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मुंशी प्रेमचंद की समकालीन प्रासंगिकता

 

मुंशी प्रेमचंद की समकालीन प्रासंगिकता: बदलते भारत में साहित्य की नैतिक चेतना

भारतीय साहित्य के इतिहास में मुंशी प्रेमचंद का स्थान केवल एक महान कथाकार या उपन्यासकार के रूप में नहीं है, बल्कि वे भारतीय समाज की आत्मा के सबसे विश्वसनीय व्याख्याकार भी हैं। उन्होंने साहित्य को मनोरंजन का माध्यम नहीं, बल्कि सामाजिक परिवर्तन का उपकरण माना। प्रेमचंद का साहित्य भारतीय समाज की उन गहरी परतों को उजागर करता है, जहाँ गरीबी, शोषण, जातिगत असमानता, लैंगिक भेदभाव, किसान और मजदूर की पीड़ा, शिक्षा की विषमता, नैतिक मूल्यों का संकट तथा सत्ता और समाज के अंतर्विरोध मौजूद हैं। यही कारण है कि लगभग नौ दशक बाद भी प्रेमचंद केवल इतिहास का विषय नहीं हैं; वे आज के भारत की सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक चुनौतियों को समझने का सशक्त माध्यम बने हुए हैं। उनकी रचनाएँ यह बताती हैं कि समय बदल सकता है, तकनीक बदल सकती है, लेकिन यदि समाज की मूल समस्याएँ बनी रहती हैं, तो साहित्य की प्रासंगिकता भी बनी रहती है।

समकालीन भारत तीव्र आर्थिक विकास, डिजिटल क्रांति और वैश्विक प्रतिस्पर्धा का दावा करता है। देश विश्व की प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में शामिल हो चुका है, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, डिजिटल भुगतान, स्टार्टअप संस्कृति और तकनीकी नवाचार की चर्चा विश्व स्तर पर होती है। इसके बावजूद सामाजिक विषमता, बेरोजगारी, किसानों की आर्थिक असुरक्षा, ग्रामीण क्षेत्रों का पलायन, शिक्षा और स्वास्थ्य की असमान उपलब्धता जैसी समस्याएँ अभी भी व्यापक रूप से मौजूद हैं। प्रेमचंद ने अपने साहित्य में इन्हीं अंतर्विरोधों को सबसे अधिक महत्व दिया था। उनका प्रश्न यह नहीं था कि समाज कितना आधुनिक दिखता है, बल्कि यह था कि समाज कितना न्यायपूर्ण और मानवीय है। यही प्रश्न आज भी उतना ही प्रासंगिक है।

प्रेमचंद के उपन्यास 'गोदान' का किसान होरी भारतीय किसान का प्रतीक है। होरी केवल एक व्यक्ति नहीं, बल्कि उस किसान की सामूहिक चेतना है जो जीवन भर श्रम करता है, लेकिन सम्मान और आर्थिक सुरक्षा दोनों से वंचित रहता है। आज भारत कृषि उत्पादन में विश्व के अग्रणी देशों में है, फिर भी छोटे और सीमांत किसानों की आय, प्राकृतिक आपदाओं, जलवायु परिवर्तन, उत्पादन लागत और बाजार की अनिश्चितताओं से जुड़ी चुनौतियाँ समाप्त नहीं हुई हैं। खेती आज भी बड़ी संख्या में किसानों के लिए जोखिमपूर्ण पेशा बनी हुई है। बदलती जलवायु के कारण अनियमित वर्षा, अत्यधिक तापमान और प्राकृतिक आपदाओं ने ग्रामीण जीवन को और जटिल बना दिया है। ऐसे समय में 'गोदान' केवल साहित्यिक कृति नहीं, बल्कि भारतीय कृषि समाज की स्थायी पीड़ा का दस्तावेज़ प्रतीत होती है।

इसी प्रकार प्रेमचंद की कहानी 'कफन' अत्यंत मार्मिक ढंग से यह प्रश्न उठाती है कि जब समाज में आर्थिक विषमता चरम पर पहुँच जाती है, तब मानवीय संवेदनाएँ भी विकृत होने लगती हैं। घीसू और माधव की त्रासदी केवल उनकी व्यक्तिगत असफलता नहीं, बल्कि उस व्यवस्था की विफलता है जो मनुष्य को सम्मानजनक जीवन देने में असमर्थ रहती है। आज भी जब महानगरों की चमक के समानांतर झुग्गी-बस्तियों में रहने वाले लाखों लोग मूलभूत सुविधाओं के लिए संघर्ष करते हैं, तब 'कफन' की सामाजिक चेतावनी नई अर्थवत्ता प्राप्त करती है। आर्थिक विकास तभी सार्थक माना जा सकता है जब उसका लाभ समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुँचे। प्रेमचंद का साहित्य इसी नैतिक कसौटी पर समाज का मूल्यांकन करता है।

जातिगत असमानता प्रेमचंद की चिंता का एक महत्वपूर्ण विषय थी। 'सद्गति', 'ठाकुर का कुआँ' और अन्य अनेक कहानियाँ सामाजिक भेदभाव की अमानवीयता को उजागर करती हैं। भारतीय संविधान ने समानता का अधिकार प्रदान किया है और सामाजिक न्याय की दिशा में अनेक प्रयास हुए हैं, फिर भी समय-समय पर जातिगत भेदभाव, सामाजिक बहिष्कार और हिंसा की घटनाएँ यह संकेत देती हैं कि सामाजिक परिवर्तन केवल कानून से संभव नहीं होता; उसके लिए मानसिकता का परिवर्तन भी आवश्यक है। प्रेमचंद ने साहित्य के माध्यम से इसी मानसिक क्रांति का प्रयास किया था। उन्होंने पीड़ित वर्ग को करुणा का पात्र नहीं, बल्कि मनुष्य के रूप में उसकी गरिमा के साथ प्रस्तुत किया। यही दृष्टि आज भी सामाजिक समरसता की आधारशिला बन सकती है।

महिला प्रश्न पर भी प्रेमचंद का दृष्टिकोण अपने समय से आगे था। 'निर्मला', 'सेवासदन' और अनेक कहानियों में उन्होंने स्त्री की सामाजिक स्थिति, दहेज, बाल विवाह, आर्थिक निर्भरता और पितृसत्तात्मक संरचना की आलोचना की। आज भारत में महिलाओं की शिक्षा, रोजगार और नेतृत्व की भागीदारी पहले की तुलना में बढ़ी है, लेकिन लैंगिक हिंसा, कार्यस्थल पर असमान अवसर, घरेलू हिंसा और सामाजिक पूर्वाग्रह जैसी चुनौतियाँ अभी भी समाप्त नहीं हुई हैं। डिजिटल युग में साइबर उत्पीड़न और ऑनलाइन हिंसा जैसी नई समस्याएँ भी सामने आई हैं। प्रेमचंद का साहित्य हमें यह स्मरण कराता है कि महिला सशक्तिकरण केवल कानून बनाने का विषय नहीं, बल्कि सामाजिक चेतना और समान अवसर सुनिश्चित करने की सतत प्रक्रिया है।

शिक्षा के क्षेत्र में भी प्रेमचंद की दृष्टि उल्लेखनीय है। उनके अनुसार शिक्षा का उद्देश्य केवल रोजगार प्राप्त करना नहीं, बल्कि नैतिक, संवेदनशील और उत्तरदायी नागरिक का निर्माण करना है। आज शिक्षा प्रणाली में तकनीकी दक्षता, प्रतियोगी परीक्षाओं और कौशल विकास पर विशेष बल दिया जा रहा है, जो आवश्यक भी है। किंतु यदि शिक्षा से संवेदनशीलता, नैतिकता और सामाजिक उत्तरदायित्व का बोध समाप्त हो जाए, तो उसका उद्देश्य अधूरा रह जाता है। विद्यालयों और विश्वविद्यालयों में मानसिक स्वास्थ्य, नैतिक शिक्षा, सामाजिक उत्तरदायित्व और संवैधानिक मूल्यों पर बढ़ती चर्चा इस बात का प्रमाण है कि केवल तकनीकी ज्ञान पर्याप्त नहीं है। प्रेमचंद की दृष्टि इसी व्यापक मानवीय शिक्षा की पक्षधर थी।

प्रेमचंद ने राजनीति और सत्ता को भी नैतिक दृष्टि से परखा। उनके साहित्य में सत्ता का मूल्यांकन इस आधार पर होता है कि वह समाज के कमजोर वर्गों के प्रति कितनी उत्तरदायी है। आज लोकतंत्र में चुनाव, जनप्रतिनिधित्व और मीडिया की भूमिका पहले से कहीं अधिक व्यापक है। साथ ही सूचना प्रौद्योगिकी और सोशल मीडिया ने जनमत निर्माण की प्रक्रिया को अत्यंत तीव्र बना दिया है। लेकिन इसके साथ दुष्प्रचार, सूचनाओं की विश्वसनीयता और सामाजिक ध्रुवीकरण जैसी चुनौतियाँ भी सामने आई हैं। प्रेमचंद की लेखनी हमें यह सिखाती है कि लोकतंत्र केवल संस्थाओं से नहीं चलता; उसके लिए सत्य, नैतिकता और सार्वजनिक उत्तरदायित्व भी उतने ही आवश्यक हैं।

समकालीन उपभोक्तावादी संस्कृति भी प्रेमचंद की दृष्टि से महत्वपूर्ण विमर्श का विषय बन सकती है। आज सफलता का मापदंड प्रायः आर्थिक समृद्धि, उपभोग और भौतिक उपलब्धियों से जोड़ा जाता है। सोशल मीडिया ने तुलना, प्रदर्शन और तात्कालिक लोकप्रियता की प्रवृत्ति को बढ़ाया है। ऐसे वातावरण में प्रेमचंद का साहित्य सादगी, श्रम, ईमानदारी और मानवीय संबंधों के महत्व को पुनः स्थापित करता है। उनके पात्र हमें यह बताते हैं कि मनुष्य की वास्तविक गरिमा उसके नैतिक आचरण में निहित होती है, न कि केवल उसकी आर्थिक स्थिति में।

प्रेमचंद की भाषा और अभिव्यक्ति भी उनकी समकालीन प्रासंगिकता का एक महत्वपूर्ण कारण है। उन्होंने ऐसी सरल, सहज और जनभाषा का प्रयोग किया जिसे सामान्य पाठक भी आत्मसात कर सके। आज जब संचार के अनेक माध्यम उपलब्ध हैं और भाषा लगातार बदल रही है, तब भी प्रभावी लेखन का मूल सिद्धांत वही है—स्पष्टता, संवेदनशीलता और जनसरोकार। प्रेमचंद ने साहित्य को अभिजात वर्ग की सीमाओं से निकालकर सामान्य जनता तक पहुँचाया। यही लोकतांत्रिक दृष्टिकोण आज भी हिंदी साहित्य और पत्रकारिता के लिए प्रेरणा का स्रोत है।

युवाओं के संदर्भ में भी प्रेमचंद अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। आज का युवा रोजगार, प्रतिस्पर्धा, तकनीकी परिवर्तन, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, मानसिक दबाव और सामाजिक अपेक्षाओं के बीच अपने भविष्य का निर्माण कर रहा है। ऐसे समय में प्रेमचंद का साहित्य केवल समस्याओं का चित्रण नहीं करता, बल्कि संघर्ष, श्रम, नैतिकता और सामाजिक उत्तरदायित्व का संदेश भी देता है। वे निराशा के लेखक नहीं, बल्कि यथार्थ के भीतर आशा खोजने वाले साहित्यकार हैं। उनका विश्वास था कि समाज में परिवर्तन संभव है, यदि मनुष्य अपनी मानवीय संवेदनाओं को जीवित रखे।

प्रेमचंद की समकालीन प्रासंगिकता का सबसे बड़ा कारण यह है कि उन्होंने किसी विचारधारा विशेष का प्रचार नहीं किया, बल्कि मनुष्य और समाज को केंद्र में रखा। उनका साहित्य न तो अतीत का महिमामंडन करता है और न ही आधुनिकता का अंधानुकरण। वे हर युग से यह प्रश्न पूछते हैं कि क्या समाज अधिक न्यायपूर्ण, अधिक समानतामूलक और अधिक मानवीय बना है। यदि उत्तर नकारात्मक है, तो प्रेमचंद आज भी हमारे समकालीन हैं।

अंततः कहा जा सकता है कि मुंशी प्रेमचंद का साहित्य केवल हिंदी साहित्य की धरोहर नहीं, बल्कि भारतीय लोकतांत्रिक चेतना का नैतिक आधार भी है। बदलती तकनीक, वैश्विक अर्थव्यवस्था, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और डिजिटल समाज के बीच यदि हमें विकास को मानवीय मूल्यों से जोड़कर देखना है, तो प्रेमचंद की ओर लौटना अनिवार्य है। वे हमें यह सिखाते हैं कि किसी भी राष्ट्र की वास्तविक प्रगति केवल आर्थिक सूचकांकों से नहीं मापी जाती, बल्कि इस बात से मापी जाती है कि उसका सबसे कमजोर नागरिक कितना सम्मान, न्याय और अवसर प्राप्त कर रहा है। यही कारण है कि प्रेमचंद का साहित्य आज भी हमारे समय का जीवंत दस्तावेज़ है और भविष्य के लिए नैतिक दिशा प्रदान करने वाली अमूल्य विरासत भी।



डॉ. शैलेशशुक्ला | Dr. Shailesh Shukla

गृहमंत्रालय, भारतसरकारद्वारा'राजभाषागौरवपुरस्कार' सेसम्मानित   |    Honoured with the "Rajbhasha Gaurav Award" by the Ministry of Home Affairs, Government of India.

वैश्विकसमूहसंपादक, सृजनसंसारअंतरराष्ट्रीयपत्रिकासमूह | Global Group Editor, Srijan Sansar Group of International Journals

सलाहकारसंपादक, गौड़सन्सटाइम्स | Consulting Editor, GaurSons Times

आशियाना, लखनऊ -226012, उत्तरप्रदेश | Ashiyana, Lucknow – 226012, Uttar Pradesh

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