेंगे, तब करेंगे। लड़कियां भी अपने हिसाब से आने जाने लगीं। पुराने साथी लोगों ने समझाया, लडकों को अपने प्रभाव से सरकारी नौकरी, लड़कियों की शादी करी, मगर नये मित्रों ने नेता गिरी समझाई।

एक छोटा सा ग्रुप बना कर नामी पार्टी का टिकट दिला दिया। घर पूरा दारू का अड्डा और सभी मेल के लोग आने लगे, पत्नी ने भी समर्थन कर दिया, सब मेल का भोजन और यार दोस्त! पिस्टल लगाये घूमना और सब पर रुआब झाड़ना। हर दिन जरा दूर मोहल्ले के लड़कों से मामूली कहासुनी होने के बाद, झगड़ा और फिर गोली चल गई और चार-पांच लोग मर गये। तीन उधर के ओर दो इधर के। एकाएक सोनकर जी आये-एक गोली उनको पड़ गई। सब जेल में बन्द हो गये, सोनकर जी अस्पताल चले गये।-

पुराने मित्र मिलने आये, सबसे पहले सवाल खड़े हुए- आपने लड़कों को क्यों पिस्टल दिलवाई, आपने खुद ही ऐैसा बीज डाला, आपने कुछ तो अपने परिवार की तरफ देखा होता, आप तो बुजुर्ग हैं और पूरे परिवार के रक्षक हैं, आपने अच्छे संस्कार देने की जगह यह क्या दिया ? कुछ दिन के बाद उनकी मृत्यु हो गई- मालूम पड़ा, दो लड़के जेल में बंद हैं, लड़कियां अपने-अपने हिसाब से चली गईं। जीवन सबका नर्क हो गया।

मुकदमे बाजी में सब खतम हो गया बस! एक चर्चा यह बाकी है- 'जो बोया-वह काट लिया'- संस्कार थे ही नहीं ऐसी बुद्धि उपजी, परिवार नष्ट हो गया। - इसलिये हर समय स्वयं भी सावधान रहें! और औरों को भी सावधान करते रहें, कि हमसे जीवन में कोई ऐसा कार्य तो नहीं हो रहा, जिससे हमारी आने वाली औलादें उन परिणामों को भोगें जो गलतियां हम जीवन में कर आये। सतर्क रहें! सावधान रहें!

संस्कारवान बनें! हर समय परमात्मा के सान्निध्य में रहें। परमात्मा का सान्निध्य बना रहेगा, तो जीवन में कम से कम गलतियां होंगी और आपका जीवन सफल होगा। परमात्मा किसी को सुख-दुःख नहीं देता, हमारे कर्म, हमारी सोच से जो कार्य होता है- उसी का प्रतिफल दैनिक जीवन में होता है।- मानो शराब, गुटखा एवं अत्यंत पान, नानवेज या दुष्कर्म, अनैतिक काम का प्रतिफल प्रकृति किसी न किसी रूप से मनुष्य को अवश्य मिलता है। आवरण ठीक नहीं होने से, गृह कला व सब प्रकार की समस्यायें पैदा होना, बीमारी आना, बच्चे बिगड़ जाते और पता नहीं कौन सी विपदा आ सकती है।- समझते रहें सतर्क रहें, सदाचारी बनें, सुखी रहें ....

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