इंजी. अम्बरीष श्रीवास्तव 'अम्बर'
होली कुण्डलिया
जलती होली द्वेष की, दंभ ईर्ष्या नष्ट।
चीख रही है होलिका असुरों को है कष्ट।
असुरों को है कष्ट, नष्ट उनके मंसूबे।
गले मिल रहे लोग, स्नेह रस में सब डूबे।
छाया स्नेह व प्यार, किंतु माया है छलती।
भारी पड़ते पुण्य, पाप की होली जलती।
--इंजी0 अम्बरीष श्रीवास्तव 'अम्बर'
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