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काले कानूनों से कब मिलेगी पूरी मुक्ति?

 

औपनिवेशिक जंजीरों की जकड़न से जन-जन के जनतंत्र तक

काले कानूनों से कब मिलेगी पूरी मुक्ति?

-डॉशैलेश शुक्ला

अंग्रेज चले गए, भारत स्वतंत्र हो गया, लेकिन औपनिवेशिक दौर के अनेक कानून आज भी किसी न किसी रूप में मौजूद हैं। 15 अगस्त 1947 को भारत ने राजनीतिक स्वतंत्रता प्राप्त की, पर स्वतंत्रता के बाद अनेक पुराने कानून जारी रहे और समय-समय पर उनमें संशोधन हुए। समस्या तब पैदा होती है, जब ऐसे कानून, जिनकी मूल भावना औपनिवेशिक शासन की प्रशासनिक और नियंत्रण संबंधी आवश्यकताओं से जुड़ी थी, स्वतंत्र भारत के लोकतांत्रिक और नागरिक-केंद्रित शासन में भी पुरानी मानसिकता की छाप दिखाते हैं। सबसे प्रमुख उदाहरण पुलिस व्यवस्था का है। आज विचार करना आवश्यक है कि हमारी कानून व्यवस्था संविधान, नागरिक अधिकार, गरिमा, स्वतंत्रता और जवाबदेही की लोकतांत्रिक अपेक्षाओं के अनुरूप कितनी बदली है।

पुलिस अधिनियम, 1861 इसका प्रमुख उदाहरण है। 1857 के विद्रोह के बाद ब्रिटिश शासन ने पुलिस प्रशासन को अधिक केंद्रीकृत और नियंत्रित किया और 1861 का अधिनियम उसी औपनिवेशिक ढाँचे का हिस्सा बना। इसमें पुलिस का अधीक्षण राज्य सरकार में निहित किया गया और जिला पुलिस को जिला मजिस्ट्रेट के सामान्य नियंत्रण तथा निर्देशन से जोड़ा गया। स्वतंत्र भारत में पुलिस विदेशी सत्ता की रक्षा करने वाली संस्था नहीं, बल्कि संविधान और कानून के अधीन जनता की सुरक्षा करने वाली संस्था है। पुलिस सुधारों की आवश्यकता को सर्वोच्च न्यायालय ने भी रेखांकित किया। 2006 में प्रकाश सिंह बनाम भारत संघ मामले में न्यायालय ने राज्य सुरक्षा आयोग, पुलिस प्रमुख के चयन और कार्यकाल, जाँच तथा कानून-व्यवस्था के कार्यों को अलग करने, पुलिस स्थापना बोर्ड और पुलिस शिकायत प्राधिकरण जैसी व्यवस्थाओं से संबंधित महत्वपूर्ण निर्देश दिए। फिर भी कई नागरिक थाने जाने में झिझकते और शिकायत दर्ज कराने में कठिनाई अनुभव करते हैं। इससे स्पष्ट है कि कानून के साथ प्रशासनिक संस्कृति बदलना भी जरूरी है।

भारतीय वन अधिनियम, 1927 भी औपनिवेशिक विरासत का प्रमुख उदाहरण है। इससे पहले 1865 और 1878 में वन संबंधी कानून बनाए गए थे और धीरे-धीरे जंगलों पर राज्य का नियंत्रण मजबूत हुआ। 1927 के कानून ने आरक्षित और संरक्षित वनों सहित वन क्षेत्रों पर राज्य का नियंत्रण व्यवस्थित किया। आरक्षित वनों में अनेक पारंपरिक गतिविधियों और अधिकारों पर कठोर प्रतिबंध लगाए गए। स्वतंत्र भारत में प्रश्न उठा कि वन प्रबंधन में सरकारी नियंत्रण के साथ उन समुदायों के अधिकार और भागीदारी को कितना महत्व मिले, जिनका जीवन पीढ़ियों से जंगलों से जुड़ा है।

इसी संदर्भ में वन अधिकार अधिनियम, 2006 महत्वपूर्ण परिवर्तन लाया। इस कानून ने अनुसूचित जनजातियों और अन्य पात्र परंपरागत वन निवासियों के व्यक्तिगत और सामुदायिक वन अधिकारों को कानूनी मान्यता देने का प्रावधान किया। इसमें आजीविका, आवास, लघु वनोपज और सामुदायिक वन संसाधनों से जुड़े अधिकार हैं। आज वन व्यवस्था में राज्य का नियामक अधिकार भी है और पात्र वनवासियों के अधिकारों को वन अधिकार अधिनियम से मान्यता भी। चुनौती पर्यावरण संरक्षण और वनवासियों के वैधानिक अधिकारों के बीच न्यायपूर्ण संतुलन की है।

औपनिवेशिक विरासत का एक अन्य उदाहरण शासकीय गुप्त बात अधिनियम, 1923 है। यह सरकारी गोपनीय सूचनाओं को नियंत्रित करने वाला कानून था और आज भी मौजूद है। सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 ने शासन में पारदर्शिता और जवाबदेही का लोकतांत्रिक दृष्टिकोण प्रस्तुत किया। अब नागरिकों को कानून के अनुसार सरकारी सूचना प्राप्त करने का अधिकार है। लोकतंत्र में नागरिक का प्रश्न पूछना जवाबदेह व्यवस्था की आवश्यक शर्त है।

भारतीय टेलीग्राफ अधिनियम, 1885 भी औपनिवेशिक कानूनी विरासत है। इसकी धारा 5(2) निर्धारित परिस्थितियों में संदेशों के अवरोधन और संचार की निगरानी से संबंधित शक्तियाँ देती है। इसका अर्थ यह नहीं कि सरकार किसी का फोन या संदेश मनमाने ढंग से सुन सकती है। सर्वोच्च न्यायालय ने पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज के मामले में टेलीफोन निगरानी के संबंध में महत्वपूर्ण प्रक्रियात्मक सुरक्षा और समीक्षा की व्यवस्था निर्धारित की थी। आज राष्ट्रीय सुरक्षा और नागरिक की निजता के बीच संतुलन लोकतांत्रिक आवश्यकता है।

महामारी रोग अधिनियम, 1897 भी औपनिवेशिक काल का कानून है। यह संक्रामक महामारी रोकने के लिए बनाया गया था। मूल कानून संक्षिप्त था, लेकिन बाद में इसमें कई संशोधन हुए। कोविड-19 के दौरान इसका उपयोग व्यापक प्रशासनिक उपायों के साथ हुआ। उस अनुभव ने दिखाया कि महामारी में राज्य को प्रभावी शक्तियाँ मिलनी चाहिए, लेकिन उनका प्रयोग कानून, आवश्यकता, अनुपातिकता और नागरिक अधिकारों के संतुलन के साथ हो। आपदा में भी नागरिक गरिमा और अधिकार अप्रासंगिक नहीं हो सकते।

यह समझना जरूरी है कि किसी कानून का औपनिवेशिक काल में बनाया जाना अपने आप में उसे आज अनुपयोगी या असंवैधानिक नहीं बना देता। किसी कानून की उपयोगिता इस बात से तय हो कि वह संविधान, मौलिक अधिकारों, न्याय, समानता और लोकतांत्रिक शासन के अनुरूप है या नहीं। इसलिए हर पुराने कानून को केवल उसके इतिहास के कारण समाप्त करना उचित नहीं। पुराने कानूनों की संवैधानिक कसौटी पर समीक्षा हो और अनुपयुक्त प्रावधान संशोधित या समाप्त किए जाएँ, समय रहते।

2014 के बाद केंद्र सरकार ने अनेक अप्रचलित केंद्रीय कानून निरस्त किए हैं। औपनिवेशिक काल से चले आ रहे तीन प्रमुख आपराधिक कानूनों भारतीय दंड संहिता, दंड प्रक्रिया संहिता और भारतीय साक्ष्य अधिनियम की जगह भारतीय न्याय संहिता, भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता और भारतीय साक्ष्य अधिनियम लाए गए, जो 1 जुलाई 2024 से लागू हुए। इसकी सफलता इस बात से तय होगी कि आम नागरिक को न्याय कितना शीघ्र, सुलभ और निष्पक्ष मिलता है।

पहली जिम्मेदारी जनता की है। हमें स्वयं को केवल शासन के अधीन रहने वाली प्रजा समझने की मानसिकता से बाहर निकलना होगा। संविधान की शुरुआत ही हम, भारत के लोग से होती है। नागरिकों को अधिकारों के प्रति जागरूक होकर सवाल पूछने होंगे और समझना होगा कि कानून नियंत्रण के साथ अधिकारों की रक्षा का माध्यम भी है।

दूसरी जिम्मेदारी प्रशासन और जनसेवकों की है। स्वतंत्र भारत में वर्दी, पद और सरकारी अधिकार किसी अधिकारी को जनता का शासक नहीं बनाते। पुलिस अधिकारी, वन अधिकारी, जिला अधिकारी और अन्य लोकसेवक संविधान तथा कानून के अधीन काम करते हैं। उनका अधिकार प्रभुत्व के लिए नहीं, बल्कि सुरक्षा, न्याय और सुविधा सुनिश्चित करने के लिए है। जब प्रशासन नागरिक को सम्मान से सुनेगा और शक्ति का प्रयोग जवाबदेही से करेगा, तभी लोकतंत्र जमीन पर दिखाई देगा।

तीसरी और अत्यंत महत्वपूर्ण जिम्मेदारी जनप्रतिनिधियों की है। संसद और विधानसभाएँ कानून बनाती हैं तथा पुराने कानूनों में संशोधन या निरसन करती हैं। हर कानून से पूछा जाए कि क्या वह नागरिकों के अधिकार और गरिमा की रक्षा करता है, क्या उसमें सरकार और अधिकारियों की पर्याप्त जवाबदेही है और क्या उसकी शक्तियाँ लोकतांत्रिक आवश्यकता के अनुपात में हैं। अनुपयुक्त प्रावधान समाप्त या आधुनिक संवैधानिक मूल्यों के अनुरूप पुनर्लिखित किए जाएँ।

औपनिवेशिक विरासत केवल कानूनों में नहीं होती। वह प्रशासनिक व्यवहार, सरकारी भाषा, नागरिकों के प्रति दृष्टिकोण और संस्थाओं की कार्यशैली में भी दिखाई दे सकती है। यदि कानून बदल जाए, लेकिन नागरिक को कार्यालय में डर, अपमान और अनावश्यक भागदौड़ झेलनी पड़े, तो लोकतंत्र मजबूत नहीं होगा। लोकतंत्र की पहचान है कि नागरिक को अपने राज्य से न्याय और सम्मान पाने के लिए संघर्ष न करना पड़े। सफल लोकतंत्र वही है जहाँ कानून का भय अपराधी को हो, सामान्य नागरिक को नहीं; थाने में सुरक्षा का एहसास हो; वनवासी अधिकारों के साथ पर्यावरण संरक्षण में भागीदार बने और सरकार जनता को उत्तर दे।

अब ऐसी कानूनी और प्रशासनिक संस्कृति चाहिए जिसमें संविधान सर्वोच्च हो, नागरिक अधिकार सुरक्षित हों, शासन पारदर्शी और जवाबदेह हो तथा कानून जनता के विश्वास का आधार बने। अंग्रेजों के समय बनाए गए प्रत्येक कानून को केवल उसके इतिहास के कारण समाप्त करना समाधान नहीं है, लेकिन जो कानून या प्रावधान आज के लोकतांत्रिक भारत की आवश्यकताओं से मेल नहीं खाते, उनकी पहचान और समीक्षा अवश्य होनी चाहिए। औपनिवेशिक मानसिकता हटाने का अर्थ केवल पुराने कानून मिटाना नहीं, बल्कि शासन और नागरिक के संबंध बदलना भी है। जनता जागरूक, जनसेवक संवेदनशील और जनप्रतिनिधि जवाबदेह होगा, तभी स्वतंत्रता का अर्थ आम नागरिक के जीवन में दिखाई देगा। औपनिवेशिक जंजीरों से वास्तविक मुक्ति सत्ता परिवर्तन से आगे की प्रक्रिया है। यह ऐसी व्यवस्था से मिलेगी जिसमें कानून जनता को डराने के बजाय उसके अधिकारों की रक्षा करे। यही सच्ची आजादी है और यही सफल लोकतंत्र की मजबूत नींव है।


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