"नेता जी और जनता जनार्दन की अमर प्रेम कथा"
नेता जी और जनता जनार्दन की अमर प्रेम कथा का किस्सा बड़ा पुराना है। इस देश में दो चीजें कभी खत्म नहीं होतीं, एक तो हमारी उम्मीद और दूसरे नेता जी के वादे। दोनों अमर हैं, दोनों अविनाशी हैं, दोनों हर पांच साल में नया अवतार लेकर आ जाते हैं।
हमारे नेता जी बड़े दयालु हैं, उन्हें पता है कि जनता को सबसे ज्यादा तकलीफ सोचने से होती है, इसलिए वे यह कष्ट खुद ही उठा लेते हैं। खुद ही सोचते हैं, खुद ही बोलते हैं और खुद ही ताली बजवा भी लेते हैं। जनता का काम बहुत सरल कर दिया गया है, बस ताली बजानी है, व्हाट्सएप पर फॉरवर्ड करना है और हर पांच साल में एक बटन दबा कर घर आ जाना है, फिर अगले पांच साल तक ठगा हुआ महसूस करना है। यह चक्रव्यूह ऐसा है जिसमें अभिमन्यु तो घुसना जानता था, हम तो घुसते ही फंस जाते हैं।
नेता जी का पहला जादू है भावना का। वे जानते हैं कि अगर जनता सोचने लगी तो दुकान बंद हो जाएगी। इसलिए वे कभी आंकड़ा नहीं देते, भावना देते हैं। वे कभी नहीं कहेंगे कि हमने पिछले साल रोजगार में इतने प्रतिशत की वृद्धि की है। वे कहेंगे मित्रों, देश खतरे में है। बस इतना सुनते ही हमारा खून खौल जाता है, रोंगटे खड़े हो जाते हैं। अब कौन पूछेगा कि अस्पताल में डॉक्टर क्यों नहीं हैं, स्कूल में मास्टर क्यों नहीं हैं। पहले देश बचाना है, बाकी बातें तो बाद में देखी जाएंगी। कभी वे गर्व की पुड़िया देते हैं, हम विश्वगुरु बनेंगे। यह सुनते ही छाती फूल जाती है, चाहे जेब में पचास रुपये भी न हों। भावना में बहता हुआ आदमी कभी बजट नहीं पूछता, वह सिर्फ जयकारा लगाता है और जयकारा ही तो चाहिए।
दूसरा जादू है ऐसे वादे करना जो कभी तोले ही न जा सकें। महान नेता वही है जिसका वादा नापा न जा सके। हम विकास करेंगे, हम भ्रष्टाचार मिटा देंगे, हम सबका साथ लाएंगे। कितना विकास, कहाँ विकास, कब तक विकास, किस पैसे से विकास, ये सब छोटे लोगों के छोटे सवाल हैं। विकास तो एक अनुभूति है, एक एहसास है। कहीं एक सड़क पर गड्ढा भर गया तो विकास है, कहीं एक लाइट लग गई तो विकास है। ऐसे वादों का सबसे बड़ा फायदा यह है कि बाद में इन्हें किसी भी तरह सही साबित किया जा सकता है। अगर कुछ हुआ तो कह देंगे देखो वादा पूरा किया, अगर कुछ नहीं हुआ तो कह देंगे अभी प्रक्रिया चल रही है, यह तो निरंतर चलने वाली यात्रा है। जो वादा नापा नहीं जा सकता उसकी जवाबदेही भी तय नहीं होती।
फिर आता है सबसे पुराना अंग्रेजी फार्मूला, बांटो और राज करो। हमने उसे देसी तड़का लगा कर और बेहतर बना दिया है। समाज को दो हिस्सों में चीर दो, एक हम और दूसरा वे। कभी अमीर बनाम गरीब, कभी अगड़ा बनाम पिछड़ा, कभी एक धर्म बनाम दूसरा धर्म, कभी राष्ट्रवादी बनाम राष्ट्र विरोधी। एक बार आपने खुद को हम में शामिल कर लिया तो फिर आप अपने नेता की हर गलती माफ करने लगते हैं क्योंकि आपको लगता है कि आप अपने समूह की रक्षा कर रहे हैं। पहले लड़ाई रोटी की थी, अब लड़ाई पहचान की है। नेता जी को पता है कि रोटी पर बहस में वह फंस सकता है क्योंकि रोटी गिनी जा सकती है, पर पहचान पर बहस में वह कभी नहीं हारेगा क्योंकि पहचान तो महसूस की जाती है।
आंकड़ों का खेल तो और भी मजेदार है। नेता जी के झोले में से ऐसे आंकड़े निकलते हैं कि बड़े अर्थशास्त्री भी चकरा जाएं। बताया जाएगा कि हमने सौ किलोमीटर सड़क बनाई, जनता ताली बजाएगी। कोई नहीं पूछेगा कि उस सड़क पर चला जा सकता है या नहीं, वह सड़क छह महीने टिकेगी भी या नहीं। बताया जाएगा कि निवेश बढ़ा है, पर यह नहीं बताया जाएगा कि कर्ज कितना बढ़ा है। आधा सच पूरे झूठ से ज्यादा खतरनाक होता है क्योंकि वह भरोसेमंद लगता है। झूठ बोलोगे तो पकड़े जाओगे, आधा सच बोलोगे तो लोग कंफ्यूज हो जाएंगे और कंफ्यूज जनता ही तो सबसे अच्छी जनता होती है।
आजकल काम से ज्यादा फोटो जरूरी है। नया मंत्र है काम करो न करो, फोटो पक्की होनी चाहिए। सुबह किसान की पगड़ी के साथ फोटो, मैं किसान का बेटा हूं। दोपहर मंदिर में घंटा बजाते हुए फोटो, मैं संस्कारी हूं। शाम को सूट बूट में हवाई जहाज के साथ फोटो, मैं विकास पुरुष हूं। फीता कट गया, फोटो आ गई, हो गया विकास। सड़क छह महीने में उखड़ गई तो ठेकेदार जिम्मेदार है, नेता जी नहीं। कई बार तो शहर का नाम ही बदल दिया जाता है। नाम बदल गया तो जनता खुश, वाह क्या विकास है। सड़क वही है, नाली वही है, स्कूल वही है, पर नाम नया है। और राजनीति में नया नाम ही तो नया काम है।
नारे की तो बात ही निराली है। नारा ऐसा होना चाहिए कि दिमाग बंद हो जाए और जुबान चालू हो जाए। एक ही बात को दिन में सौ बार टीवी पर और हजार बार मोबाइल पर सुन लो तो वह झूठ भी सच लगने लगता है। विज्ञान इसे भ्रम सत्य प्रभाव कहता है, नेता जी इसे प्रचार कहते हैं। तथ्य भूल जाओ, धुन याद रखो क्योंकि वोट तथ्य पर नहीं धुन पर पड़ता है।
जब कोई चतुर नागरिक सवाल पूछ ही लेता है तो उसके लिए भी एक हथकंडा तैयार है। आप पूछोगे कि अस्पताल में डॉक्टर क्यों नहीं हैं, जवाब आएगा कि पिछली सरकार ने सत्तर साल में क्या किया था। आप पूछोगे महंगाई क्यों है, जवाब आएगा देखो पड़ोसी देश में क्या हाल है। आप वर्तमान पूछते हैं, वे आपको भूतकाल में भेज देते हैं। आप रोटी पूछते हैं, वे इतिहास परोस देते हैं। और हम भोले भाले लोग भूत प्रेत की कहानी सुन कर वर्तमान का दर्द भूल जाते हैं। सोशल मीडिया पर तो इसके लिए पूरी सेना है। जैसे ही कोई गंभीर मुद्दा उठता है, अचानक कोई दूसरा भावुक मुद्दा ट्रेंड करने लगता है, और हम सब उसी में बह जाते हैं।
हर दिन एक नया खतरा भी बहुत जरूरी है। रोज सुबह नेता जी एक नया खतरा खोज लाते हैं। देश खतरे में है, धर्म खतरे में है, संस्कृति खतरे में है। खतरे में पड़ा आदमी कभी हिसाब नहीं मांगता, वह बस बचाने वाले को कस कर पकड़ लेता है। इसलिए हर चुनाव को आखिरी चुनाव बना दिया जाता है, हर लड़ाई को आखिरी लड़ाई। घबराया हुआ वोटर सबसे वफादार वोटर होता है, वह सवाल नहीं पूछता, वह सिर्फ बटन दबाता है।
फिर आते हैं मुफ्त के लड्डू। चुनाव आया और लड्डू बंटने लगे। कभी बिजली मुफ्त, कभी लैपटॉप मुफ्त, कभी खाते में दो हजार। अर्थशास्त्री चिल्लाते रहेंगे कि इससे खजाना खाली होगा, पर जनता कहती है खजाना तो बाद में खाली होगा, अभी तो मेरी जेब भर गई। यह मनोविज्ञान का खेल है, आदमी भविष्य के बड़े लाभ से ज्यादा आज के छोटे लाभ को पसंद करता है।
और अंत में व्यस्तता का नाटक। सुबह छह बजे ट्वीट, आठ बजे मीटिंग, दस बजे उद्घाटन, रात बारह बजे विदेश यात्रा। जनता देख कर कहती है देखो कितना काम करता है, बेचारा सोता भी नहीं। कोई नहीं पूछता कि उस काम का नतीजा क्या निकला। कैमरा चल रहा है तो मतलब काम चल रहा है।
सच तो यह है कि नेता जी हमें मूर्ख नहीं बनाते, हम बनने को तैयार बैठे होते हैं। क्योंकि सोचना मेहनत का काम है और महसूस करना आसान है। सवाल पूछना मुश्किल है और ताली बजाना आसान है। नेता जी हमारे ही मन के डॉक्टर हैं। उन्हें पता है कि हमें सच नहीं कहानी चाहिए, हमें नेता नहीं नायक चाहिए। और जब तक हमें कहानी और नायक चाहिए, तब तक यह प्रेम कथा चलती रहेगी। अगली बार जब कोई मंच पर गरजे तो बस एक बार जेब में नहीं दिमाग में हाथ डाल कर पूछना, भैया कितना, कब तक और कैसे। इतना पूछ लिया तो समझो आपने लोकतंत्र के सबसे बड़े व्यंग्य को समझ लिया।
डॉ. शैलेशशुक्ला | Dr. Shailesh Shukla
गृहमंत्रालय, भारतसरकारद्वारा'राजभाषागौरवपुरस्कार' सेसम्मानित | Honoured with the "Rajbhasha Gaurav Award" by the Ministry of Home Affairs, Government of India.
वैश्विकसमूहसंपादक, सृजनसंसारअंतरराष्ट्रीयपत्रिकासमूह | Global Group Editor, Srijan Sansar Group of International Journals
सलाहकारसंपादक, गौड़सन्सटाइम्स | Consulting Editor, GaurSons Times
आशियाना, लखनऊ -226012, उत्तरप्रदेश | Ashiyana, Lucknow – 226012, Uttar Pradesh
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