नैमिषारण्य
एक बार ऋषियों ने ब्रह्मजी से प्रश्न किया कि कृपा करके हम को कोई
ऐसी पवित्र भूमि बताओ, जो। हमें सर्वकाल भक्ति में साथ दे। हमें
सर्वकाल भक्ति करने की इच्छा है। भोग-भूमि में काम के परमाणु घूमते
हैं। गृहस्थ का घर भोग-भूमि है। घर में भक्ति तो होती है, पर सर्वकाल
भक्ति नहीं हो सकती है। काम के परमाणु मन को बिगाड़ते हैं। गृहस्थ
का घर बहुत पवित्र नहीं है। जिस घर में जैसा कर्म होता है, उस कर्म
के सूक्ष्म परमाणु वहाँ रहते हैं। काम के परमाणु मन को बिगाड़ते हैं।
ब्रह्मा जी ने ऋषियों को एक चक्र दिया और आज्ञा दी कि इस चक्र के
पीछे-पीछे चलो। इस चक्र की गति जहाँ स्थिर हो जाय, वहाँ बैठ
जाओं। नैमिषारण्य में आने के बाद वह चक्र शान्त हो गया। थोड़ा-सा
विचार करने पर ध्यान में आयेगा कि मानव का मन चक्र के जैसा घूमता
ही रहता है। चक्र स्थिर नहीं होता है। मन भी स्थिर नहीं रहता। एक
ठिकाने स्थिर रहना मन को अच्छा लगता ही नहीं। मन का स्वभाव ही
ऐसा है। नैमिषारण्य में आने के बाद यह मनोमय चक्र शान्त हो गया।
नैमिषारण्य में गोमती गंगा है। नैमिषारण्य में चक्र-पुष्करिणी तीर्थ है।
भाग्यशाली वैष्णव को चक्र-पुष्करिणी तीर्थ में स्नान करने से चक्रांकित
शालिगराम भगवान् मिलते हैं। चक्रांकित शालिगराम वहाँ से प्रकट
होते हैं। पवित्र भूमि नैमिषारण्य में ऋषियों ने ब्रह्म-सत्र किया है। यज्ञ
और सत्र में अन्तर है।
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