कलयुग
बहुत-से लोग अपने को बड़ा बुद्धिमान समझते हैं। अकड़ में चलते हैं।
व्यास जी ने लिखा है-कलयुग के लोग मन्दबुद्धि वाले है। जो काम
करने की बहुत ही जरुरत है-वह नहीं करते है। प्रातः काल में 4 बजे
उठकर भजन करने की बहुत जरुरत है।
लोग यात्रा करने के लिये जाते हैं। लोग यज्ञ करते हैं, दान देते हैं-अच्छा है।
अति उत्तम तो यह है कि घरमें प्रातः 4 बजे उठकर भजन करो, ध्यान करों,
जप करों। करने की बहुत जरुरत है, मानव वह नहीं करता है। बहुत-से
लोग ऐसे होते हैं, जिन्हें प्रातः काल में जब ठंडी हवा छुटती है, तब उनको
गादी (गद्दी) में मजा आता है। प्रातः काल में 4 बजे के बाद जिस को गादी
में मजा आता है, उसकों ऊपर जाने के बाद सजा भी बहुत होती है-मार
पड़ती है। कलियुग का मानव मन्द बुद्धि वाला है। जो करने की बहुत
जरुरत है, वह नहीं करता है। मैने सुना नही।' रुपया गिनते समय कोई कुछ
बोलता है तो वो सुनता नहीं, किंतु माला करने को जब वह बैठता है और तब
कोई आता है तो सब सुन लेता है। रुपया गिनने में कैसी सावधानी रखता है।
रुपया गिनता है, तब मन एकाग्र होता है। ऐसी सावधानी भजन में कहाँ?
मानव मन्द बुद्धि वाला है। व्यवहार के काम सें वह सावधान रहता है।
भगवान् की सेवा-पूजा में गाफिल रहता है। इसलिये उसको मन्द बुद्धि
वाला कहा है।
जीवन बहुत थोड़ा है जीवन में विघ्न बहुत आते हैं। साधन सरल हो, तभी
कलियुग का मानव भक्ति कर सकता है। बहुत से लोग ऐसी इच्छा रखते हैं
कि भगवान् घर में मुझे सभी प्रकार की अनुकूलता कर दें, तब मैं भगवान्
पूजा करुँगा। मेरे इच्छानुसार सब प्रकार की अनुकूलता होनी चाहिये।
जीव जगत् में आता है, तब वह पाप और पुण्य-दो ही लेकर आता है।
कोई जीव ऐसा नहीं है, जो केवल पुण्य ही लेकर आया हो। सभी जीव
पाप और पुण्य-दोनों लेकर आतें हैं। पुण्य का फल अनुकूलता है, पाप
का फल प्रतिकूलता है। घर में मेरी इच्छानुसार सब प्रकार की
अनुकूलता मिलनी चाहिये-ऐसी इच्छा रखना ही पाप है। सब प्रकार की
अनुकूलता किसी को मिली नहीं है। कदाचित् मिले भी तो भक्ति नहीं
करता है। जिसको घर में सब प्रकार का सुख मिलता है, वो गाफिल हो
जाता है-वो सावधान नहीं रहता। वो आराम बहुत करता है। वह बहुत
धूमता है। जीवन में थोड़ी-सी प्रतिकूलता होना ही चाहिये। मानव मन्द
बुद्धि वाला है, इसी लिये एैसी अपेक्षा रखता है कि मुझे सब प्रकार का
सुख मिले-अनुकूलता मिले। बड़े-बड़े ज्ञानियों कि बुद्धि 'कलि' बिगाड़
देता है। पैसा के लिये मानव झगड़ा करता है। मानव ज्ञानी नहीं है, मूर्ख
है। पैसा के लिये कोर्ट में जाता है।
कितने ही लोग बड़ी-बड़ी ब्रह्मज्ञान की बातें करते हैं, किंतु हजार का
नुकसान हो तो घण्टा-दो घण्टा हृदय को जलाते हैं-मेरे दो हजार गये!
अरे! तुम्हारा जन्म हुआ, तब तुम दो हजार लेकर आये थे-तुम्हारा क्या
गया? तुम्हारा क्या था? कलियुग का मानव, जिसने भोग में शक्ति का
विनाश किया है, वह कभी योगी नहीं हो सकता।
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