| Sun, Aug 3, 1:19 PM (16 hours ago) |
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ना हँसने की चाहत होती ना रोने का मन करता है,
क्या जाने प्राणों का दीपक, अब भी किस कारण जलता है
कैसे अजब मोड़ पर जीवन ने धर दिया मुझे ले आकर,
साँसों से नफरत होती है, धड़कन से भी डर लगता है।
मंजिल कोई नहीं कि जिसको पाने की हसरत बाकी हो,
पर ना तो रुकना भाता है, ना चलने को पग बढ़ता है।
खुश ही होगे मुझे छोड़कर, हँसते होगे हृदय तोड़कर,
कैसा पागल हूँ जो तुमसे अब भी मेरा घर बसता है।
ना तुमसे जुड़ने का मन है, नहीं छोड़ने का मन भी अब,
उम्र बीतती है ऐसे भी, ऐसे भी जीवन कटता है।
जिसको भी मुझसे दिक्कत है, जिसको भी मुझसे किल्लत है,
उस पर मेरा मुझ पर उसका आखिर क्या ही हक बनता है।
तुम खुश हो तो मैं भी खुश हूँ, क्योंकर रोना, क्या कुछ गाना,
ना गीतों में रस आता है, ना गजलों में मन रमता है।
तुम न याद रख सके मुझे जब मैं ही तुमको याद रखूँ क्यों,
पल दो पल की इस दुनिया में सालों कौन साथ चलता है।
गौरव शुक्ल
मन्योरा
लखीमपुर खीरी
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