रंग उतर गया था, मैने दुबारा ...
एक सलवार सूट लेना है, साल भर का बच्चा गोदी में लिये- जरा कम दाम का लेना है- और वह राजन की दुकान पर बैठ गई। घर पर कोई है नहीं, सिर्फ पापा हैं, जरा जल्दी निकाल दो। 22 साल की उम्र, चेहरे पर लावण्य टपक रहा था, वक्त के तूफान ने प्रकाश का एक्सीडेन्ट और उसको विधवा बना दिया था। वक्त के थपेड़े खाई बच्ची को बेच पर बिठाने लगी।
ऊपर आकर ठीक से बैठो, काफी दिन के बाद आई हो। एक-दो बार मिलने की कोशिश की मगर म्मत नहीं पड़ी। पिता जी से कितना कहा था मगर मोटी रकम और वह भी चले गये और मैंने आज तक शादी नहीं की ... और आँखे मलने लगे। गद्दी से उठकर बड़ा ... ।-राजन बोले!
भाग्य से ज्यादा और समय से पहले यदि कुछ मिलता होता तो सबके पास सब कुछ अपने हिसाब से होता, उसने बच्चे के लिये बिस्कुट मंगाये और सर पर हाथ फेरा-बहुत भाग्यवान है, तुम्हारा घर भर देगा। घर है ही नहीं, जो भर जायेगा, कुछ नहीं है। -रोली ने कहा!
रोली एकाएक फफक कर रो पड़ी !- जो भाग्यवान होते हैं- वह बड़े लोगों के यहाँ पैदा होते हैं। पैसा होता है तो शादी ... आज तक एक सलवार .. फिर बुक्का मार कर रोने लगी। तुमने पहचान तो लिया यह क्या कम है। बुरे वक्त में कोई किसी को नहीं पहचानता है। -रोली ने कहा!
उसने एक बहुत अच्छा सलवार सूट पैक कर के दे दिया। लाओ! रंग तो देख लूँ ! लाल, नारंगी न देना- पापा ने मना किया है।- रोली बोली! रंग तो मैंने पसंद कर के दे दिया है तुम्हें पसंद करने की अब कोई जरूरत नहीं। मैं कल आऊँगा। दो सौ पचास, पर्चा थैले में डाल दिया। निकले देर हो गई है, आने नहीं दे रहे थे, एक सूट अच्छा होना जरूरी है, कभी - कभी ससुराल से कोई आ जाता है।
ले आई! अहुत देर लगा दी, लाओ देखें-उसने थैला ऐसे ही पापा के आगे डाल दिया। अरे ये क्या ? लाल रंग। तेरे को मना किया था- ये तो कम से कम 1400/- का है। तुझे! 250/- दिये थे। तेरे को क्या हो गया है, किसी गलत जगह चली गई, भगवान ने पहिले ही मुझे विकलांग बना दिया है, और अब इस उम्र में कोई लाक्षन भी मैं बरदाश्त नही कर पाऊँगा। - औ दो चार चांटे उसने अपने गाल पर जड़ दिये। उसने 250/- का कैशमेमो आगे रख दिया। राजन से लाई हूँ, मैं ज्यादा दुकानों पर जाती ही नहीं हूँ। मैंने बहुत कहा - वह, बोले !- जब तुम्हारा ही कोई रंग नहीं है - फिर तुम्हें रंगों से क्या लेना-देना। मेरी मरजी का पहन ले। तुम्हारे ऊपर सिर्फ ये ही अच्छा लगेगा, और वह रोने लगी।
पापा आप मेरी बात का विश्वास करो। पिला रही है। दूसरे दिन शाम को राजन आया, पापा सो रहे थे, रोली बच्चे को दूध राजन तुम ! एकाएक हड़बड़ा कर बैठे कैसे ? कैसे ? राजन बोला- बहुत दिन से सोच रहा था, आज हिम्मत जुटा कर आया हूँ। 250/- का लिफाफा वापस किया, आशीर्वाद दीजियेगा बाकी मेरे पास सब है। पैरों पर रख दिया। यह सलवार सूट के पैसे। सूट का रंग मैंने खुद पसंद किया है, ये नहीं ले रही थी, पापा जी, आज के बाद सलवार सूट क्या सब कुछ ये मेरी पसंद से पहनेगी, ऊपर वाले ने अपना आधा काम पूरा कर दिया है, बाकी आधा काम मुझसे करवाना है। - उसने उसकी मांग में सिंदूर भर दिया।- और पापा जी के पैर पकड़ कर बैठ गया।
पापा जी ! रंग उतर गया था, फिर से चढ़ गया, ये रंगों का खेल है, पहले पैसे ने अपना रंग दिखाया और अब भाग्य ने अपना काम दिखाया। पैसेमें ताकत होती तो लाखों लोग ऑक्सीजन की कमी से नहीं मरते। बस आपका आशीर्वाद चाहिए, बाकी ईश्वर की कृपा से सब मेरे पास है। पापा जी ने फिर से एकबार बिहारी जी की फोटो को घूर-घूर कर देखा।- दूर बैठे सारे भोले - भाले लोगों को परेशान करते हो। रोली ने तुम्हरा क्या बिगाड़ा था, अब कौन सी लीला कर रहे हो, इतने जोर से टांग जमीन पर पटकी कि दो जगह खून निकलने लगा। पापा जी दो-तीन दिन में घरवालों को लाकर रोली को ले जाऊँगा। बचपन से सोचता था, जीवन में एक काम ऐसा जरूर करूँगा कि जब ऊपर वाले से सामना हो तो वह अपने बगल में ही बिठाये। आज बिहारी जी ने इच्छा पूरी कर दी। आगे भी जो कुछ होगा बिहारी जी अच्छा ही करेंगे और आगे भी वो ही करेंगे। दो-तीन दिन के बाद आप के टांग का ऑपरेशन करवाऊँगा और आप भी अब हमारे साथ ही रहेंगे।
घर गया। माँ को बताया-माँ का कलेजा धक से रह गया। मगर वह तो विधवा है, माँजी-बोलीं। माँ जी ये वही रोली है, जो घर में आती थी तुमको खाना नहीं बनाने देती थी, तुम कहा करती थी- मैं तुझे हमेशा इस घर में रखूँगी और गाल पर इसके थपकी भी लगा देती थी। माँ जी मैंने कुछ जोड़ा है, एक अच्छा काम किया है- तुम्हारा आशीर्वाद मिल जायेगा, पतझड़ की सूखी डालियों पर फिर से बसंत नव-कोपल डाल देगा, कोयल फिर से उसी तरह से कुहू-कुहू करेगी, आज से ये तुम्हारी बेटी और बहू भी है। माँ जी ने अपने पैर आगे बढ़ा दिये और पोते को छाती से लगा लिया, यह सोचकर-आज मेरी कोख धन्य हो गई, और मैं भी धन्य हो गई, ऐसी कोख से जन्मे बच्चे ही ऐसा काम कर सकते हैं। मैं एक माँ हूँ और माँ के पास प्यार और आशीर्वाद के अलावा कुछ नहीं होता।
ऊपर वाला जब किसी पर अपनी अहैतु की कृपा करते हैं, तभी इंसान ऐसे कार्य कर पाता है। हलकी बारिश हो रही थी, 'इन्द्र-धनुष' निकल रहा था, शायद ऊपरवाला भी नीचे झांककर देख रहा था। मां जी मैंने कुछ नहीं किया है, इस समाज में इसके सारे रंग उतार दिये थे मैंने एक सुहाग का रंग भरा है। मैंने अपनी समझ से अच्छा ही किया है। एक हवा का झोंका आया और मौसम सुहाना हो गया, माँ ने अपनी ओढ़नी उसके सर पर डाल दी- यह मेरा आशीर्वाद है, आज से तू मेरी छत्रछाया में है। दुनिया में आये हैं, पता नहीं किससे संयोग होगा, किससे वियोग होगा, हम इस जहाँ में आये हैं और जिसने जमीन पर भेजा है उस पर छोड़ दें। बस! यह सोचें! कि किस तरह से सामने वाले का अच्छा करूँ! बस! आपका अच्छा अपने आप हो जायेगा। भगवान को ढूंढ़ना और उसके लिए हर समय कण्ठी घुमाना पुण्य तो मिल सकता है मगर परमात्मा का आशीर्वाद और कृपा नहीं- किसी दुखी आत्मा को सांत्वना और सहारा बनोगे तो परमात्मा का आशीर्वाद स्वयं तुम्हारे पास आ जायेगा। किसी पर हँसने से बेहतर है किसी के साथ हँसी-खुशी बाँटिये! क्योंकि छोटी-छोटी खुशियाँ ही तो जीने का सहारा बनती हैं। पुण्य की परिभाषा-किसी को सहारा का सहारा बनो! परमात्मा का आशीर्वाद स्वयं मिल जायेगा।
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