मैं मर भी जाऊं तो चूड़ी न उतरवाना तुम
हो मांग जैसे सजाती यूं ही सजाना तुम ।
पैर के बिछुए तुम्हारे ये होंठ की लाली,
नाक की नथ हसीन और कान की बाली ;
जहां जो कुछ है, जैसे है, उसे सजा रखना
रोज मेकअप नये करना, नये फैशन करना।
सोच लेना हमारी शादी हुई ही कब थी?
गवाह कौन बना था सजी डोली कब थी?
और वो प्यार सरोकार सब छलावा था,
वो कसमे वादे इंतजार सब दिखावा था।
फोन पर की गई बातों को कौन पूछेगा?
कौन sms व mms की गवाही देगा?
कौन अनजान सी सुनसान सी उन जगहों पर?
जहां बिताए हमने साथ-साथ पहरों पहर,
वो मंदिरों में साथ साथ इबादत करना,
साथ जीने की साथ मरने की मिन्नत करना।
कहेगा कौन उनका क्या हुआ बताओ तो?
उस गहरे राज से पर्दा जरा उठाओ तो?
प्रसाद बीर बाबा को चढ़ाने कौन गया?
वो जिंदबाबा को चादर उढ़ाने कौन गया?
वो बारिशों में साथ साथ कौन भीगा था?
वो झूला किसने कब कहां खरीदा था?
यह सब सवाल के सवाल ही रह जाएंगे,
जवाब मांगने को लोग नहीं आएंगे।
सभी जवाबदेहियों से अब आजाद हो तुम,
मेरे मरने के बाद हो गई आबाद हो तुम।
मैं न भूला हूं न भूलूंगा जिंदगी कट जाय,
मैं न बदला हूं न बदलूंगा गला ही कट जाय।
मैं जानता हूं तुम्हें मेरी जरूरत कब थी,
तुम्हारे में मेरे जज्बात की इज्जत कब थी।
जब से पैदा हुआ रुसवाईयां मिली मुझको,
जितना बढ़ता गया बदनामियां मिली मुझको।
फिर भी मन में मेरे सभी के लिए प्यार क्यों है?
मुझे समझेगा कोई इसका इंतजार क्यों है?
मुझे जीने का कोई एक बहाना तो मिले,
जहां में चेहरा कोई एक पहचाना तो मिले।
ये पूरी दुनिया मेरे लिए अजनबी सी है,
जिधर निगाह उठाता हूं गंदगी ही है।
ये आलीशान महल, और यह चमचमाती कारें,
ये दिखावट, ये बनावट, ये सजावट सारे ;
किसी के खून के कतरों से गयी टाँकी है,
किसी के आंसुओं जख्मों से सजी झाँकी है।
यहां किसी का कोई एक तो सगा होता,
काश दुनिया में कोई एक तो अपना होता।
जो मेरा दर्द समझता लगाता सीने से,
किसी को मिलती खुशी तो हमारे जीने से।
मगर यह दुनिया एक भ्रम है एक जाल सिरफ,
सभी मतलब के रिश्ते नातों का बवाल सिरफ।
जितनी जल्दी ये जाल टूट जाय बेहतर है,
जितनी जल्दी बवाल छूट जाए बेहतर है।..........
गौरव शुक्ल
मन्योरा
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