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सम्पूर्ण विश्व को पर्यावरण केंद्रित नए विकास मॉडल की आवश्यकता

 

सम्पूर्ण विश्व को पर्यावरण केंद्रित नए विकास मॉडल की आवश्यकता

डॉ. शैलेश शुक्ला 

मानव सभ्यता आज जिस मोड़ पर खड़ी है, वहां से पीछे मुड़कर देखने पर विकास की चमक दिखाई देती है, लेकिन आगे देखने पर विनाश की भयावह छाया भी स्पष्ट दिखाई देने लगी है। विज्ञान, तकनीक, उद्योग, शहरीकरण और उपभोग की संस्कृति ने मनुष्य को अभूतपूर्व सुविधाएं दीं, परंतु इसी तथाकथित विकास ने पृथ्वी के पर्यावरणीय संतुलन को गहराई से घायल भी किया। आज पूरी दुनिया जलवायु परिवर्तन, ग्लोबल वार्मिंग, जल संकट, वायु प्रदूषण, जैव विविधता के विनाश, जंगलों की कटाई और प्राकृतिक आपदाओं के बढ़ते खतरे से जूझ रही है। यह केवल पर्यावरणीय समस्या नहीं, बल्कि मानव अस्तित्व का संकट बन चुकी है।

24 मई 2026 तक की परिस्थितियों को देखें तो स्पष्ट हो जाता है कि पृथ्वी लगातार चेतावनी दे रही है। कहीं तापमान 50 डिग्री सेल्सियस के करीब पहुंच रहा है, कहीं जंगलों में आग लग रही है, कहीं बाढ़ शहरों को डुबो रही है, तो कहीं सूखे से जीवन ठहरता जा रहा है। भारत सहित दुनिया के अनेक देशों में मौसम का स्वभाव तेजी से बदल रहा है। गर्मी की अवधि लंबी होती जा रही है, वर्षा अनिश्चित होती जा रही है और प्राकृतिक आपदाएं अधिक विनाशकारी बनती जा रही हैं।

सबसे चिंताजनक बात यह है कि यह संकट अचानक पैदा नहीं हुआ। यह दशकों से अपनाए जा रहे उस विकास मॉडल का परिणाम है, जिसने प्रकृति को केवल संसाधन माना, साझेदार नहीं। आधुनिक विकास की पूरी अवधारणा अत्यधिक उत्पादन, अत्यधिक उपभोग और निरंतर आर्थिक विस्तार पर आधारित रही। विकास को मापने के लिए सकल घरेलू उत्पाद, औद्योगिक वृद्धि और उपभोग क्षमता को प्राथमिक मानक बना दिया गया, जबकि पर्यावरणीय संतुलन, प्राकृतिक संसाधनों की सीमाएं और आने वाली पीढ़ियों के अधिकारों को गंभीरता से नहीं लिया गया।

आज दुनिया का बड़ा हिस्सा कंक्रीट के जंगलों में बदलता जा रहा है। प्राकृतिक जंगलों को काटकर शहर बसाए गए। नदियों को मोड़ा गया। पहाड़ों को विस्फोटों से तोड़ा गया। समुद्र तटों पर अंधाधुंध निर्माण हुआ। खनिजों और जीवाश्म ईंधनों का अत्यधिक दोहन किया गया। परिणामस्वरूप पृथ्वी का तापमान लगातार बढ़ता गया।

ग्लोबल वार्मिंग अब केवल वैज्ञानिक रिपोर्टों का विषय नहीं रह गया है। इसका प्रभाव सामान्य जीवन में स्पष्ट दिखाई देने लगा है। यूरोप में असामान्य गर्मी, कनाडा और ऑस्ट्रेलिया में जंगलों की आग, अमेरिका में चक्रवात और तूफान, अफ्रीका में जल संकट और एशिया में बाढ़ तथा लू की घटनाएं इस बात का प्रमाण हैं कि जलवायु असंतुलन पूरी दुनिया को प्रभावित कर रहा है।

भारत की स्थिति भी अत्यंत गंभीर होती जा रही है। दिल्ली, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र के कई क्षेत्रों में लगातार बढ़ता तापमान जीवन को कठिन बना रहा है। हिमालय क्षेत्र में ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं। नदियों का प्राकृतिक प्रवाह प्रभावित हो रहा है। कई राज्यों में जल संकट गहराता जा रहा है। खेती पर मौसम परिवर्तन का सीधा प्रभाव पड़ रहा है।

विडंबना यह है कि विकास का लाभ सीमित वर्ग तक पहुंचा, लेकिन पर्यावरणीय संकट का बोझ पूरी मानवता उठा रही है। अमीर देशों और बड़े उद्योगों ने पृथ्वी के संसाधनों का सबसे अधिक दोहन किया, लेकिन जलवायु परिवर्तन का सबसे गंभीर प्रभाव गरीब देशों और कमजोर वर्गों पर पड़ रहा है। गरीब किसान, मजदूर, मछुआरे और आदिवासी समुदाय सबसे पहले और सबसे अधिक प्रभावित होते हैं।

आज आवश्यकता केवल पर्यावरण संरक्षण की नहीं, बल्कि विकास की पूरी अवधारणा को पुनर्परिभाषित करने की है। दुनिया को ऐसे नए विकास मॉडल की आवश्यकता है जो प्रकृति विरोधी नहीं, बल्कि प्रकृति सहयोगी हो। ऐसा मॉडल जिसमें आर्थिक प्रगति और पर्यावरणीय संतुलन साथ-साथ चलें।

वर्तमान विकास मॉडल की सबसे बड़ी समस्या यह है कि यह “अनंत विकास” की कल्पना पर आधारित है, जबकि पृथ्वी के संसाधन सीमित हैं। यदि पूरी दुनिया उसी उपभोग स्तर को अपनाने लगे जो विकसित देशों में है, तो पृथ्वी के संसाधन बहुत जल्दी समाप्त हो जाएंगे। इसलिए विकास का अर्थ केवल अधिक उत्पादन और अधिक उपभोग नहीं हो सकता।

पर्यावरण केंद्रित विकास मॉडल का पहला आधार “सतत विकास” होना चाहिए। अर्थात ऐसा विकास जो वर्तमान आवश्यकताओं को पूरा करे, लेकिन भविष्य की पीढ़ियों के अधिकारों को नुकसान न पहुंचाए। इसके लिए ऊर्जा, उद्योग, परिवहन, कृषि और शहरीकरण की नीतियों में व्यापक परिवर्तन आवश्यक हैं।

ऊर्जा क्षेत्र में जीवाश्म ईंधनों पर निर्भरता कम करनी होगी। कोयला, पेट्रोलियम और गैस का अत्यधिक उपयोग पृथ्वी के तापमान को बढ़ा रहा है। सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा, जल ऊर्जा और अन्य नवीकरणीय स्रोतों को प्राथमिकता देना समय की मांग है।

शहरी विकास को भी नए दृष्टिकोण से देखना होगा। आज अधिकांश शहर बिना पर्यावरणीय योजना के फैलते जा रहे हैं। पेड़ों की कटाई, जलाशयों का अतिक्रमण और अत्यधिक कंक्रीटीकरण शहरों को “हीट आइलैंड” में बदल रहे हैं। हरित क्षेत्र बढ़ाने, वर्षा जल संरक्षण, सार्वजनिक परिवहन और ऊर्जा दक्ष भवनों को बढ़ावा देना आवश्यक है।

कृषि क्षेत्र में भी परिवर्तन की आवश्यकता है। रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों के अत्यधिक उपयोग ने मिट्टी की उर्वरता और जल स्रोतों को प्रभावित किया है। जैविक खेती, जल संरक्षण आधारित खेती और स्थानीय कृषि प्रणालियों को प्रोत्साहित करना होगा।

विश्व स्तर पर पर्यावरणीय न्याय की अवधारणा को भी मजबूत करना होगा। विकसित देशों की ऐतिहासिक जिम्मेदारी अधिक है, क्योंकि औद्योगिक क्रांति के बाद सबसे अधिक प्रदूषण उन्हीं देशों ने फैलाया। इसलिए जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए आर्थिक और तकनीकी सहयोग में उनकी भूमिका अधिक महत्वपूर्ण होनी चाहिए।

लेकिन केवल सरकारें और अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं ही पर्याप्त नहीं होंगी। समाज और व्यक्ति की भूमिका भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। आज उपभोग आधारित जीवनशैली पृथ्वी पर सबसे बड़ा दबाव बना रही है। आवश्यकता से अधिक खरीदना, अत्यधिक ऊर्जा उपयोग, प्लास्टिक पर निर्भरता और दिखावटी उपभोग पर्यावरण संकट को बढ़ा रहे हैं।

हमें अपनी जीवनशैली में संयम लाना होगा। “कम संसाधनों में बेहतर जीवन” की अवधारणा को स्वीकार करना होगा। यह केवल आर्थिक नहीं, बल्कि नैतिक प्रश्न भी है। प्रकृति के संसाधनों पर केवल वर्तमान पीढ़ी का अधिकार नहीं है। आने वाली पीढ़ियों का भी समान अधिकार है।

शिक्षा व्यवस्था में भी व्यापक परिवर्तन की आवश्यकता है। पर्यावरण शिक्षा को केवल पाठ्यक्रम का विषय बनाकर नहीं छोड़ा जा सकता। बच्चों और युवाओं को प्रकृति के साथ भावनात्मक और व्यावहारिक रूप से जोड़ना होगा। उन्हें यह समझाना होगा कि पर्यावरण संरक्षण कोई अतिरिक्त कार्य नहीं, बल्कि जीवन रक्षा का आधार है।

मीडिया की भूमिका भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। दुर्भाग्य से पर्यावरणीय मुद्दों को अक्सर उतनी प्राथमिकता नहीं मिलती जितनी राजनीति, मनोरंजन या बाजार को मिलती है। जबकि सच यह है कि यदि पर्यावरण संकट गहराता गया, तो बाकी सभी मुद्दे गौण हो जाएंगे।

धार्मिक और सांस्कृतिक संस्थाओं की भूमिका भी महत्वपूर्ण हो सकती है। दुनिया की लगभग सभी प्राचीन सभ्यताओं ने प्रकृति को सम्मान दिया। भारतीय परंपरा में नदियों, पर्वतों, वृक्षों और पृथ्वी को पूजनीय माना गया। यदि इन मूल्यों को आधुनिक जीवन में पुनर्स्थापित किया जाए, तो पर्यावरण संरक्षण सामाजिक आंदोलन बन सकता है।

आज पूरी दुनिया को यह समझना होगा कि पृथ्वी केवल आर्थिक गतिविधियों का मंच नहीं, बल्कि जीवन का आधार है। यदि जल, वायु, मिट्टी और जैव विविधता नष्ट हो जाएंगे, तो मानव सभ्यता की सारी उपलब्धियां भी टिक नहीं पाएंगी।

एक समय था जब मनुष्य प्रकृति के साथ संतुलन बनाकर जीवन जीता था। लेकिन आधुनिक उपभोक्तावादी संस्कृति ने मनुष्य को प्रकृति से अलग कर दिया। आज विकास का अर्थ अधिक उपभोग और अधिक संसाधन दोहन बन गया है। यही सोच पर्यावरणीय संकट की जड़ है।

दुनिया को अब “लाभ केंद्रित विकास” से “जीवन केंद्रित विकास” की ओर बढ़ना होगा। ऐसा विकास जिसमें प्रकृति, मानवता और भविष्य तीनों सुरक्षित रहें। अन्यथा वह दिन दूर नहीं जब पृथ्वी पर जीवन की परिस्थितियां अत्यंत कठिन हो जाएंगी।

कल्पना कीजिए उस भविष्य की, जहां स्वच्छ हवा खरीदनी पड़े, पीने योग्य पानी सबसे महंगी वस्तु बन जाए, खेती योग्य भूमि कम हो जाए और सामान्य तापमान में बाहर निकलना कठिन हो जाए। यदि आज भी मानवता नहीं चेती, तो यह कल्पना वास्तविकता बन सकती है।

इसलिए आज का सबसे बड़ा वैश्विक प्रश्न यही है—क्या मानव सभ्यता अपने विकास मॉडल को बदलने के लिए तैयार है?
 यदि नहीं, तो आने वाले दशकों में पर्यावरणीय संकट केवल प्राकृतिक नहीं रहेगा; वह आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक अस्थिरता का भी कारण बनेगा।

अब समय केवल सम्मेलनों और घोषणाओं का नहीं, बल्कि वास्तविक परिवर्तन का है। पृथ्वी को बचाने के लिए पूरी दुनिया को मिलकर एक ऐसे विकास मॉडल की ओर बढ़ना होगा जिसमें प्रकृति को नुकसान पहुंचाकर प्रगति हासिल करने की मानसिकता समाप्त हो।

क्योंकि अंततः सबसे बड़ा सत्य यही है—
 यदि पर्यावरण सुरक्षित नहीं रहेगा, तो मानव सभ्यता का कोई भी विकास स्थायी नहीं रह पाएगा।
 धरती बचेगी, तभी विकास बचेगा।
 प्रकृति बचेगी, तभी मानवता बचेगी।


डॉ. शैलेश शुक्ला | Dr. Shailesh Shukla

वैश्विक समूह संपादक, सृजन संसार अंतरराष्ट्रीय पत्रिका समूह | Global Group Editor,Srijan Sansar Group of International Journals

आशियाना, लखनऊ - 226012, उत्तर प्रदेश | Ashiyana, Lucknow – 226012, Uttar Pradesh

मो.| Mob.: 9312053330, 8759411563


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