Swargvibha
Dr. Srimati Tara Singh
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मैं भोग करी हुई झूठन ...

 

मैं भोग करी हुई झूठन ...

विजय बाबू सीनियर ऑफीसर थे, आज पहली बार ऑफिस में आई नेहा की तरफ उनका ध्यान अनायास खिंच गया। सुडौल नाक-नक्श, गोरा रंग एवं मुस्कुराता चेहरा उन्हें कुछ ज्यादा भा गया। काफी देर सोचने के बाद उन्होंने कुछ सोच-समझकर उसे अपनी टेबिल पर बुलाया और कहा-कोने वाली टेबल एलाट कर दी है, ठीक ऊपर पंखा लगा है।
घबराना नहीं! पहला दिन है, किसी बात की दिक्कत लगे-मुझसे पूछ लेना और किसी परेशानी से 10-15 मिनट देर भी हो जाये तो भी आना। मन लगा कर काम करो, जल्दी तरक्की हो जायेगी। नेहा जरा मुस्कुराई और जाने लगी तो विजय बाबू ने उसको फिर बड़े गौर से देखा और वह चली गई, काफी देर तक विजय बाबू नेहा के बारे में सोचते रहे- काश मेरी ऐसी पत्नी होती तो जीवन का सुख कुछ और ही होता। रोज यह कार्यक्रम चलता रहा, वह किसी बहाने टेबिल पर बुलाते और कहते-सब ठीक है न, कोई दिक्कत तो नहीं, आराम से काम करो, 7-8 दिन निकलने के बाद-एक दिन विजय बाबू ने कह ही दिया-अकेली आती हो, कोई छोड़ने नहीं आता- कहो तो तुमको घर पर छोड़ दिया करूँ ! मैं भी आगे बापू कालोनी में रहता हूँ।
शब्द सुनते ही नेहा की आँखें छल-छला आई-पहले भी मुझे कोई पूरा-पूरा छोड़ चुका है और आप भी जब मुझको छोड़ेंगे तो मैं उठ कर चल भी नहीं पाऊँगी। छूटे और टूटे को क्या छोड़ेंगे? और वह रोने लगी। समझा नहीं- विजय बाबू बोले! क्या समझाना है आपको भी-वह बोली। ... और आंखें मलने लगी। आप मेरे शरीर को देख रहे हैं, मेरे चेहरे को देख रहे हैं, जब अन्दर झाँक कर देखेंगे खून-मांस और जख्मों के अलावा कुछ नहीं है, पहले भी एक नई क्लर्क को देख मेरे अधिकारी पति ने मुझको छोड़ दिया था, दो-तीन साल साथ में खिंचती गई और वह मुझे तीन निशानियां भी दे गया। जब से उनकी जिन्दगी में 'राखी' आई मैं उनके लिए सुन्दर और आकर्षक नहीं रह गयी। मैंने बहुत मिन्नतें की, हर तरह के शारीरिक और मानसिक यंत्रणायें झेली, वह मेरे को खत्म करने को लग गये तो मैंने बच्चों के लिये तलाक स्वीकार किया।
मैं तलाकशुदा हूँ-भोग कर फेंकी गई झूठन, जिसके पास कोई खड़ा होना पसन्द नहीं करता। राखी ने मेरी मांग का सिन्दूर निकाल कर अपनी मांग में भर लिया लेकिन मैं अपना घर बसाने के लिये आपका घर नहीं उजाडूँगी।- और आंखों से टपाटप आंसू गिरने लगे। अरे! ये तुम क्या कह रही हो। मेरा मतलब ... । -विजय बाबू बोले। ये उम्र ही ऐसी होती है, सामने वाला सभी कुछ सोचने लगता है, अभी महीना भर से एक नेता जी चक्कर काट रहे हैं, तुम्हें महिला प्रकोष्ठ का सचिव बना दूँ। पावर में आ जाओगे कैसे-कैसे शुभ चिन्तक हैं, सब उम्र का तकाजा है। अपने को मेन्टेन रखा है तभी नौकरी लगी है वरना ... । और उसने एक हाथ की आस्तीन को ऊपर किया- कई ठिकाने कट लगे थे ऊपरी बांह पर राड लगा था। और बाकी शरीर भी ऐसा ही हैं मैंने शरीर से बहुत कुछ सहा है, छै-छै महीने कमरे में बन्द रही हूँ और- और बाकी आप खुद समझ लो। बच्चों के भाग्य से केवल चेहरा बचा है और उसकी आँखें एकदम से छलछला गई। दबे हुए ज्वालामुखी से गर्म लावा स्वयं बाहर आने लगा।
नहीं, नहीं ये मेरा मतलब ... । विजय बाबू बोले। आज नहीं तो कल मतलब हो जाता, यह युग ही ऐसा चल रहा है। जब तक यहाँ पर हूँ, मेरी इज्जत आपके हाथ में है। कोई दुःख मुसीबत आ जाये मेरी तरफ देखते रहें कोई गल्ती हो जाये छोटी बहन समझ कर क्षमा कर दें। मेरे पास ज्यादा कुछ कहने के लिए है ही नहीं और आगे कुछ सोचने के लिये भी नहीं है। समस्याओं से घिरी हूँ। मेरे पास सब सवाल ही सवाल हैं और जवाब में कुछ नहीं। मुझे आपकी जरूरत नहीं आपके सहारे की जरूरत है इस हालत और इस उम्र में बगैर सहारे के जीवनयापन करना बहुत मुश्किल है, हर कोई भोग की दृष्टि से देखता है।
नज़र मिलते ही लोग पास आने लगते हैं। इसी माहौल में रहना है। मुझे तुम्हारे बारे में कोई जानकारी तो है नहीं। तुमने बताया है अपनी तरफ से जो होगा अच्छे से अच्छा करता रहूँगा।-विजय बाबू बोले। ज्वालामुखी का लावा फिर एक बार भभक कर आसमान छूने लगा- हो सके छोटी बहन बना लीजिए। बच्चों को बड़ों का साया मिल जायेगा दो लड़कियाँ हैं एक छोटा बेटा है, आपके नाम के सहारे बच्चियाँ बड़ी होकर ससुराल चली जायेंगी, बेटा भी बड़ा होकर कहीं सर्विस से चिपक जायेगा। बाकी मुझे अपने लिये कुछ नहीं मेरा धर्म पूरा हो जायेगा। न भगवान से अपेक्षा की है न आपसे किसी प्रकार की अपेक्षा है। आपके नाम का सहारा काफी है। हम चारों प्राणी इसी छत्रछाया में जी लेंगे। लोग अनायास नजर उठाकर नहीं देखेंगे। और परेशान नहीं करेंगे।
बाकी भगवान मुझे मेरे कर्मों के हिसाब से दे ही रहा है। आगे भी ऐसे ही मिलता रहे। बच्चों के लिये जीना भी जरूरी है। आपका कुछ बिगड़ नहीं जायेगा और वह एकदम से रो पड़ी। तमाम लोग टेबिल के आस-पास इकट्ठा हो गये और फिर एक नये मेल का माहौल बन गया। सच्चाई जब फूटकर उभर कर आती है कहीं न कहीं कैसा भी आदमी हो दो क्षण के लिये आंखें नम हो जाती हैं। विजय बाबू! काफी देर तक सोचते रहे और भी लोग इकट्ठा हो गये थे। किसी की कुछ समझ नहीं आ रहा था। एकाएक विजय बाबू के अन्दर भी हलचल हुई वह अन्दर से काफी हिल गये थे। मस्तिष्क झनझना गया कुछ देर मौन रहे सोचते रहे और फिर एक झटके साथ उन्होंने सामने फाइल में लगा टैग खोलकर उसके आगे बढ़ा दिया। सोचने लगे परमात्मा ने यह नेक काम करने का अवसर दिया है कहीं हाथ से निकल न जाये।
उसने भी एक क्षण में टैग का धागा राखी का बंधन समझ कर उनके हाथ में बांध दिया और जोर-जोर से फिर रोने लगी। अरे अब क्यों रो रही हो जो चाहा था वैसा हो गया। एक दो स्टैनो भी आ गयी थी। आज वह इस पूरे डिपार्टमेण्ट की छोटी बहन बन गई थी। बाकी स्टैनो भी आंखों से रूमाल लगाने लगे। कुछ माहौल भी ऐसा बन गया था। एक दो की आंखों में आंसू आ भी गये। इस अनोखे रिश्ते की खबर जब सचिव को पहुँची एक बारगी वह भी वहाँ पर आ गये। नेहा ने उनके पैर छुये क्षण भर में क्या से क्या हो गया।
ईश्वर की लीला, सब कुछ सम्भव है। जब देता है पता नहीं कैसे व्यक्ति के पास पहुँचा देता है। और जब लेता है पता नहीं सब कैसा अदृश्य हो जाता है।मानों एक नये मेल का काँड हो गया, एैसा न देखा न सुना।
चार दिन बाद मालूम हुआ सचिव साहब ने अपने स्तर से उसकी पदोन्नति कर दी और डिपार्टमेण्ट के लोगों से मिलकर और सचिव साहब ने अपने मित्र L.D.C.O. के मालिक से कह कर एक बहोत छोटा फ्लैट खरीदवा दिया है। सुरक्षित रहेगी बहन का रिश्ता ही ऐसा होता है। कैसा भी भाई हो बहन को दुखी नहीं देख सकता।
10 दिन बाद होली मिलन समारोह में मंच पर विजय बाबू की पत्नी ने स्वयं घोषणा की नेहा ने मेरे परिवार को चिटकने-टूटने से बचाया है। मैं भी आजीवन इसकी आभारी रहूँगी और आज से मेरी नन्द-पति की छोटी बहन है और उसकी सारी जिम्मेदारी हमारी है- मैं इसकी भाभी हूँ और इसके बच्चे मेरे बच्चों के संग भाई बहन समान हैं और उन्होंने अपने गले का हार उतार कर उसको पहना दिया।
कुछ दिन बाद पता चला लोगों ने इतना उपहार दे दिया और उसे सभी छोटी बहन कह कर ही पुकारते हैं ... इस अनोखे कार्य के लिये कई सामाजिक संस्थाओं ने विजय बाबू को सम्मानित किया, इस कार्य के लिये नहीं केवल परम्परा के लिए। परम्परा बने लोगों की जानकारी में आवे और किसी किसी का उद्धार हो ... ।
मुसीबतें सब पर आती हैं, सबका समय बदलता है, कुछ पता नहीं कर्मानुसार कल हमें क्या देखना पड़े मगर यदि हमारी नज़र नीयत ठीक रहेगी कुछ अच्छा करने की इच्छा रहेगी कैसी भी काली रात हो सुबह की स्वर्णिम लालिमा के साथ जरूरत सूरज निकलेगा। स्वयं अच्छे बनें, समाज सेवी, राष्ट्र प्रेमी, संसार से जायें सबको कुछ देकर, देने वाले को भी सदियां याद करती हैं, लेने वाले को लोग जहाँ में
याद नहीं करते।


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