Swargvibha
Dr. Srimati Tara Singh
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मैखाने के दरवाजे से गुजरा तो,

 
मैखाने के       दरवाजे    से गुजरा तो,
आज बहक जाने का मन फिर हो आया।

अपने भी दिन थे  अपनी भी रातें थीं,
मैखाना था यही, सही है याद    मुझे।
जहाँ दौर के दौर जाम के चलते    थे,
दिन में दिखलाई देता था चाँद   मुझे।

अपनी मर्जी से   मैं उठा  यहाँ से कब,
लाया गया उठाकर तब  घर आ पाया।
कदम लड़खड़ाये,आवाज लड़खड़ायी,
चूर नशे में होकर सब कुछ   बिसराया।

वह सुरूर का आलम,   वह बेतरतीबी,
बेहिसाब पीना, बेहोश   पड़े    रहना।
बदनामी से  बेफिक्री, इस दुनिया से-
होकर के बेखबर ,कहे जो मन, करना।

मैं था ,मय थी, मैखाना था, साकी था,
अपनी दुनिया केवल इतनी थोड़ी  थी।
अपनों ने, मित्रों ने,        रिश्तेदारों ने,
समझाने में कोर कसर क्या छोड़ी थी।

अपनी धुन में मस्त,जिंदगी को अपनी,
अपनी शर्तों पर जीने की   ठाने    था।
सब उसूल झूठे थे दुनिया के, उनका-
नहीं नजर में मेरी कोई       माने था।

वक्त सरकता गया बहुत ही तेजी  से,
पलक झपकते साल महीने बीत गये।
नये नये पीनेवाले  भी      आ पहुँचे,
मैखाने ने भी रँग अपना लिये    नये।

मँहगी हुई  शराब, कीमतें बदल गयीं,
सरोकार बदले,सारा कुछ बदल गया।
पास हमारे भी जब   कौड़ी नहीं बची,
मेरा सब कुछ जब मैखाना निगल गया।

हम हो गये पुराने,उस पर मुफलिस भी,
एक करेला ज्यों,ऊपर से नीम    चढ़ा।
ढली जवानी भी ,कुछ बाल सफेद हुए,
तब हमको अपनाने कोई नहीं    बढ़ा।

आखिरकार एक   दिन ऐसा भी आया,
मना किया साकी ने हमें  पिलाने    से।
बेहद बेइज्जती        बड़ी बेअदबी से,
हमें निकाला       गया इसी मैखाने से।

कितना दर्द हुआ, कितने आँसू  निकले,
लफ्जों में बयान करना नामुमकिन   है।
मरे नहीं बस , क्योंकि जिंदगी बाकी थी,
ज्यों-त्यों करके बीत गया वह भी दिन है।

ज्यों-त्यों करके  सीख लिया है जीना भी,
ज्यों-त्यों करके छूट गया     है पीना  भी।

छोड़ो, आगे चलो,    पड़ी पूरी    दुनिया,
उसे याद क्यों करूँ,   दौर जो खो आया।

मैखाने के        दरवाजे    से गुजरा तो,
आज बहक जाने का मन फिर हो आया।
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दि०-१५.११.२०१५      - गौरव शुक्ल
                                     मन्योरा
                             लखीमपुर खीरी

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