Swargvibha
Dr. Srimati Tara Singh
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माया

 

माया

मानव जीवन क्या है? मानव का जीवन एक बड़ा युद्ध है। माया और
मानव का युद्ध हो रहा है। माया की जीत होती है, मानव की हार होती
है। माया मानव को संसार में फँसा देती है। संसार में मजा है-स्त्री बहुत
सुन्दर है, पुरुष सुन्दर है-ऐसा समझाकर जीव को माया संसार में फसा
देती है।
जीव संसार मे अनेक बार दुखी होता है। दुखी होने पर भी उसको संसार
मीठा लगता है। माया की जीत होती है, मानव की हार होती है। मानव
की हार क्यों होती है? क्यो की प्रेम से वह भगवान् की जय बोलता नहीं
है। जो प्रेम से भगवान् की जय बोलता नहीं है। जो प्रेम से भगवान् की
जय बोलता है-हृदय में से आवाज आये तो मन में पाप है, वह बाहर
निकल जायगा। मन शुद्ध होगा, हृदय में भगवान आयेंगे।
जीव के साथ संबन्ध भी सत्य नही है। जिस प्रकार खोटा स्वप्न
सुख-दुःख देता है, वैसे ही खोटी माया भी सुख-दुःख देती है। माया का
आदि नहीं है, अन्त है।
जो भगवान् को भूल जाता है, उसके आगे माया आती है। भगवान्
को भूलना नहीं। भगवान् के जो सन्मुख रहता है, माया उसे त्रास
नहीं देती है।
माया नर्तकी है-नाचती है। जीव माया का नाच देख करके मोहित होता
है, माया के साथ नाचने लगता है। 'नर्तकी' शब्द को उलटा दो तो
कीर्तन' होता है। जो प्रेम से भगवान् का कीर्तन करता है, प्रेम से जो
भगवान् का ध्यान करता है, जो भगवान् के स्मरण में तन्मय होता
है-उसको माया कभी त्रास नहीं देती। माया मूर्ख को मारती है, सावधान
को नहीं मारती है। सर्वकाल सावधान रहता है, वही साधु है। जो गाफिल
रहता है, वही संसारी है।

माया किसको कहते हैं? विधाता ने चार-पाँच जगह में माया रखी है।
एक-दो जगह में तो सभी का मन फँसा हुआ ही रहता है। भोजन में माया
होती है। बहुत से लोगों का मन भोजन में फँसा हुआ रहता है-रोज
पापड़ तो चाहिये ही, पापड़ के बिना उनका काम नहीं चलता। रोज
अचार चाहिये, रोज शाक चाहिये। भोजन में मन फँसा हुआ है-भोजन में
माया है।
जीव काम-सुख अनेक बार भोगता है, काम-सुख में माया है। पैसे में
माया है। लाख मिले या दस मिले-मन में ऐसा विचार नहीं आता है कि
अब मुझे एक पैसा भी नहीं चाहिये, मेरे भाग्य में जो पैसा लिखा है, वह
अब दूसरे को मिले तो अच्छा है। जगत् में बहुत-से जीव ऐसे हैं, जिनको
विश्वास है कि जीवन में एक पैसा भी न मिले तो हर्ज नहीं है-बहुत है।
पैसे में माया है। थोड़ी माया कपड़े में होती है, थोड़ी माया घर में होती है।
मानव जहाँ रहता है, जहाँ बैठता है-वहाँ माया हो जाती है। अरे घर मे ही
माया है, ऐसा नहीं है-आप कथा में जहाँ बैठते हो, वहाँ भी थोड़ी माया हो
जाती है। कितने ही लोगों के ऐसी इच्छा होती है कि मैं पीछे आऊँ तो भी
मेरी जगह मुझे मिलनी चाहिये-यह मेरी जगह है। सब जानते
हैं-दस-ग्यारह दिन के बाद यहाँ बैठने के लिये कोई आने वाला नहीं है।
अभी यह मेरी जगह हो गयी है- मन फँस जाता है।
थोड़ी माया पुस्तक में भी होती है। कितने ही लोगों की इतनी खराब
आदत होती है कि किसी के यहाँ जाते हैं और कोई अच्छी पुस्तक देखते
हैं और आगे-पीछे कोई देखने वाला न हो तो उसे अपने झोले में रख
लेते हैं। पुस्तक की चोरी करने वाला दूसरे जन्म में गूँगा हो जाता है।
अन्न की-प्रसाद की चोरी करता है, वह दूसरे जन्म में भिखारी हो जाता
है। सोने की, चाँदी की चोरी करने वाला अन्धा हो जाता है। पाँच-छः
जगह में विधाता ने माया रखी है।
माया अग्नि के समान है। माया का उपयोग करो। माया को उठाने का
प्रसंग आये, तब माया को छूना नहीं। माया को विवेक रुपी चिमटे से
पकड़ो। विवेक क्या होता है-मै भगवान् का अंश हूँ, मुझे भगवान् के
चरणों मे जाना है, परमात्मा के साथ एक होना है-अपने जीवन के लक्ष्य
को भूलना नहीं। जो लक्ष्य को भूलता है, वह चौरासी लाख के चक्कर में
घूमता ही रहता है। माया का उपयोग करो, परंतु अपने लक्ष्य को भूलना
नहीं। माया को विवेक से पकड़ो।
विधाता ने दो वस्तुओ में ऐसी माया रखी है, जिसमें सभी का मन फँसा
हुआ रहता है। काम-सुख में माया है। जीव काम-सुख अनेक बार
भोगता है, फिर मन से घृणा नहीं होती है। पैसे में माया है। देववृत ने
पिता के लिये राज्य-सम्पत्ति का त्याग किया, ऐसी भयंकर प्रतिज्ञा की
है। देवों ने पुष्पवृष्टि की है, कैसा त्याग कर रहा है! आज से इसका नाम
'भीष्म होगा। भयंकर प्रतिज्ञा की है।
संसार के विषयों में माया का ऐसा आकर्षण भरा है कि जीव संसार में
अनेक बार दुखी होता है, तो भी विषय मीठे ही लगते हैं, विषयों में मनसे
घृणा नहीं होती है। जो बार-बार कृष्ण-कथा सुनता है, प्रेम से हरे कृष्ण!
कीर्तन करता है, प्रभु को मनाता है, भगवान, उसके मनको खींच लेते हैं।
भगवान् मनका आकर्षण करके प्रेम-रस देते हैं, उसी का मन संसार के
विषयों से हटता है। श्रीकृष्ण प्रेम रस के स्वरुप हैं। प्रेम-रस अति मधुर
है। संसार में जितने रस हैं, उन्हें भोगने के बाद जीव नीरस हो जाता है।
प्रेम-रस ऐसा मधुर रस है कि इस प्रेम-रसका जो अनुभव करता है, वह
रसमय हो जाता है।
संसार हांडी के जैसा है। संसार-हांडी मे माया ने विषय रुपी चना भरा
है। यह जीव अहंता-ममता रुपी मुट्ठी में विषयों की पकड़ करके रखता
है। उसका हाथ बाहर निकलता नहीं है। उसको ऐसा लगता है कि मुझे
किसी ने पकड़ा है। किसी ने पकड़ा नहीं है। जो ईश्वर का अंश है, जो
परमात्मा का बालक है, उसको कौन पकड़ सकता है? वह अपने को
अज्ञान से बद्ध-जैसा मानता है कि मुझे पकड़ा है। किसी ने उसको
पकड़ा नहीं है।
मानव बोलने में बड़ा चतुर है। जैसा बोलने में चतुर है, वैसा कृति में चतुर
नहीं है। बड़ी-बड़ी ज्ञान की बातें करता है। कितने ही लोग बोलते
हैं-भगवान् की बहुत कृपा है, मुझे कोई व्याधि नहीं है। दो पुत्र हैं, दोनों
कमाते हैं। उनके यहाँ भी पुत्र हो गये हैं। कभी आपस में झगड़ा हो नही,
इसी लिये मैने दो बँगले अलग कर दिये हैं। वे सुखी हैं, मैं भी सुखी हूँ।
मुझे कोई बन्धन नहीं है, मुझे कोई चिन्ता नहीं है। अब ये एक कन्या बाकी
है, इसका लग्न हो जाय तो मैं गंगा-किनारे ऋषिकेश में, हरिद्वार में कहीं
रह करके वहीं भजन करूँगा, अब यहाँ रहना नहीं है। मानव बोलने में
बड़ा चतुर है। कन्या का लगन होता है, बुड्ढा घर छोड़ता नहीं है। लोग
पूछते हैं, आप तो कहते थे कि कन्या का लग्न होने के बाद आपको
गंगा-किनारे जाना था, अभी नहीं गये। वह कहता है-मुझको तो जाना
है, ये बच्चे ना बोलते हैं, मत जाओ, घरमें रहो, घर में रहने से बच्चो की
भी भक्ति करनी पड़ती है, उन्हें भी सँभालना पड़ता है। पुत्र ऐसा विचार
करता है कि बूढ़ा गंगा-किनारे जा करके रहेगा। उसके पास बहुत धन है,
साधुओं को, ब्राह्मणों को खिला देगा। यहाँ रहेगा तो अपने हाथ में आयेगा।
वह करता है, मेरे बच्चे मुझे जाने नहीं देते हैं। कहते हैं, वहाँ मत जाओ,
हम आपकी सेवा करेंगे। मेरे पुत्र मुझे नहीं जाने देते हैं।
अरे, पुत्र नहीं जाने देते हैं या तुम्हें घर छोड़ने की इच्छा नहीं है? जीव को
संसार मीठा लगता है, बन्धन मीठा लगता है। उसको भगवान् के चरणों
में जाने की इच्छा ही नहीं होती है। वह दूसरों को अपयश देता है, पुत्र
मुझे नहीं जाने देते! यमराज पकड़ने के लिये आये, फिर यमराज को कोई
कह सकता है कि मुझे पुत्र ना बोल रहे हैं। यमदूत धक्का मारते हैं। एक
दिन सब कुछ छोड़ना ही पड़ेगा। यमदूत धक्का मारेंगे, तब तो छोड़ना ही
पड़ेगा। मानव समझ करके छोड़ दे तो अच्छा है।
यह संसार ऐसा है कि संसार में परमात्मा आये तो परमात्मा को भी गुरुदेव की
जरुरत पड़ती है। संसार मायामय है। संसार में जो आता है-उसको माया
मारती है, माया किसी को छोड़ती नहीं है। माया में बहुत जोर है। इस संसार
में ऐसा कौन है, जिसको कामदेव ने पागल न किया हो? कामदेव पागल बना
देता है। इस संसार में ऐसा कौन है कि क्रोध में जिसने अपने हृदय को
जलाया नहीं हैं? लोभ ने जिसको अन्धा बनाया नहीं है? आँख में पैसा आ जाय
तो आँख होने पर भी अन्धा हो जाता है। कोयले की खान में जो उतरता है,
उसके कपड़े बिगड़ जाते हैं। संसार कोयले की खान है, मायामय है। संसार
में जो आता है, उसको माया मारती है, किसी को छोड़ती नहीं है। माया में
बहुत जोर है।
माया में बहूत जोर है। माया हमको हराती है। मानव का जीवन क्या है?
मानव का जीवन बड़ा युद्ध है। जाना है, भगवान् के चरण में माया जाने नहीं
देती। माया जीव को संसार में फँसा देती है? संसार में मजा है, भक्ति करने
की क्या जरुरत है? स्त्री सुन्दर है, पुरुष सुन्दर है, संसार में सुख है। माया
जीव को संसार में ऐसा फँसा देती है कि जीव संसार में अनेक बार दुखी होता
है, दुखी होने पर भी संसार से घृणा नहीं होती है। संसार के विषय उसको
मीठे ही लगते हैं। संसार में मानव को शान्ति नहीं मिलती है, सुख मिलता है
और दुःख भी भोगना ही पड़ता है। परमात्मा को पकड़ता है-वही माया का
स्वरुप समझ सकता है। माया को छोड़े बिना और प्रभु को पकड़े बिना माया
का स्वरुप नहीं समझ सकता। जीव माया को छोड़ता नहीं है और माया का
विचार करता है।
एक भाई पेड़ के नीचे बैठा था। एकदम ऊपर से एक सर्प उसकी गोद में
गिर गया। फिर क्या वह विचार करेगा कि यह सर्प। कहाँ से आ गया?
मेरी गोद में क्यो पड़ा? कैसे पड़ा? गोद में सर्प आने के बाद वह सर्प को
फेंक देगा। फिर विचार करेगा कि सर्प कहाँ से आया, माया सर्प के जैसी
है। माया को छोड़ दो और परमात्मा को पकड़ो। जिसको माया से तरने
की इच्छा है, उसके लिये बहुत स्वतन्त्र हो करके घूमना अच्छा नहीं है।
अपनी बुद्धि में जो विश्वास रखता है, उसका पतन हो जाता है। मानव
को अपने दोष गुण के जैसे लगते हैं।
किसी सन्त के चरण पकड़ो। किसी सन्त को गुरु मानो-जिसको माया
से तरने की इच्छा है, उसको चौबीस घण्टे में, ज्यादा नहीं तो चार-घण्टे,
पाँच घण्टे मौन रखना चाहिये। जीभ से न बोले, वह साधरण मौन है, मन
से भी जो बोलता नहीं है, वही श्रेष्ठ मौन है। मानव मन से बहुत बाते
करता है। लोग तन को आराम देते हैं, मन को आराम नहीं देते हैं। जो
मन से मौन रखता है, जो मन से भी बोलता नहीं है, तब मन को आराम
मिलता है। मौन रखने से शक्ति बढ़ती है।
कितने लोग मौन रखते हैं, लिख करके बताते हैं कि मेरा मौन है।
लिखना तो बोलने जैसा ही हो गया! कितने लोग आँख से संकेत करते
हैं। ये मौन बराबर नहीं है। मन से भी मत, बोलें। शान्ति से बैठें। जिसको
माया से तरने की इच्छा है, वह प्रातः काल और सायंकाल के समय में
सावधान हो करके भक्ति करे।


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