भगवान, परमात्मा, ईश्वर
जो प्रेम से भगवान के चरणों में वन्दन करता है, उसको भगवान शक्ति
देते हैं। जिसको भगवान की शक्ति मिली है, उसकी कभी हार नहीं
होती। जीव अपनी शक्ति में विश्वास रखकर काम करता है, तब उस
की हार होती है। जीव अल्पशक्ति है, परमात्मा अनन्त शक्तिमान हैं
कोई भी कार्य करो, तब सर्वप्रथम अपने भगवान के चरणों में वन्दन
करो। भगवान की जय बोलने से भगवान को लाभ नहीं है-आपको
लाभ है। भगवान की कभी हार नहीं हुई है और भगवान की कभी हार
होने वाली भी नहीं हैं हार तो मानव की होती है।
एक भाई ने पूछा था-'भगवान की सेवा पूजा करते हो?' उसने ऐसा
जवाब दिया कि 'महाराज, मुझे फुरसत नहीं है।' साबुन लगाकर आधा
घण्टा नहाने की फुरसत मिलती है कितने ही लोग साबुन बहुत घिसते
हैं। बहुत साबुन लगाने से कहीं 'कलर' बदलता है भगवान ने जिसको
जो रंग दिया है, वह कोई नहीं बदल सकता। कितने लोग दिनभर
साबुन ही घिसते रहते हैं। मानव देह की पूजा करता है देह का श्रृंगार
करता है। जीवन विलासी हो गया है। इसी लिये भगवान की पूजा गौण
हो गयी, देह की पूजा मुख्य हो गयी। इस प्रकार जीवन भगवद्-विमुख
हुआ है। भक्ति छिन्न-भिन्न हुई है। यह हमारे जीवन की ही कथा है।
जीवन में पैसा मुख्य हो गया, परमात्मा गौण हो गया जीवन में काम-
सुख मुख्य हुआ है, भक्ति गौण हो गयी।
वैष्णव इसी लिये गले में तुलसी की कण्ठी धारण करते हैं। ये शरीर
भोग के लिये नहीं है-यह शरीर भगवान को अर्पण हो गया। जिस वस्तु
में आप तुलसी-पत्र रखते हो, वह कृष्णार्पण हो जाती है। तुलसी-पत्र
के बिना भगवान स्वीकार नहीं करते। गले में तुलसी की माला धारण
करने का अर्थ यह है कि यह शरीर अब भगवान को अर्पण हुआ है।
शरीर भगवान का है, शरीर भगवान के लिये-शरीर अब भोग के लिये
नहीं है। बहुत-से लोग गले में तुलसी की कंठी तो धारण करते हैं
-उसका अर्थ नहीं समझते।
भगवान से माँगना नहीं। कदाचित् आप को शंका हो कि हम भगवान से
सुख माँगे-तो ये क्या खराब है, अयोग्य है-नहीं, यह अयोग्य नहीं है, किन्तु
यह योग्य भी नहीं है। भगवान ने हमें जो भी दिया है, वह विचार पूर्वक दिया
है। भगवान ने कम नहीं दिया है। भगवान विचारपूर्वक देते हैं।
एक बालक को माँ भी विचार करके ही देती है। बालक को क्या देना
है-कब देना है-कितना देना है ?- माँ इसका विचार करती है। माँ भी
बालक को ज्यादा नहीं देती है। माँ का बालक में अतिशय प्रेम है।
सबको लडडू देती है, पर बालक को नहीं देती है क्योंकि माँ जानती है
कि बालक के पेट में अजीर्ण है।
पुजारी जी महाराज ने समझाया कि बद्रीनाथ महाराज दिन भर ध्यान
करते है।, तप करते है-इससे श्रीअंग में गर्मी बढ़ जाती है। इसलिये
चन्दन अर्पित किया जाता है। भगवान जगत् को बोध देते हैं कि मैं भी
तप करता हूँ-तप करो। भगवान शंकर को हिमालय में गर्मी होती है।
तपश्चर्या करने से श्रीअंग में गर्मी बढ़ जाती है। भगवान जगत् को
शिक्षा देते हैं कि मैं ईश्वर हूँ तो भी तप करता हूँ। जो तप नहीं करता है,
उसका पतन हो जाता है। 'तप' शब्द को उल्टा दो तो 'पत' हो जायगा।
मन से किया हुआ पाप भोगना ही पड़ता है। मन से कोई भगवान का
ध्यान करे, मन से पूजा करे, मन से वन्दन करे-उसका पुण्य है।
भगवान नारायण का दर्शन करो, नारायण के चरणों में वन्दन करो।
जीव ईश्वर का अंश है। जो जीव भगवान का अंश है, वह जीव भगवान
के चरणों में जाय-भगवान के साथ एक हो, तभी जीव का कल्याण है।
जीव किसी जीव का अंश नहीं है, जीव जगत् का अंश नहीं है-जीव
ईश्वर का अंश है। जन्म से कोई पति नहीं है, जन्म से कोई पिता नहीं
है, जन्म से कोई पत्नी नहीं है। पिता-पुत्र का सम्बन्ध, पति-पत्नी का
सम्बन्ध व्यवहार की दृष्टि से सत्य है, तत्त्व-दृष्टि से विचार करने पर
यह सत्य नहीं है। जीव ईश्वर का अंश है, जीव ईश्वर से अलग हुआ
है। जीव जबतक भगवान के चरण में न जाय, प्रभु को न मिले, भगवान
के साथ एक न हो-तब तक जीव का कल्याण नहीं है।
कर्म योगी भी प्रभु-प्रेमी होता है, किंतु कर्म-मार्ग में दोष है। सत्कर्म
करने से अभिमान बढ़ता है। दिन भर सत्कर्म करो, पर ऐसा मानो कि
यह सब मेरे भगवान करते हैं। प्रेम का परिणाम समर्पण है। दिन भर
सत्कर्म करो, सत्कर्म भगवान को अर्पण करो-मैंने कुछ नहीं किया है।
सत्कर्म करने के बाद मन में अभिमान आये तो सत्कर्म भी पतन करता
है। कर्मयोगी प्रभु-प्रेमी होना चाहिये। ज्ञानी प्रभु-प्रेमी होना चाहिये।
प्रेम से कर्म और ज्ञान सफल होते हैं। जहाँ कम प्रेम है, वहाँ जीव भी
अपने स्वरुप को छिपाता है। जहाँ अतिशय प्रेम है, वहाँ जीव अपने
स्वरुप को प्रकट करता है। अब बहुत ज्ञान की जरुरत नहीं है।
कलयुग आ रहा है-लोग बड़ी-बड़ी ज्ञान की बातें करेंगे, पर एक-एक
पैसे के लिये झगड़ा भी करेंगे। लोग बड़ी-बड़ी ब्रह्मज्ञान की बातें करते
हैं, किन्तु प्रातः काल में छः-सात बजे उन्हें आदत के अनुसार चाय न
मिले तो उनका ब्रह्मज्ञान कहाँ चला जाता है।
सन्तों में भी दोष होता है। इस संसार में निर्दोष एक परमात्मा हैं, निर्दोष
भगवान श्रीराम हैं, भगवान शंकर निर्दोष हैं। सभी में एक-आध दोष
होता है। शास्त्रों में ऐसा लिखा है-जो मल-मूत्र से भरे हुए शरीर में
रहता है, उसने बड़ा भारी पाप किया है। उसने महान भूल की है-इसी
लिये मल-मूत्र से भरे हुए शरीर में वह आया है। सन्तों में एक-आध
दोष होता है, किंतु सन्तों मे अनेक सद्गुण होते हैं। दुर्जन को सन्त में
दोष दिखता है। जो अपने को बड़ा सयाना समझता है, ऐसा मानव
भगवान में भी 'भूल' खोजता है। कितने ही लोग ऐसे होते हैं, जो अपने
को बड़ा सयाना समझते हैं-मैं सब कुछ जानता हूँ, मैं सब पढ़ा हूँ।
जो गोबर का कीड़ा है, वह ऐसा मानता है कि गोबर बहुत मीठा है,
गोबर बहुत अच्छा है। गोबर का जो कीड़ा है, उसको वहाँ से उठाकर
बर्फी पर रख दो तो वह बर्फी को खायेगा नहीं-वह बर्फी को छोड़ देता
है। वह गोबर में ही जाता है। साधारण मानव का मन गोबर के
कीड़े-जैसा ही होता है। उसको संसार मीठा ही लगता है। संसार में
मजा है-भगवान का दर्शन करने की क्या जरुरत है? अति पाप होने से
भगवान दर्शन करने की इच्छा ही नहीं होती है।
कितने ही लोग ऐसे होते हैं, जिन्हें प्रातः काल में अखबार पढ़ने की
इच्छा होती है। राह देखते हैं-अभी नहीं आया, अभी नहीं आया!
प्रातःकाल में भगवान का दर्शन करने की इच्छा नहीं होती है?
मन अशुद्ध है। पाँच प्रकार की शुद्धि जिसकी परिपूर्ण है, उसी को
भगवान का दर्शन करने की इच्छा होती है। मातृ-शुद्धि, पितृ शुद्धि,
वंश-शुद्धि, अन्न-शुद्धि और आत्म शुद्धि। 'वन्दन' भगवान को बन्धन में
डालता है। वैष्णव भगवान को 'वन्दन' से ही वश में करते हैं। जगत् में
जो कुछ भी है, उसके मालिक तो भगवान हैं। जीव ईश्वर को क्या
दे सकता है? भगवान ही जीव को देते हैं।
बाल्यावस्था में जीव का रक्षण भगवान करते हैं। यह तो जवानी से भान
भूलता है-ईश्वर कहाँ हैं? मैं नहीं मानता' भगवान को कोई न माने,
इससे भगवान का नुकसान नहीं होता। भगवान को जो मानता नहीं
है-एक दिन वह बहुत दुखी हो जायगा। साढ़े साती आती है, तब शनि
महाराज एक-एक को सजा करते हैं। तब कितने लोग हनुमान जी को
तेल चढ़ाने के लिये जाते हैं-थोड़ी अकल आती है। भगवान को मानना
ही चाहिये, भगवान को मानने से लाभ है।
आज कल बहुत से लोग डॉक्टर को बहुत मानते हैं। भगवान को इतना
नहीं मानते हैं, जितना डॉक्टर को मानते हैं। डॉक्टर में बहुत विश्वास
रखते हैं। ऐसा समझते हैं कि डॉक्टर ने मुझे बचा लिया। अरे, डॉक्टर
क्या बचायेगा-जो काल के आधीन है-वह दूसरे को क्या बचा सकता
है? डॉक्टर में बचाने की शक्ति हो तो उसका मरण क्यों होता है? बचाने
वाले भगवान हैं। रक्षण भगवान करते हैं। भगवान को मानों भगवान के
उपकार का स्मरण करो। सभी जीवों का रक्षण भगवान करते हैं।
बहुत-से लोग साधु-सन्तों को भोजन कराते हैं, ब्राह्मणों को भोजन
कराते हैं, गरीबों को अन्नदान करते हैं अच्छा है-अति उत्तम तो यह है
कि घर में ही पवित्रता से, प्रेम से भगवान के लिये सुन्दर सामग्री
बनायें-मेरे भगवान भोजन करेंगे, मैं भगवान के लिये करता हूँ। प्रेम से
बालकृष्ण को मनाओ, प्रेम से थोड़ी बातें करो। जो प्रेम से मनाता है, तब
बालककृष्ण थोड़ा-सा खाते हैं। भगवान को जो प्रेम से भोजन कराता
है, उसको जगत् को भोजन कराने का पुण्य मिलता है।
जहाँ भी जाओ, वहाँ दुर्वासना भी पीछे-पीछे आती है। सुख भोगने की
इच्छा ही दुर्वासना हैं बँगले में जो रहता है, उसी को दुर्वासना त्रास देती
है-ऐसा नही हैं जो वन में रहता है, उसके पीछे भी दुर्वासना पड़ती है।
जहाँ जाओ, वहाँ वासना है किंतु परमात्मा के साथ जो अतिशय प्रेम
करता है। वासना के त्रास से वो ही छुड़ा सकते हैं। ज्ञानी हो या
योगी हो परमात्मा के साथ अतिशय प्रेम करें।
शास्त्रों में कहीं-कहीं ऐसा वर्णन मिलता है कि भगवान से भी सद
गुरुदेव श्रेष्ठ हैं भगवान के समान कोई नहीं है, भगवान से श्रेष्ठ कौन
हो सकता है? तो भी कहीं-कहीं ग्रन्थों में ऐसा वर्णन किया गया है
कि सद् गुरुदेव भगवान से भी श्रेष्ठ हैं। इसका कारण भी बताया
है-भगवान ने संसार की ऐसी रचना की है कि प्रायः सभी का मन
संसार में फँसा हुआ ही रहता है। विषयों में ऐसा आकर्षण भर दिया है
कि विषय मीठे ही लगते हैं। संसार में जीव को सौन्दर्य दिखता है।
जिसको आत्म स्वरुप का ज्ञान नहीं है, जिसने परमात्मा का दर्शन
बराबर नहीं किया है, उसका मरण बिगड़ जाता है। जीव भगवान को
तो जानता नहीं है, अपने स्वरुप को भी बराबर नहीं जानता है। जीव
संसार-सुख में ऐसा फँसा हुआ है कि वह अपने स्वरुप को देखता नहीं
है। आपने कभी अपना स्वरुप देखा है? जिसने अपने स्वरुप को देखा
नहीं है, जिसको अपने स्वरुप का ज्ञान नहीं है, उसको जगत् का ज्ञान
सच्चा नहीं है। जीव ईश्वर को तो जानता नहीं है, जीव अपने स्वरुप
को भी बराबर समझता नही है।
घर में भगवान का स्वरुप स्थापित करो। घर में देव-पूजा होनी ही
चाहिये। जिस घर में देवों की पूजा नही होती है वह घर घर नहीं
है-शमशान है। घर में भगवान की स्थापना करो, प्रेम से पूजा करो,
भगवान का सुन्दर श्रृंगार करो। भगवान नित्य सुन्दर हैं। भगवान
के नाम का जप करो। भगवान की थोड़ी प्रार्थना करो-हे भगवान!
कृपा करो-मुझे नजर दो। भगवान की आँख में ज्ञान और वैराग्य
है-राम देवें नजर तुमको तो सभी सूरत राम की है।
निद्रा में आनन्द नही है-जगत् की विस्मृति है निद्रा में परमात्मा का
अनुभव नहीं होता है। जगत् की विस्मृति हो तो परमात्मा का अनुभव
हो। परमात्मा आनन्दमय हैं। निद्रा में जीव जगत् को भूल जाता है।
जगत भूलने से शान्ति मिलती है। संसार में शान्ति हो, तो सब कुछ
छोड़ कर के मानव को निद्रा की इच्छा क्यों होती है? बड़ा राजा हो,
उसको भी राजमहल में शान्ति नहीं मिलती है। राजमहल को भूल
जाता है, उसको निद्रा आती है-तब शान्ति मिलती है। बहुत-से लोग
तो निद्रा के लिये गोली खाने लगे हैं।
तू निश्चय कर कि किसी के पेट में जाना नहीं है। अब किसी की पत्नी
भी होना नहीं है, अब किसी का पति होना नहीं है। अब परमात्मा के
साथ एक होना है। माँ! तू ही अपने ऊपर कृपा कर माँ! अब मुझे यहाँ
से जाना है। सावधान हो करके साधन करो। मैने जो उपदेश दिया
है, इस उपदेश में श्रद्धा रखो।'
शक्ति के बिना भक्ति नहीं होती। माँ बहुत दयालु हैं। ज्ञान-शक्ति,
क्रिया-शक्ति और द्रव्य-शक्ति के आधार से जगत् है। शक्ति की
पूजा सभी के लिये अति आवश्यक है।
भगवान नारायण की पूजा करो। नारायण आकाश तत्व के मालिक देव
हैं। आकाश का रंग श्याम है। नारायण श्याम सुन्दर हैं। आकाश तत्व
के मालिक भगवान महाविष्णु हैं। महाविष्णु की पूजा सभी के लिये अति
आवश्यक है। भोग और मोक्ष नारायण देते हैं। जितने सुख की बहुत
जरुरत है, उतना सुख भगवान सभी को देते हैं। सुख में भी जो बहुत
भक्ति करता है, भगवान धीरे-धीरे उसका मन खींच लेते हैं। संसार का
सुख भोगने से किसको शान्ति मिली है-संसार-सुख में भी जो भक्ति
नहीं छोड़ता है-भगवान उसके मन का आकर्षण करते है।-मन को
खीच लेते हैं। भोग और मोक्ष नारायण देते हैं।
शिव-पूजन सभी के लिये आवश्यक है। ज्ञान नहीं है, वैराग्य नहीं है,
इसलिये मानव दुखी होता है। ज्ञान-वैराग्य से शान्ति मिलती है।
कितने ही लोग ऐसे होते हैं, जो घण्टा-दो घण्टा के लिये लाइट चली
जाय तो हृदय को जलाते है।-'लाइट गयी! लाइट गयी !! ' अरे,
'लाइट' तो गयी-तू तो नहीं गया! शान्ति से भगवान का नाम ले।
लाइट को जाने दे !
वैराग्य नहीं है, ज्ञान नहीं है, इस लिये मन अशान्त हो जाता है! जो
ज्ञान-गंगा को मस्तक में धारण करता है, वह जीव 'शिवरुप' होता है।
शिव ज्ञान-वैराग्य देते हैं। पाँच घण्टे का समय भगवान के लिये रखें
भगवान सम्पत्ति नहीं माँगते है। मेरे लिये कितना समय रखा है-चौबीस
घण्टे में, ज्यादा नहीं तो पाँच घण्टे का समय भगवान के लिये रखो।
'बेटा! भीख माँगना है तो भगवान के पास भीख माँगनी चाहिये। जगत्
दरिद्री है। जगत् में श्रीमान एक श्रीकृष्ण ही हैं। जीवन में कैसा भी दुःख
का प्रसंग आये- दुःख की कथा किसी मानव को कहना ही नहीं
एकान्त में भगवान से कहो। जीवन में कोई भी दुःख प्रसंग आये-
घबराना नहीं।'
बालक ने कहा है-'परमात्मा के लिये मैंने घर छोड़ा है। मेरी माँने मुझे
कहा है कि नारायण मेरे पिता हैं। भगवान की गोद में मुझे बैठना है। जो
भगवान का स्वरुप आपको अतिशय प्रिय लगता है, उस स्वरुप को
इष्टदेव मानों, सभी देवों को वन्दन करो, सभी की पूजा करो। ध्यान
और स्मरण एक देव का ही करो। अनेक का ध्यान करने से, अनेक का
चिन्तन करने से शक्ति बिखर जाती है। एक का ध्यान-स्मरण करने से
शक्ति बढ़ती है।
जीव स्त्री है। जिसको भय लगता है, उसको स्त्री कहते हैं। जो
निर्भय है, वही पुरुष है। शास्त्रों में स्त्री का लक्षण बताया है-जो
परतन्त्र है, वही स्त्री है और जो स्वतन्त्र है, वही पुरुष है। यह जीव
स्वतन्त्र नही है-परतन्त्र है। इसीलिये जीव को स्त्री-रुप माना है।
सभी के पति परमात्मा हैं। सभी के पिता परमात्मा हैं। भगवान को पिता
मानो, भगवान को स्वामी मानो-ईश्वर के साथ कोई भी सम्बन्ध
बनाओ। ध्रुव जी ने भगवान को पिता माना है-भगवान मेरे पिता हैं और
मैं उनका अज्ञानी बालक हूँ।
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