भावी जीवन की पूर्ति नहीं ..
विधवा सम्मान एवं वीरता शौर्य सम्मान के लिये शासन की ओर से भव्य पण्डाल लगा था, लोग आकर बैठने लगे थे। रजनी सिंह भी मां के साथ गई थी, अभी 15 माह पहले शादी एवं चार महीने पति मेजर साजन सिंह की एक भयानक लड़ाई में पुंछ में वीर गति हो गई थी।
कार्यक्रम आरम्भ हुआ, अधिकारी आये, मंत्री भी आये, उनका भी संक्षिप्त भाषण और फिर क्रमवार विधवाओं को बुलाना माल्यार्पण करना एवं पुरस्कार वितरण ... ।
रजनी सिंह को बुलाया गया उसी प्रकार पुरस्कार वितरण-29 साल की उम्र, चेहरे पर तेज, भरपूर लावण्य, खिला गुलाब-मेजर लैफ्टिनेन्ट विक्रय सिंह ने उनकी तरफ पुरस्कार बढ़ाया और उनके शासन की ओर से सम्मान जनक शब्द ... । 32 साल के नवजवान इस समय पर उच्च पद पर आसीन थे।
ये क्या है ? - उसने इनकी तरफ देखते हुए कहा और उनकी तरफ देखने लगी। शासन की ओर से यह शौर्य चक्र एवं सम्मान एवं चेक है। इस का क्या करेंगे ? इससे मेरे भावी जीवन की पूर्ति होगी ? किसे दिखाऊँगी ? कहाँ लगाऊँगी ? क्या इसी के लिये - उसने कहा।
बुलाया है ? - रजनी सिंह ने कहा। देखने लगे। एकाएक समारोह में सन्नाटा छा गया। सभापति महोदय एवं अधिकारी लोग सब प्रशासन सदा यह कार्यक्रम करके अपनी जिम्मेदारी खत्म कर लेता है। भावी जीवन के लिये कोई नहीं सोचता। यह एक क्रम है। कुछ इसके आगे और कुछ-और विक्रम सिंह की ओर देखने लगी और सभी उच्च अधिकारियों को देखने लगी। भयानक सन्नाटा और सभी एक दूसरे की तरफ देखने लगे।-
प्रशासन की ओर से निर्धारित किया जाता है- सभापति बोले फिर आप रख लीजिये! मुझे नहीं चाहिए, मम्मी चलो! मैं इसका हृदय से सम्मान करती हूँ, मगर मेरे शेष जीवन के लिए न काफी है- कोई सरकारी जीवकोपार्जन, उसने लेकर मेजर विक्रम सिंह की ओर बढ़ाया, आप स्वयं रख लें, मेरा घर ऐैसा नहीं जहाँ मैं इसे रख सकूँ। ... सोचा था सरकार भावी जीवन ....
- और उसने वहीं उनके हाथ पर रख कर जाने लगी।- आप ले जायें, ये आपका है- विक्रम सिंह जी बोले और वह चली गई। विक्रम सिंह इतने भावुक हुये कि काफी देर हाथ में लिये रहे फिर अपने एसिस्टेंट को दे दिया। कार्यक्रम समपन्न हुआ, तीन दिन पर छुट्टी पर चले गये-सोचने लगा- वह बिल्कुल ठीक कह रही थी, एसी स्वाभिमानी मैंने आज तक कोई नहीं देखी- और केवल उसके विचार के बारे में ही सोचने लगे, माँ ने पूछा-उनको भी कुछ नहीं बताया, ड्यूटी पर गये मगर वही सोच-उसका चेहरा उसका तेज और उसका त्याग।
संयोग से 20 वें दिन बाद बुलेट से जाते समय एक तरकारी के ठेले पर दिखी, रुके बोले- तुम्हारी माँ से मिलना है, परमवीर चक्र उनको देना है-क्या जरूरत है? मेरी इच्छा है, नाही न करो, मैं तुमसे कुछ माँग नहीं रहा हूँ, घर का पता दो। बस इतनी सी बात है।
उसने बता दिया और वह तीसरे दिन उसके घर पहुँच गये, रजनी सिंह उस समय ऊन के गुल्ले बना रही थी, एक छोटी मशीन स्वेटर बुनने की ले ली थी-अपने छोटे भाई को पढ़ा रही थी। कालोनी में एक छोटा सा मकान .....
जाते ही माँ जी के पैर छुए और एक तरफ बैठ गये। रजनी सिंह एक गिलास पानी और प्लेट पेड़े की ले आई। कैसे आये घ क्या हमसे कोई भूल हो गई थी। लड़की है गलती कर सकती है। न माँ जी, और उस दिन मैं उससे ज्यादा और कुछ नहीं दे सकता था। मगर मैं आज अपने को स्वयं देने आया हूँ। बहुत दिन से शादी का विचार कर रहा था, शायद भगवान ने मेरी इच्छा पूरी कर दी, माँ जी इंकार न करना, हम दोनों मिल जायेंगे, देश को नई ऊर्जा मिल जायेगी, पता नहीं देश कितनी ऊँचाई पर आ जायेगा और वह सम्मान पत्र और सम्मान उनकी गोद में रख दिया।
माँ के अनायास नेत्रों से अश्रुपात होने लगा, बाहर देखा रिमझिम बारिश का संकेत, माँ ने उसके सर पर हाथ रखा और आशीर्वाद दिया- तुम्हारे ऐसे नौजवान भारत में ही हैं, और हमेशा पैदा होते रहेंगे और विश्व में भारत सदा शिखर पर रहेगा।
- और रजनी सिंह ने सर पर पल्ला डाल दिया। दूसरे दिन अखबार में एक पन्ने पर दोनों फोटो छपीं। कुछ अच्छा काम आप भी कर सकते हैं। प्रयास करें- परमात्मा प्रसन्न हो जायेंगे।
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