Swargvibha
Dr. Srimati Tara Singh
Administrator

बहन ! से कभी जीत ही नही सकते !

 

बहन ! से कभी जीत ही नही सकते!


मालती ने झाँक कर देखा- मिसेज अग्रवाल पूरा श्रंगार करके भाई को राखी बाँधने जाने वाली थी। नीचे लड़के-लड़कियाँ मामा, मामी-मामी करके चिल्ला कर घर सर पर उठाये थे। रक्षा-बंधन का त्योहार, बेसब्री से इंतजार ... । पूरी कालोनी में उल्लास ही उल्लास .... । अरे तुम तैयार नहीं ... । अग्रवाल भाभी बोली। भयंकर मुकदमे बाजी चल रही है, कहीं से कोई खास बात नहीं है। ये और भइया! क्या कहूँ ? किसे क्या समझाऊँ ?- इन्होंने सख्त मना कर दिया है कि घर नहीं जाना है- हमने रिश्ता खत्म

कर दिया है-और वह रुआँसी होकर - दरवाजे के सहारे खड़ी हो गई।- आँखों से मोती ... ।

तो क्या हुआ ? तुमने तो रिश्ता खत्म नहीं किया है। मगर मैं तो तुम्हारे भईया को बुलाकर ला ही सकती हूँ।- और वह राखी की थाली वहीं रखकर बगल वाले मुहल्ले की तरफ चल दी। मैं काफी बड़ी हूँ, देखती हूँ, कैसे नहीं आयेगा। मेरा कहा भी तो मानता है।

अपने व्यवहार की सजा बहन को क्यों दे रहे हो ? तुम कैसे भाई हो ? बड़े भाग्य से लोगों को बहनें मिलती हैं। एक शब्द में समझा लो कैसा कुछ भी बिगाड़ है- मगर इस रिश्ते से ऊपर कोई रिश्ता हीं। फिर भी मुकदमा जीतेगा 'हार' तुम्हारी ही होगी। तुम बहन को तकलीफ नहीं पहुँचा पाओगे। तुमने छोटी बहन को विदा करते समय 'अभयदान' दिया है- चलो! इसीसमय बहन से राखी बँधवाओ! उसने कल से कुछ नहीं खाया है और आँखें सूज कर दो गुनी हो गई हैं। बाद में जो समझना वो करना। लोग तरसते हैं- राखी बँधवाने के लिये। फिर छोटी बहन को लोग बेटी की तरह प्यार करते हैं। आज तुम्हारे ऊपर विशेष कृपा हो गई। तुम्हारी बुद्धि शुद्ध .... ।

अरे! भाभी जी! फिर कुछ समझने को बाकी ही कहाँ रह जायेगा। सारी मुकदमे बाजी की फाईलें कपड़े में बाँधने लगे-गठरी साथ लेकर उनके साथ चल दिये- सोच तो मैं भी रहा था। गलती पर मैं खुद हूँ। आज भगवान .. । पहले-पहले आँसू पोंछे, सर पर हाथ रखा, पहले मुझे माफ कर दो। ला राखी बाँध और मुँह मीठा करा। गलती मैंने की-दुबारा कभी नहीं करूँगा।

आँखें मलते हुये- और हाथ जोड़कर खड़े हो गये। - उपहार में आज मुकदमें बाजी की सारी फाइलें लाया हूँ, आज सारे मुकदमें खत्म। बहन की खुशी के लिये सब न्यौछावर ..... । मैं खुद से हार गया हूँ- मैं तुमसे कभी जीत नहीं सकता, मैं अपने अभयदान से कभी मुकर ही नहीं सकता हूँ। भाभी जी ने मुझे आँखें ... ।

बगल में खड़े पति के सामने वह तिलक लगाकर राखी बाँध रही थी- आँखों से मोती ढुलक कर थाल में गिर रहे थे। 'इन्होंने' भी भइया को सीने से लगा लिया। देखो! भगवान प्रसन्न ... नन्हीं नन्हीं बूंदे .... । - साथ खड़ी मिसेज अग्रवाल की आँखों से खुशी के आँसू ढुलकने लगे। जीवन में यह आँसू नहीं मोती हैं। मैं कितनी भाग्यवान हूँ जो ईश्वर ने इस मिलन में मुझे माध्यम बनाया। इन्होंने अपने गले की माला उनको पहना दी। आज मैं खुद धन्य हो गई हूँ, इतनी खुशी पहली बार ... । 

सारे सुखों से सर्वोपरि है, मिले बहन का प्यार।

तिलक लगाये राखी बाँधे, करे भाई की जै जै कार।

Powered by Froala Editor

LEAVE A REPLY
हर उत्सव के अवसर पर उपयुक्त रचनाएँ