पत्नी संस्कारी हो-तो 'घर' नहीं बिगड़ सकता
देश राज पंत पार्टी का काम कर रहे थे, दुकान भी ठीक-दानपुण्य, भंडारे के अलावा देवी जागरण-एकाएक उभरती पार्टी का ऑफर आया, आप को इलैक्शन का टिकट देने का निर्णय-आप आ
जायें। आपके लिये पार्टी के लोग काफी दिन से सोच रहे हैं। देशराज सोचने लगे- भगवान की कृपा हो गई टिकट मिल जायेगा, चलती गाड़ी पर सवार हो जायेंगे, विधायक बन जायेंगे-व्यापार करना कठिन है, एक बार नेतागिरी चमक गई- घर बैठे मोटी रकम घर आ जायेगी, हमें तो देश सेवा करनी है, गये, तुरन्त पार्टी का पटका लगा लिया, खुलकर समाज सेवा करने का अवसर ऐैसा माहौल-सब नानवेज, दारूका सेवन करना पड़ा। दुकान पर लड़का-कर्मचारी, चलती दुकान, लम्बा चौड़ा लेना-देना, पूरा परिवार परेशान, कर्मचारी दुकान छोड़ने का मन बनाने लगे, देर से घर आना, खाना न खाना, पत्नी एकदम चिंतित- क्या हो गया ? भरे दूध के कढ़ाव में किसी ने तीन-चार छिपकली फेंक दी। देशराज ने सोचासब मिलकर जिता देंगे, वह इलैक्शन लड़ाते रहते हैं, उनसे पार्टी प्रचार के लिये भरपूर पैसा लिया, दुकान की चिन्ता, लेनदारों के तकादे, घर में पीना शुरू कर दिया। घर का पूरा माहौल बिगड़ गया।, पत्नी ने एक दिन कहा-आप क्या कर रहे हैं- बच्चे बड़े हो रहे हैं-लड़कियों की शादी करनी है, सबका कैरियर खराब हो जायेगा, पहले समय से आते थे, खाते थे, कभी-कभी घूमने भी जाते थे।
बोले- मैं खुद नहीं गया, मुझे मेरे मिलने वालों ने मुझे इस धंधे में झकेल दिया। मेरे को खुद नहीं पसंद है, मगर मैं क्या करूँ-कुछ समझा नहीं आ रहा है। पत्नी ने संभाल लिया है, परमात्मा की दया ... । मैं तुमको इससे बाहर निकाल लूँगी। मैं अकेली काफी हूँ, आज से अगर कोई इस घर में आया, हम सब मिल कर बाहर धकेल देंगे, अपना सर्वनाश खुद नहीं कर सकते और आज से दुकान भी देख लूँगी। दूसरे दिन सबको लेकर पार्टी दफ्तर गई- ये इलैक्शन नहीं लड़कों .. इनकी तबीयत एकदम खराब हो गई है, आप किसी दूसरे को कैन्डीडेट बना दें। मैं बिनती करने आई - भाई! आप लोगों से कोई शि्कायत नहीं। हम लोग साधारण आदमी हैं- हम परिवार वाले हैं।- हमारे छोटे-छोटे बच्चे हैं .. कृपा करें ... और फिर अगले दिन से स्वयं भी उनके साथ दुकान जाने लगी। और फिर से सामान्य प्रक्रिया से जीवन जीवन लगे, धर्म-कर्म में भी और जो अपने दैनिक कार्यों को निपटाने के बाद बाद सामाजिक कार्यों में लग गये।
- क्योंकि उनकी पत्नी ये अच्छी तरह से समझ चुकी थीं कि राजनीति हमारे जैसे सामान्य लोगों का काम नहीं है, जो अपना घर-बार पूरी तरह से समर्पित कर दे और फिर राजनीति करे- साम, दण्ड, भेद सब को इस्तेमाल करे। राजनीति में मनुष्य को न चाहते हुए भी सब करना पढ़ता है।
और उसने अपना पत्नी धर्म निभाते हुए उनको इस दलदल से निकाल कर पुनः सामान्य प्रक्रिया में ला खड़ा किया- अब वो परिवार खुश है। धार्मिक प्रवृत्ति और संस्कारी जीवन में ही सुख है।
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