हरित हकीकत की हिचकियाँ: भारत में अक्षय ऊर्जा उत्पादन की बड़ी बाधाएँ
भारत इस समय ऊर्जा परिवर्तन के एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है, जहाँ एक ओर वह दुनिया के सबसे बड़े ऊर्जा उपभोक्ताओं में शामिल हो रहा है, वहीं दूसरी ओर उसे जलवायु परिवर्तन, प्रदूषण और ऊर्जा आयात पर निर्भरता जैसी गंभीर चुनौतियों का भी सामना करना पड़ रहा है। बीते कुछ वर्षों में भारत ने अक्षय ऊर्जा के क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति की है। सौर ऊर्जा क्षमता में तीव्र वृद्धि, पवन ऊर्जा परियोजनाओं का विस्तार, ग्रीन हाइड्रोजन मिशन, पीएम सूर्य घर योजना और ऊर्जा संक्रमण से जुड़ी नीतियों ने यह संकेत दिया है कि भारत भविष्य की ऊर्जा संरचना को हरित दिशा में मोड़ना चाहता है। नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय के अनुसार अप्रैल 2026 तक देश की कुल स्थापित अक्षय ऊर्जा क्षमता 279 गीगावाट से अधिक हो चुकी है, जिसमें सौर ऊर्जा का योगदान सबसे अधिक है।
लेकिन इस चमकदार उपलब्धि के पीछे अनेक जटिल प्रश्न और कठोर वास्तविकताएँ भी छिपी हुई हैं। भारत में अक्षय ऊर्जा उत्पादन केवल तकनीकी विस्तार का मामला नहीं है; यह भूमि, पूँजी, राजनीति, वितरण, भंडारण, पर्यावरण, सामाजिक स्वीकृति और वैश्विक आर्थिक प्रतिस्पर्धा से जुड़ा बहुस्तरीय संकट भी है। भारत ने 2030 तक 500 गीगावाट गैर-जीवाश्म ऊर्जा क्षमता का लक्ष्य रखा है, किंतु वर्तमान परिस्थितियाँ संकेत देती हैं कि केवल लक्ष्य घोषित कर देना पर्याप्त नहीं होगा। असली चुनौती उस ऊर्जा को स्थायी, सस्ती, भरोसेमंद और सर्वसुलभ बनाना है।
सबसे बड़ी समस्या ऊर्जा भंडारण यानी स्टोरेज की है। सौर और पवन ऊर्जा की प्रकृति अनिश्चित है। सूर्य केवल दिन में उपलब्ध होता है और पवन ऊर्जा मौसम पर निर्भर करती है। ऐसे में जब बिजली की मांग रात में बढ़ती है या मौसम खराब होता है, तब उत्पादन में भारी गिरावट आ जाती है। यही कारण है कि भारत अब भी कोयला आधारित बिजली संयंत्रों पर अत्यधिक निर्भर है। हाल के दिनों में बैटरी स्टोरेज की लागत में कमी आई है और कुछ परियोजनाओं में सस्ती भंडारण तकनीकों की सफलता भी दिखाई दी है, लेकिन बड़े स्तर पर ऊर्जा भंडारण अब भी अत्यंत महँगा और सीमित है।
भारत की बिजली मांग लगातार रिकॉर्ड बना रही है। मई 2026 की भीषण गर्मी में बिजली की खपत ने सरकारी अनुमानों को पार कर दिया। एयर कंडीशनर, कूलर और डिजिटल उपकरणों के बढ़ते उपयोग ने ऊर्जा प्रणाली पर भारी दबाव डाला। ऐसी स्थिति में केवल सौर ऊर्जा पर निर्भर रहना व्यावहारिक नहीं दिखाई देता। बिजली ग्रिड को स्थिर बनाए रखने के लिए लगातार बैकअप ऊर्जा चाहिए, और वर्तमान में यह बैकअप कोयले से ही प्राप्त हो रहा है। यही कारण है कि भारत एक साथ दो विरोधी दिशाओं में चल रहा है — एक ओर हरित ऊर्जा का विस्तार और दूसरी ओर कोयला उत्पादन में वृद्धि।
दूसरी गंभीर चुनौती भूमि अधिग्रहण की है। विशाल सौर पार्कों और पवन परियोजनाओं के लिए हजारों एकड़ भूमि चाहिए। राजस्थान, गुजरात और लद्दाख जैसे क्षेत्रों में बड़ी परियोजनाएँ प्रस्तावित हुईं, लेकिन स्थानीय समुदायों, किसानों और पर्यावरणविदों के विरोध ने कई योजनाओं को धीमा कर दिया। अक्षय ऊर्जा को अक्सर “स्वच्छ” मान लिया जाता है, किंतु बड़े पैमाने पर भूमि उपयोग से जैव विविधता, चरागाहों और स्थानीय पारिस्थितिकी पर गंभीर प्रभाव पड़ता है। पश्चिमी राजस्थान में सौर परियोजनाओं के कारण घासभूमि क्षेत्रों पर दबाव बढ़ा है, जबकि पवन परियोजनाएँ कई बार पक्षियों के प्रवास मार्गों को प्रभावित करती हैं।
तीसरी चुनौती चीन पर निर्भरता की है। भारत सौर ऊर्जा में आत्मनिर्भर बनने की बात करता है, लेकिन सौर पैनल, सेल, वेफर और बैटरी के अधिकांश कच्चे उपकरण अब भी चीन से आते हैं। यह स्थिति ऊर्जा सुरक्षा के लिए दीर्घकालिक खतरा है। यदि भविष्य में भू-राजनीतिक तनाव बढ़ते हैं या वैश्विक आपूर्ति शृंखला बाधित होती है, तो भारत की अक्षय ऊर्जा परियोजनाएँ प्रभावित हो सकती हैं। सरकार ने उत्पादन आधारित प्रोत्साहन योजना और घरेलू विनिर्माण को बढ़ावा देने की पहल की है, लेकिन अभी भी भारतीय कंपनियाँ तकनीकी और लागत प्रतिस्पर्धा में चीन से पीछे हैं।
अक्षय ऊर्जा क्षेत्र की एक और बड़ी विडंबना यह है कि उत्पादन बढ़ने के बावजूद वितरण प्रणाली कमजोर बनी हुई है। भारत में अनेक राज्यों की बिजली वितरण कंपनियाँ भारी घाटे में हैं। ये कंपनियाँ समय पर भुगतान नहीं कर पातीं, जिसके कारण निजी निवेशक नई परियोजनाओं में जोखिम महसूस करते हैं। कई सौर कंपनियों को महीनों तक भुगतान नहीं मिलता। ऊर्जा उत्पादन और ऊर्जा वितरण के बीच यह असंतुलन पूरे क्षेत्र को अस्थिर बनाता है। जब तक वितरण कंपनियों में संरचनात्मक सुधार नहीं होगा, तब तक अक्षय ऊर्जा विस्तार की गति सीमित रहेगी। ग्रिड अवसंरचना भी एक बड़ी चुनौती है। अक्षय ऊर्जा उत्पादन मुख्यतः उन क्षेत्रों में होता है जहाँ धूप या हवा अधिक उपलब्ध है, जबकि बिजली की मांग बड़े शहरों और औद्योगिक क्षेत्रों में केंद्रित है। ऐसे में बिजली को लंबी दूरी तक पहुँचाने के लिए मजबूत ट्रांसमिशन नेटवर्क चाहिए। ग्रीन एनर्जी कॉरिडोर जैसी योजनाएँ शुरू हुईं, लेकिन उनकी गति अपेक्षित स्तर तक नहीं पहुँच सकी। कई राज्यों में सौर परियोजनाएँ तैयार होने के बावजूद ट्रांसमिशन लाइनें अधूरी हैं। परिणामस्वरूप उत्पादित बिजली का पूरा उपयोग नहीं हो पाता।
भारत में ऊर्जा नीति का राजनीतिक आयाम भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। हर सरकार हरित ऊर्जा की बात करती है, लेकिन चुनावी राजनीति सस्ती और निरंतर बिजली आपूर्ति को प्राथमिकता देती है। कोयला आधारित बिजली संयंत्र तुरंत और नियंत्रित बिजली देते हैं, जबकि अक्षय ऊर्जा में अनिश्चितता रहती है। यही कारण है कि सरकारें सार्वजनिक रूप से हरित ऊर्जा का समर्थन करती हैं, लेकिन व्यवहार में कोयला क्षेत्र को भी समानांतर रूप से बढ़ावा देती रहती हैं। यह दोहरी नीति ऊर्जा संक्रमण की गति को धीमा करती है। इसके अलावा अक्षय ऊर्जा उत्पादन में निवेश का प्रश्न भी गंभीर है। बड़े पैमाने पर ऊर्जा संक्रमण के लिए खरबों रुपये के निवेश की आवश्यकता होगी। भारत जैसे विकासशील देश के लिए यह आसान नहीं है। अंतरराष्ट्रीय जलवायु वित्त की बातें बहुत होती हैं, लेकिन वास्तविक निवेश अपेक्षा से कम है। विकसित देशों ने जलवायु सहायता के जो वादे किए थे, वे पूरी तरह पूरे नहीं हुए। ऐसे में भारत को अपने सीमित संसाधनों से ही ऊर्जा संक्रमण का भारी आर्थिक बोझ उठाना पड़ रहा है।
तकनीकी कौशल और अनुसंधान की कमी भी चिंता का विषय है। भारत अभी तक ऊर्जा भंडारण, उन्नत बैटरी तकनीक, स्मार्ट ग्रिड और हाइड्रोजन ईंधन जैसे क्षेत्रों में वैश्विक नेतृत्व स्थापित नहीं कर पाया है। यदि भारत केवल विदेशी तकनीकों पर निर्भर रहेगा, तो दीर्घकाल में उसकी ऊर्जा आत्मनिर्भरता अधूरी ही रहेगी। दुनिया अब केवल सौर पैनल लगाने की प्रतियोगिता में नहीं है; अब प्रतिस्पर्धा ऊर्जा तकनीक, कृत्रिम मेधा आधारित ग्रिड प्रबंधन और उन्नत भंडारण समाधानों में हो रही है।
ग्रीन हाइड्रोजन को भविष्य की ऊर्जा क्रांति कहा जा रहा है, लेकिन उसकी वास्तविकता अभी प्रारंभिक अवस्था में है। भारत ने राष्ट्रीय हरित हाइड्रोजन मिशन शुरू किया है, किंतु ग्रीन हाइड्रोजन का उत्पादन अब भी अत्यधिक महँगा है। इसके लिए भारी मात्रा में स्वच्छ बिजली और पानी चाहिए। ऐसे में प्रश्न उठता है कि क्या भारत पहले अपने पारंपरिक बिजली संकट को हल करेगा या महँगी भविष्यवादी तकनीकों में निवेश करेगा। एक और महत्वपूर्ण चुनौती सामाजिक असमानता की है। शहरी भारत में रूफटॉप सोलर और इलेक्ट्रिक वाहन तेजी से लोकप्रिय हो रहे हैं, लेकिन ग्रामीण भारत अब भी ऊर्जा असुरक्षा से जूझ रहा है। अनेक गाँवों में बिजली की उपलब्धता अनियमित है। यदि ऊर्जा परिवर्तन केवल महानगरों और उच्च वर्ग तक सीमित रह गया, तो यह सामाजिक विभाजन को और गहरा करेगा। अक्षय ऊर्जा का वास्तविक अर्थ तभी होगा जब वह ऊर्जा लोकतंत्रीकरण का माध्यम बने।
विडंबना यह भी है कि दुनिया भारत की अक्षय ऊर्जा उपलब्धियों की प्रशंसा कर रही है, लेकिन भारत की प्रति व्यक्ति बिजली खपत अब भी विकसित देशों से बहुत कम है। आने वाले वर्षों में भारत की ऊर्जा मांग और बढ़ेगी। उद्योग, डेटा सेंटर, कृत्रिम मेधा आधारित डिजिटल अर्थव्यवस्था और इलेक्ट्रिक मोबिलिटी बिजली की खपत को नई ऊँचाइयों तक ले जाएँगे। ऐसे में केवल प्रतीकात्मक हरित नीतियाँ पर्याप्त नहीं होंगी। भारत को यथार्थवादी ऊर्जा मिश्रण की आवश्यकता होगी, जिसमें अक्षय ऊर्जा के साथ मजबूत ग्रिड, ऊर्जा भंडारण, परमाणु ऊर्जा और संक्रमणकालीन रूप में स्वच्छ कोयला तकनीकों का संतुलन भी शामिल हो।
भारत की सबसे बड़ी चुनौती वास्तव में “ऊर्जा उत्पादन” नहीं, बल्कि “ऊर्जा विश्वसनीयता” है। जनता को यह नहीं चाहिए कि बिजली सौर है या पवन; उसे चाहिए कि बिजली लगातार मिले, सस्ती मिले और आर्थिक विकास को बाधित न करे। यदि अक्षय ऊर्जा इस कसौटी पर खरी नहीं उतरती, तो जनता और उद्योग दोनों पारंपरिक ऊर्जा स्रोतों की ओर लौटेंगे। फिर भी यह कहना गलत होगा कि भारत की अक्षय ऊर्जा यात्रा असफल है। वास्तविकता यह है कि भारत दुनिया के उन चुनिंदा देशों में है जिसने सीमित संसाधनों के बावजूद हरित ऊर्जा क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति की है। सौर ऊर्जा क्षमता में भारत अब वैश्विक अग्रणी देशों में शामिल है और गैर-जीवाश्म ऊर्जा क्षमता में तेज वृद्धि दर्ज की गई है।
लेकिन आने वाला दशक निर्णायक होगा। यदि भारत ऊर्जा भंडारण, घरेलू विनिर्माण, वितरण सुधार, ट्रांसमिशन अवसंरचना और अनुसंधान निवेश पर गंभीरता से काम नहीं करता, तो वर्तमान उपलब्धियाँ केवल आँकड़ों तक सीमित रह जाएँगी। ऊर्जा संक्रमण केवल पर्यावरणीय मुद्दा नहीं है; यह आर्थिक संप्रभुता, राष्ट्रीय सुरक्षा और सामाजिक स्थिरता का प्रश्न भी है। भारत को अब “हरित घोषणाओं” से आगे बढ़कर “हरित क्षमता” विकसित करनी होगी। क्योंकि ऊर्जा का भविष्य केवल सूरज और हवा में नहीं छिपा है; वह उस राजनीतिक इच्छाशक्ति, वैज्ञानिक नवाचार और प्रशासनिक ईमानदारी में छिपा है, जो इन संसाधनों को स्थायी राष्ट्रीय शक्ति में बदल सके।
डॉ. शैलेश शुक्ला | Dr. Shailesh Shukla
वैश्विक समूह संपादक, सृजन संसार अंतरराष्ट्रीय पत्रिका समूह | Global Group Editor,Srijan Sansar Group of International Journals
सलाहकार संपादक, नईदुनिया एवं गौड़सन्स टाइम्स | Consulting Editor, NaiDunia & GaurSons Times
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