Swargvibha
Dr. Srimati Tara Singh
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रंग उत्तर गया, मैंने दुबारा भर ...

 

रंग उत्तर गया, मैंने दुबारा भर ...


एक सलवार सूट लेना है, साल भर का बच्चा गोदी में लिये- जरा कम दाम का

लेना है- और वह राजन की दुकान पर नीचे पटरे पर बैठ गई। घर पर कोई, है नहीं,

सिर्फ पापा हैं, जरा जल्दी निकाल दो।

24 साल की उम्र, चेहरे पर लावण्य टपक रहा था, वक्त के तूफान ने प्रकाश का

एक्सीडेंट और उसको विधवा बना दिया था। वक्त के थपेड़े खाई बच्ची को बेंच पर

बिठाने लगी।

ऊपर आकर से ठीक से बैठो, काफी दिन के बाद आई हो। पिताजी से कितना

तुम्हारे लिये कहा था मगर मोटी रकम और वह भी चले गये और मैंने आज तक शादी

नहीं की ...... और आंखें मलने लगे। गद्दी से उठकर बढ़ा .... । राजन बोले।- नीचे

तक उतर आये।

उसने बच्चे के लिए बिस्कुट मंगाये और सर पर हाथ फेरा-बहुत भाग्यवान है,

तुम्हारा घर भर देगा। घर है ही नहीं, जो भर जायेगा, कुछ नहीं है। रोली ने कहा। सब

खत्म हो चुका है, मैं और ये लड़का, बस कुछ नहीं।

रोली एकाएक फफक कर रो पड़ी-जो भाग्यवान होते हैं- वह बड़े लोगों के यहाँ

पैदा होते हैं। पैसा होता है तो शादी ...... आज तक एक सलवार ... फिर बुक्का मार

कर रोने लगी। तुमने पहचान तो लिया यह क्या कम है। बुरे वक्त में कोई काम किसी

को नहीं पहचानता है। रोली ने कहा। मेरे कर्मों के हिसाब से मेरा और 'इसका' होगा।

मैं ऐसा ही भाग्य लेकर आई हूँ, बस ऐसा ही भाग्य ... और आँसू।

लाओ। रंग तो देख लूं। लाल, नारंगी न देना-पापा ने मना किया है। रोली बोली!

रंग तो मैंने पसंद कर के दिया है तुम्हें पसंद करने की अब कोई जरूरत नहीं। मैं कल

आऊँगा। राजन ने कहा। बस तुम ले जाओ और पहनो। ....

ले आई! बहुत देर लगा दी, लाओ देखें।- पापा बोले।

अरे ये क्या? लाल रंग। तेरे को मना किया था-ये तो कम से कम 1400/- रुपये

का है। तुझे 250/- रुपये दिये थे। और दो चार चाँटे उन्होंने अपने गाल पर जड़

दिये। .... और रोने लगे, तू! कहाँ चली गई थी ? कुछ गलत हो गया है ... और वह

बोले-जब तुम्हारा ही कोई रंग नहीं है-फिर तुम्हें रंगों में क्या लेना-देना। मेरी मरजी

का पहन लो, तुम्हारे ऊपर सिर्फ ये ही अच्छा लगेगा, और वह रोने लगी।

दूसरे दिन शाम को राजन आया, पापा सो रहे थे, रोली बच्चे को दूध पिला रही है।

राजन तुम् एकाएक हड़बड़ा कर बैठे कैसे, कैसे,

250/- रुपये का लिफाफा वापस किया, आशीर्वाद दीजियेगा बाकी मेरे पास सब

है। पैरों पर रख दिया।

सूट का रंग मैंने खुद पसंद किया है, ये नहीं ले रही थी, पापा जी, आज के बाद

सलवार सूट क्या सब कुछ ये मेरी पसंद से पहनेगी।

पापा जी रंग उतर गया था, फिर से चढ़ गया, ये रंगों का खेल है, पहले पैसे ने

अपना रंग दिखाया और अब भाग्य ने अपना काम दिखाया। बस आपका आशीर्वाद

चाहिए, बाकी ईश्वर की कृपा से सब मेरे पास है।

पापा जी ने फिर से एक बाद बिहारी जी की फोटो को घूर-घूर कर देखा। दूर बैठे

सारे भोले-भाले लोगों की परेशान करते हैं। अब कौन सी लीला कर रहे हो, इतने जोर

से टांग जमीन पर पटकी कि दो जगह खून निकलने लगा। पापा जी दो-तीन दिन में

घरवालों को लाकर रोली को ले जाऊँगा। बचपन से सोचता था, जीवन में एक काम

ऐसा जरूर करूँगा कि जब ऊपर वाले से सामना हो तो वह अपने बगल में ही बिठाये।

आज बिहारी जी ने इच्छा पूरी कर दी।

घर गया। माँ को बताया-माँ का कलेजा धक से रह गया। मगर वह तो विधवा है,

माँ जी बोली।

माँ जी ये वही रोली है, जो घर में आती थी तुमको खाना नहीं बनाने देती थी, तुम

कहा करती थी-मैं तुम्हें हमेशा इस घर में रखूँगी और गाल पर इसके थपकी भी लगा

देती थी। माँ जी मैंने कुछ जोड़ा है, एक अच्छा काम किया है। आज से ये तुम्हारी बेटी

और बहू भी है। माँ जी ने अपने पैर आगे बढ़ा दिये और पोते को छाती से लगा लिया,

यह सोचकर- आज मेरी कोख धन्य हो गई, और मैं भी धन्य हो गई, ऐसी कोख से

जन्मे बच्चे ही ऐसा काम कर सकते हैं। मैं एक माँ हूँ और माँ के पास प्यार और

आशीर्वाद के अलावा कुछ नहीं होता।

सुहाग का रंग भरा है।

माँ ने अपनी ओढ़नी उसके सर पर डाल दी- यह मेरा आशीर्वाद है, आज से तू मेरी

छत्रछाया में है। दुनिया में आये हैं, पता नहीं किससे संयोग होगा, किससे वियोग होगा, उस

पर छोड़ दें। भगवान को ढूंढ़ना और उसके लिए हर समय कंठी घुमाना पुण्य तो मिल

सकता है आशीर्वाद नहीं।

सारा कार्यक्रम समिति के सहयोग से एवं कल्याण मंडप की व्यवसी से एक और वेदी

बनाकर-उन्हीं की २१ कन्याओं के माता पिता के साथ मिलकर एवं महन्त श्री के सामने

श्री चरन स्टील कार्पोरेशन के चरण दास के दिशा निर्देशन और सहयोग से सम्पन्न हुआ।

समिति के २१ परिवारों के वर-वधू के माता-पिता अभिभावक बने, हजारों लोगों

अभूतपूर्व विधवा विवाह का अवलोकन किया, पत्रकार नेता, क्या न जाने कहाँ-२ से लोग

आ गये। इसी बीच श्री चरन दास ने रुमाल से आँखे मलते हुऐ अपने कार्पोरेशन एवं

धर्मपत्नी के साथ केवल दो शब्द ये ही कहे।-

"इस पुण्य घड़ी में मुझे केवल यह कहना है- मेरे कोई पुत्र नहीं है, मैं राजन को पुत्र

रूप और रोली को पुत्र वधू के रूप में देख रहा हूँ और इनके साहसिक बलिदान स्वरूप

अपने परिवार मे विलय कर रहा हूँ, मेरे बाद भी मेरे सारे काम ... ।

आज भी कोई कार्य जो समाज और देश की सेवा से जुड़ा हो, प्रकृति आप को सब कुछ प्रदान करेगी। माँ अम्बे की कृपा तो बनेगी ही। समाज के उत्थान में आप भागीदारी भी माँ जी मैंने कुछ नहीं किया है, इस समाज में इसके सारे रंग उतार दिये थे मैंने एकशच सनिश्चित डोगी।

 


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