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Dr. Srimati Tara Singh
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भागवत कथा महिमा

 

भागवत कथा महिमा

भागवत-कथा सुनने से पाप का नाश होता है, प्रभु में प्रेम होता है। जिस कथा को सुनने से परीक्षित को हृदय में परमात्मा का दर्शन हुआ था। केवल प्रेम से उसने कथा सुनी है। सुनने से भगवान का
प्रवेश हृदय में हुआ। भगवान का दर्शन करता हुआ परीक्षित कृतार्थ हुआ कथा कीर्तन से सफल होती है। कथा का सोलह आना फल मिले, पुण्य मिले- ऐसी इच्छा हो तो कथा में प्रेम से कीर्तन करो। कथा में वक्ता भगवद्-गुणगान करता है। भगवान की मंगलमयी लीला का गुणगान करता है। भगवान की मंगलमयी लीला का वर्णन करता है।
गुण-संकीर्तन, लीला-संकीर्तन, नाम-संकीर्तन से कथा सफल होती है। वक्ता-श्रोता बहुत प्रेम से भगवान के नाम का जब कीर्तन करते है, तभी कथा सफल होती है। कीर्तन में जिसको संकोच होता है, वह समझे कि मेरा पाप बहुत है। भागवत सभी वेद-पुराणों का सार है। ऐसा सारतत्त्व समझाओ, जिससे ज्ञान-वैराग्य के साथ भक्ति पुष्ट हो, यह ध्यान में रखकर कथा कहना। कथा सुनने के बाद संसार के विषयों में अरुचि हो, कथा सुनने के बाद पाप छोड़ने की इच्छा हो, कथा सुनने के बाद किये हुए पाप के लिये पश्चाताप हो-तभी कथा सफल है। कथा सुनने के बाद थोड़ा भी स्वभाव सुधरना ही चाहिये। कथा सुनने के बाद पाप छोड़ने की इच्छा न हो, प्रभु में प्रेम न हो, स्वभाव न सुधरे-तो समझना कि मैंने कथा सुनी ही नही। मैंने तो कथा सुनी पर इन महाराज को कथा कहनी आती ही नहीं। महाराज बराबर कथा कहते हों, आप श्रद्धा-भक्ति से बराबर कथा सुनते हों तो स्वभाव सुधरना ही चाहिये। कथा सुनने के बाद नवीन जन्म होता है। कथा सुनने के बाद पाप छोड़ने की इच्छा होती है। कथा सुनने के बाद प्रभु में प्रेम बढ़ता है। ज्ञान-वैराग्य के साथ भक्ति को पुष्ट करने के लिये भागवत की कथा है।
भक्ति में ऐसी शक्ति है। भक्ति जब बहुत बढ़ती है, तब भगवान को दृश्य होना पड़ता है। ज्ञानी लोग ऐसा वर्णन करते हैं-चर्म-चक्षु से भगवान का दर्शन नहीं होता है। चर्म-चक्षु प्रायः चमड़ी को ही देखते हैं। भगवान का दर्शन ज्ञान-चक्षु से होता है, किन्तु भक्ति जब अतिशय बढ़ती है, तब चर्म-चक्षु से भी भगवान का दर्शन होता है। साधारण भक्ति से नहीं-अतिशय भक्ति जब बढ़ती है, तब जिस आँख से मानव जगत को देखता है, उसी आँख से भगवान का दर्शन भी होता है। ऐसी मधुर कथा सुनाओ-भगवान का प्रत्यक्ष दर्शन हो।
कथा सुनने के बाद कथा का मनन करना चाहिये। कथा में मैंने क्या सुना? आज मैंने कथा में सुना था-मन्दिर में जाकर भगवान का दर्शन करना-यह साधारण दर्शन है। प्रत्येक मानव में भगवान का दर्शन करना-आसाधारण दर्शन है। पशु-पक्षी में, जड़ वस्तु में भगवान का दर्शन करना-यह अपरोक्ष दर्शन है। सभी में दर्शन करना चाहिये।
कथा का एक-एक सिद्धान्त याद करो। लोग कथा सुनते है और कथा से जब घर में जाते हैं, तब जो कुछ सुना है-सब कुछ भागवत जी को अर्पण करके, जैसे थे, वैसे ही यहाँ से घर में चले जाते हैं। मैने क्या सुना? आज मेरे लिये कथा में क्या आया?
सनतकुमार जी ने नारद जी को कहा है-इसका उपाय कलयुग में एक ही है-भागवत की कथा करो। कथा में पाप का नाश करने की शक्ति है। कथा मन को शुद्ध करती है। कथा भक्ति-प्रेम को बढ़ाती है। ऐसी यह मधुर कथा है।
दूध से ही घी उत्पन्न होता है। दूध न हो तो घी नहीं उत्पन्न हो सकता। वेद दूध के समान है और भागवत घी के समान है। सभी वेदों का सार भागवत है। दो मन दूध है-उससे कोई दीपक नही जला सकता है। एक दो चम्मच घी हो तो घी से दीपक प्रकट हो सकता है। दूध से दीप नहीं प्रकट हो सकता है। घी निकला है दूध से ही, दूध न हो तो घी नहीं हो सकता है, पर जो काम घी से होता है, वह दूध से नहीं हो सकता। सभी वेद दूध के समान हैं। सभी वेदों का सार भागवत-शास्त्र घी के समान है।
यह कथा ऐसी मधुर है, जो बहुत प्रेम से यह कथा सुनेगा, कान से भगवान उसके हृदय में प्रवेश करेंगे। एकाग्रचित्त से कथा सुनों भगवान कान से अन्दर आयेंगे। आँख और कान को पवित्र रखना चाहिये। यह कथा अति मधुर है। भगवान स्वधाम में गये हैं, उस समय भगवान ने अपनी दिव्य शक्ति भागवत-शास्त्र में रखी है। भागवत-शास्त्र श्रीकृष्ण भगवान का ही स्वरुप है। भगवान सन्तों के हृदय में विराजमान हैं पंढरपुर में, द्वारका में, श्रीधाम वृन्दावन में भगवान आज भी प्रत्यक्ष विराजमान हैं भगवान गये नहीं हैं। भगवान जीव की प्रतीक्षा करते हुए खड़े रहते हैं। आप पंढरपुर गये होंगे। पंढरपुर में श्रीविट्ठलनाथ जी महाराज का दर्शन है। भगवान का स्वरुप अति सुन्दर है। अति कोमल-मनोहर स्वरुप है। दर्शन करते समय ऐसा लगता है, जैसे भगवान किसी की प्रतीक्षा करते हुए खड़े हैं-यह जीव मेरा है, मेरा जीव मुझे भूल गया है। मेरा जीव स्त्री का हो गया है, पुरुष का हो गया है, जीव जगत का नहीं है। जीव ईश्वर का है। भगवान खड़े हैं-आज भी हैं। भगवान सन्तों के हृदय में हैं। भगवान भागवत में हैं। भगवान ने अपना दिव्य तेज भागवत में रखा है। भगवान में जो शक्ति है, वह शक्ति भागवत में है। संतो ने तो ऐसा वर्णन किया है कि भगवान से भी ज्यादा शक्ति भागवत में है। जो काम भगवान नहीं कर सके हैं, वह काम भागवत की कथा से होता है।
दुर्योधन को भगवान श्रीकृष्ण समझाने के लिये गये थे। दुर्योधन को अनेक रीति से समझाया है-दुर्योधन सुधरता नहीं है। भगवान की बात मानता नहीं, जवाब देता है। भगवान भी उसको सुधार नहीं सके। रावण को रामचन्द्रजी का दर्शन हुआ था। राम-दर्शन करने पर भी उसकी बुद्धि सुधरी नहीं, रावण युद्ध करता है। आश्चर्य होता है- भगवान के दर्शन करने के बाद उसकी बुद्धि सुधरती नहीं है। उचित तो यही था कि रावण रामचन्द्र जी की शरण में आ जाता। उसको राम-दर्शन हुआ तो भी बुद्धि नहीं सुधरी। रावण ने राम-नाम का जप नहीं किया, रावण ने भागवत की कथा सुनी नहीं। रावण और दुर्योधन तो मर गये हैं, कलयुग में उनका वंश बहुत बढ़ गया है। रावण-दुर्योधन जैसे अनेक जीव उत्पन्न हो रहे हैं। कैसा भी जीव हो भागवत की कथा सुने।
वक्ता बहुत विवेक से कथा कहता हो तो नास्तिक को भी कथा में आनन्द आता है नास्तिक कथा सुनने के बाद आस्तिक हो जाता है। कहीं-कहीं गाँव में ऐसे लोग मिलते हैं, वे कहते है। मैं श्रीकृष्ण का स्वरुप जानता नहीं था। कथा सुनने के बाद मुझे खबर पड़ी। अब मेरी इच्छा होती है कि मैं श्रीकृष्ण की सेवा करुँ, मैं श्रीकृष्ण का कीर्तन करुँ। नास्तिक भी कथा सुने तो उसको आनन्द आये। कथा सुनने के बाद जीवन सुधरता है। कैसा भी पापी जीव हो, कथा में पाप का नाश करने की शक्ति है।
व्यास महर्षि की आज्ञा है कि भागवत की कथा करने वाला वक्ता, सुनने वाला श्रोता कभी संसार का ध्यान न करे, मानव-शरीर का ध्यान न करे-भगवान का ध्यान करे। आप जो जानते है, वह जीवन में उतारें। भागवत की कथा सुनते हो, आप से हो सके तो आज से भोगों की समाप्ति कर दो। बहुत सुख भोगा है, सुख भोगने से आज तक शान्ति मिली नहीं। अब सुख भोगने से क्या शान्ति मिलेगी!
भागवान के चरणों में स्थिर होना है। ऋषियों ने ब्रह्म-सत्र किया है। सत्र में सभी यजमान है। यज्ञ में एक ही यजमान होता है। यज्ञ का सोलह आने फल मिलता है। जहाँ फल में विषमता है, उसको यज्ञ कहते हैं। जहाँ फल में समता है, उसको सत्र कहते हैं। भागवत की कथा यज्ञ नहीं है-भागवत की कथा ज्ञान-सत्र है। कथा में जितने बैठते हैं, सभी यजमान हैं। बदरीनारायण के मार्ग में अनेक प्रयाग आते हैं। सबसे पहले 'देव-प्रयाग' आता है, जहाँ श्रीरामचन्द्र जी विराजमान हैं। आगे जाओ तो 'रुद्र-प्रयाग' आता है, जहाँ भगवान् शंकर का निवास है।
अलकनन्दा, गंगा और मन्दाकिनी-गंगा का जहाँ संगम होता है। आगे जाओ तो 'विष्णु-प्रयाग' आता है। बदरीनारायण से चार-पाँच मील दूर 'केशव-प्रयाग' तीर्थ है, जहाँ गंगा और सरस्वती का मधुर मिलन है। वहाँ महर्षि व्यास विराजमान हैं। हिंसा प्रतिहिंसा उत्पन्न करती है। हिंसा बड़ा पाप है। जिस घर में कलि आता है। भागवत की कथा सुनते हो, आप वैष्णव हो। कथा सुनने के बाद ऐसा नियम लो कि मेरे भगवान जिसको स्वीकार करते हैं, वही प्रसाद मैं लूँगा। भगवान जिसको स्वीकार नहीं करते, वह मैं कभी नहीं खाऊँगा।
भगवान को कोई पान-सुपारी अर्पण करे तो भगवान् उसको स्वीकार करते हैं। भगवान् को कोई तम्बाकू अर्पण करे तो भगवान् 'ना' बोलते हैं। तम्बाकू पीना, तम्बाकू खाना, तम्बाकू सूँघना बड़ा पाप है-जिसको भगवान भी स्वीकार नहीं करते हैं। तम्बाकू तन को बिगाड़ता है, मन को भी बहुत बिगाड़ता है। बहुत से लोग अच्छी-अच्छी पुस्तकें पढ़ते हैं ठीक है। शान्ति से बैठकर भजन नहीं करते। अच्छी पुस्तकें पढ़ने से बहुत लाभ नहीं है। जो बहुत पुस्तकें पढ़ता है, वह बातें करता है। जो बहुत पुस्तकें पढ़ता है, उसका शब्दज्ञान बढ़ता है। शब्द ज्ञान जब बहुत बढ़ जाता है। तो वह साधु-सन्तों की भी परीक्षा करता है। बहुत पढ़ा-लिखा कथा में जाता नहीं है। कदाचित् जाय तो वह अकड़ में ही बैठकर कथा सुनता है।


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