पर्यावरण की सुरक्षा, मानवता की सुरक्षा
मानव सभ्यता के पूरे इतिहास पर यदि दृष्टि डालें तो एक सत्य स्पष्ट दिखाई देता है कि मनुष्य प्रकृति के बिना कभी जीवित नहीं रह सकता। विज्ञान, तकनीक, उद्योग और आधुनिक सुविधाओं ने जीवन को भले ही अधिक आरामदायक बना दिया हो, लेकिन आज भी मनुष्य सांस लेने के लिए हवा, पीने के लिए पानी, भोजन के लिए मिट्टी और जीवन के संतुलन के लिए प्रकृति पर ही निर्भर है। यही कारण है कि जब पर्यावरण पर संकट आता है तो उसका प्रभाव केवल पेड़-पौधों, नदियों या पशु-पक्षियों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि पूरी मानवता उसके दुष्परिणामों को भुगतती है। इसलिए यह कहना बिल्कुल उचित है कि पर्यावरण की सुरक्षा वास्तव में मानवता की सुरक्षा है।
पृथ्वी पर जीवन करोड़ों वर्षों से प्रकृति के संतुलन के कारण संभव हो पाया है। सूर्य की ऊर्जा, जल चक्र, वन, नदियाँ, समुद्र, पर्वत और जैव विविधता मिलकर ऐसा वातावरण बनाते हैं जिसमें जीवन फलता-फूलता है। लेकिन पिछले कुछ दशकों में विकास की अंधी दौड़ ने इस प्राकृतिक संतुलन को गंभीर रूप से प्रभावित किया है। जंगलों की कटाई, अनियंत्रित औद्योगीकरण, बढ़ता प्रदूषण, प्राकृतिक संसाधनों का अत्यधिक दोहन और उपभोक्तावादी जीवनशैली ने पर्यावरण के सामने अभूतपूर्व संकट खड़ा कर दिया है।
आज दुनिया के लगभग हर देश में पर्यावरण संबंधी समस्याएँ बढ़ती जा रही हैं। कहीं वायु प्रदूषण लोगों के स्वास्थ्य को प्रभावित कर रहा है, कहीं जल संकट जीवन को कठिन बना रहा है, कहीं अत्यधिक गर्मी लोगों की जान ले रही है और कहीं बाढ़ तथा चक्रवात जैसी प्राकृतिक आपदाएँ विनाश का कारण बन रही हैं। इन सभी समस्याओं की जड़ में कहीं न कहीं पर्यावरणीय असंतुलन दिखाई देता है। प्रकृति बार-बार संकेत दे रही है कि यदि मानव ने समय रहते अपने व्यवहार में परिवर्तन नहीं किया तो भविष्य और अधिक चुनौतीपूर्ण हो सकता है।
वायु प्रदूषण इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। मनुष्य बिना भोजन के कई दिन और बिना पानी के कुछ समय तक जीवित रह सकता है, लेकिन बिना हवा के कुछ मिनट भी जीवित नहीं रह सकता। इसके बावजूद हम जिस हवा में सांस लेते हैं, उसे लगातार प्रदूषित कर रहे हैं। उद्योगों से निकलने वाला धुआँ, वाहनों का उत्सर्जन और विभिन्न प्रकार की प्रदूषणकारी गतिविधियाँ वातावरण को प्रभावित कर रही हैं। इसका परिणाम यह है कि श्वसन संबंधी बीमारियाँ, हृदय रोग और अन्य स्वास्थ्य समस्याएँ तेजी से बढ़ रही हैं। जब हवा दूषित होती है तो केवल पर्यावरण नहीं, बल्कि मानव जीवन भी संकट में पड़ जाता है।
जल संकट भी मानवता के सामने बड़ी चुनौती बनकर उभर रहा है। पृथ्वी पर जल की मात्रा पर्याप्त दिखाई देती है, लेकिन पीने योग्य स्वच्छ जल सीमित है। बढ़ते प्रदूषण और जल स्रोतों के अंधाधुंध दोहन के कारण अनेक क्षेत्रों में जल संकट गहराता जा रहा है। नदियों में औद्योगिक अपशिष्ट और कचरा डाला जा रहा है। भूजल स्तर लगातार नीचे जा रहा है। यदि जल स्रोत सुरक्षित नहीं रहेंगे तो मानव जीवन भी सुरक्षित नहीं रह पाएगा। इसलिए जल संरक्षण और जल स्रोतों की स्वच्छता सीधे-सीधे मानव अस्तित्व से जुड़ा विषय है।
जलवायु परिवर्तन आज पूरी दुनिया के लिए चिंता का विषय है। बढ़ते तापमान के कारण मौसम का स्वरूप बदल रहा है। कभी अत्यधिक वर्षा होती है तो कभी लंबे समय तक सूखा पड़ता है। गर्मी के नए रिकॉर्ड बन रहे हैं। ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं। समुद्र का जलस्तर बढ़ रहा है। इन परिवर्तनों का प्रभाव केवल पर्यावरण पर नहीं, बल्कि कृषि, अर्थव्यवस्था, स्वास्थ्य और सामाजिक जीवन पर भी पड़ रहा है। लाखों लोगों की आजीविका प्रभावित हो रही है। यह स्थिति स्पष्ट रूप से बताती है कि पर्यावरणीय संकट अंततः मानवीय संकट में बदल जाता है।
वनों का महत्व भी इसी संदर्भ में समझा जा सकता है। जंगल केवल पेड़ों का समूह नहीं होते। वे पृथ्वी के फेफड़े हैं। वे वातावरण से कार्बन डाइऑक्साइड को अवशोषित करके ऑक्सीजन प्रदान करते हैं। वे वर्षा चक्र को संतुलित रखते हैं। वे मिट्टी के कटाव को रोकते हैं और जैव विविधता को संरक्षित रखते हैं। जब जंगल नष्ट होते हैं तो केवल हरियाली कम नहीं होती, बल्कि मानव जीवन की सुरक्षा का एक महत्वपूर्ण आधार भी कमजोर हो जाता है। इसलिए वन संरक्षण मानवता की सुरक्षा का अभिन्न हिस्सा है।
पर्यावरण और स्वास्थ्य का संबंध भी अत्यंत गहरा है। विश्वभर में अनेक बीमारियाँ सीधे या परोक्ष रूप से पर्यावरणीय कारणों से उत्पन्न होती हैं। दूषित हवा, गंदा पानी, रासायनिक प्रदूषण और अस्वच्छ वातावरण लोगों के स्वास्थ्य को प्रभावित करते हैं। यदि पर्यावरण स्वस्थ होगा तो समाज भी स्वस्थ होगा। अस्पतालों और दवाइयों की आवश्यकता कम होगी। लोगों का जीवन स्तर बेहतर होगा। इसलिए पर्यावरण संरक्षण को केवल प्राकृतिक संसाधनों की रक्षा के रूप में नहीं, बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य के सबसे बड़े अभियान के रूप में भी देखा जाना चाहिए।
पर्यावरण संरक्षण का एक महत्वपूर्ण पक्ष जैव विविधता की रक्षा भी है। पृथ्वी पर मौजूद प्रत्येक जीव का अपना महत्व है। पक्षी, पशु, कीट, वनस्पतियाँ और सूक्ष्म जीव मिलकर प्राकृतिक संतुलन बनाए रखते हैं। यदि इनमें से किसी एक कड़ी को भी नुकसान पहुँचता है तो उसका प्रभाव पूरे पारिस्थितिक तंत्र पर पड़ता है। अनेक प्रजातियाँ आज विलुप्ति के कगार पर हैं। यह केवल जीव-जंतुओं का नुकसान नहीं है, बल्कि मानवता के भविष्य के लिए भी चेतावनी है।
दुर्भाग्यपूर्ण तथ्य यह है कि पर्यावरण को नुकसान पहुँचाने वाला भी मनुष्य है और उससे सबसे अधिक प्रभावित होने वाला भी मनुष्य ही है। प्रकृति बदला नहीं लेती, लेकिन उसके नियमों की अनदेखी करने का परिणाम अवश्य सामने आता है। जब नदियाँ प्रदूषित होती हैं तो मनुष्य बीमार होता है। जब जंगल कटते हैं तो मौसम असंतुलित होता है। जब वायु प्रदूषित होती है तो मनुष्य की सांसें प्रभावित होती हैं। इसलिए पर्यावरण के साथ किया गया अन्याय अंततः मानवता के विरुद्ध ही सिद्ध होता है।
आज आवश्यकता केवल सरकारी योजनाओं की नहीं है। पर्यावरण संरक्षण एक जनभागीदारी का विषय है। प्रत्येक व्यक्ति को अपने स्तर पर योगदान देना होगा। पानी की बचत, बिजली का संयमित उपयोग, प्लास्टिक का कम प्रयोग, वृक्षारोपण, सार्वजनिक परिवहन का उपयोग और स्वच्छता जैसे छोटे-छोटे कदम भी बड़े परिवर्तन ला सकते हैं। यदि समाज का प्रत्येक व्यक्ति अपनी जिम्मेदारी समझे तो पर्यावरणीय चुनौतियों का समाधान काफी हद तक संभव है।
हमें यह भी समझना होगा कि पर्यावरण संरक्षण विकास का विरोध नहीं है। वास्तविक विकास वही है जो प्रकृति और मानव जीवन दोनों को सुरक्षित रखे। ऐसा विकास जो नदियों को प्रदूषित कर दे, जंगलों को समाप्त कर दे और लोगों के स्वास्थ्य को खतरे में डाल दे, वह दीर्घकालीन दृष्टि से विकास नहीं बल्कि विनाश है। इसलिए सतत और संतुलित विकास की अवधारणा को अपनाना समय की आवश्यकता है।
आने वाली पीढ़ियों के प्रति हमारी भी जिम्मेदारी है। हम पृथ्वी के मालिक नहीं, बल्कि इसके संरक्षक हैं। हमें यह ग्रह अपने पूर्वजों से विरासत में नहीं मिला है, बल्कि हमने इसे अपनी आने वाली पीढ़ियों से उधार लिया है। यदि हम आज पर्यावरण की रक्षा नहीं करेंगे तो भविष्य की पीढ़ियाँ हमें कभी क्षमा नहीं करेंगी। उन्हें स्वच्छ हवा, स्वच्छ जल और सुरक्षित प्रकृति उपलब्ध कराना हमारा नैतिक दायित्व है।
पर्यावरण की सुरक्षा कोई वैकल्पिक कार्य नहीं है, बल्कि मानव अस्तित्व की अनिवार्य शर्त है। जिस दिन हम यह समझ लेंगे कि प्रकृति और मानवता अलग-अलग नहीं बल्कि एक-दूसरे के पूरक हैं, उसी दिन पर्यावरण संरक्षण का वास्तविक अभियान शुरू होगा। पृथ्वी को बचाना, जल को बचाना, जंगलों को बचाना और हवा को स्वच्छ रखना केवल पर्यावरणीय कार्य नहीं हैं; ये मानव जीवन को सुरक्षित रखने के प्रयास हैं।
आज आवश्यकता है कि पर्यावरण संरक्षण को एक सरकारी कार्यक्रम या वार्षिक अभियान के रूप में नहीं, बल्कि जीवन की संस्कृति के रूप में अपनाया जाए। जब यह सोच समाज के प्रत्येक व्यक्ति तक पहुँचेगी कि पर्यावरण की रक्षा करना वास्तव में अपने परिवार, अपने समाज और अपनी आने वाली पीढ़ियों की रक्षा करना है, तभी हम एक सुरक्षित और समृद्ध भविष्य का निर्माण कर पाएंगे। सच तो यह है कि पर्यावरण की सुरक्षा और मानवता की सुरक्षा दो अलग-अलग लक्ष्य नहीं हैं। दोनों एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। यदि पर्यावरण सुरक्षित रहेगा तो मानवता सुरक्षित रहेगी, और यदि पर्यावरण संकट में होगा तो मानवता भी उससे अछूती नहीं रह सकेगी।
डॉ. शैलेश शुक्ला | Dr. Shailesh Shukla
वैश्विक समूह संपादक, सृजन संसार अंतरराष्ट्रीय पत्रिका समूह | Global Group Editor,Srijan Sansar Group of International Journals
सलाहकार संपादक, नईदुनिया एवं गौड़सन्स टाइम्स | Consulting Editor, NaiDunia & GaurSons Times
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