Swargvibha
Dr. Srimati Tara Singh
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भारत के लिए सुरक्षा परिषद की वीटो सहित स्थायी सीट

 

भारत के लिए सुरक्षा परिषद की वीटो सहित स्थायी सीट आख़िर क्यों है आवश्यक


सोमवार को संयुक्त राष्ट्र महासभा में सुरक्षा परिषद में सुधार पर चल रही अंतर-सरकारी वार्ता की बैठक हुई। वहाँ भारत के स्थायी प्रतिनिधि हरीश पर्वथनेनी ने अपनी बात रखी। आज तक और डीटी नेक्स्ट की रिपोर्टों के अनुसार उन्होंने कहा कि जब तक वीटो का प्रावधान मौजूद है, तब तक सुधार के बाद बनने वाली परिषद के सभी स्थायी सदस्यों के पास यह अधिकार होना चाहिए। उनके मुताबिक़ बिना वीटो वाले स्थायी सदस्यों की नई श्रेणी बनाना उन्हें व्यवहार में दूसरे दर्जे का सदस्य बना देगा। भारत का यह रुख़ नया नहीं है, पर सवाल यह है कि वह इस पर इतना अड़ा क्यों है और इससे उसे आख़िर मिलेगा क्या।

पहले यह समझ लें कि वीटो असल में क्या है। सुरक्षा परिषद में पाँच स्थायी सदस्य हैं: अमेरिका, रूस, चीन, ब्रिटेन और फ्रांस। संयुक्त राष्ट्र चार्टर के अनुसार प्रक्रिया से जुड़े मामलों को छोड़कर बाकी फ़ैसलों के लिए नौ सदस्यों की हाँ चाहिए और उनमें पाँचों स्थायी सदस्यों की सहमति भी शामिल होनी चाहिए। इसका मतलब है कि इनमें से कोई एक भी इनकार कर दे तो प्रस्ताव गिर जाता है, भले बाकी चौदह देश उसके पक्ष में हों। यानी परिषद में असली ताक़त वोटों की गिनती से नहीं, इसी अधिकार से तय होती है।

पर्वथनेनी ने इतिहास का हवाला भी दिया। 1965 में परिषद का विस्तार हुआ तो अस्थायी सदस्य छह से बढ़कर दस हो गए, पर स्थायी सदस्य पाँच ही रहे। इससे स्थायी और चुने हुए सदस्यों का अनुपात 5:6 से बदलकर 5:10 हो गया और भारत के मुताबिक़ पाँचों की ताक़त घटने के बजाय और मज़बूत हो गई। इसी कारण भारत कहता है कि अगर सुधार सिर्फ़ अस्थायी सीटें बढ़ाने तक सीमित रहा तो उसे विफलता ही माना जाएगा। वह यह भी चाहता है कि बातचीत लिखित प्रस्तावों पर हो और उसके लिए साफ़ समय-सीमा तय की जाए।

अब सवाल है कि वीटो वाली स्थायी सीट से भारत को क्या लाभ होगा। पहला लाभ है लगातार मौजूदगी। भारत आठ बार परिषद का अस्थायी सदस्य रह चुका है, आख़िरी बार 2021-22 में। अब वह 2028-29 के लिए प्रयास कर रहा है। इसका चुनाव जून 2027 में होना है और एशिया-प्रशांत समूह की एकमात्र सीट के लिए उसका मुक़ाबला ताजिकिस्तान से है। अस्थायी सदस्य को हर बार चुनाव जीतना पड़ता है और दो साल बाद विदा लेनी होती है। स्थायी सीट का मतलब है कि भारत हर बहस और हर प्रस्ताव की चर्चा में शुरू से शामिल रहेगा, फ़ैसले बन चुकने के बाद नहीं।

दूसरा लाभ है सुरक्षा कवच। चार्टर के अनुसार सदस्य देश परिषद के फ़ैसले मानने के लिए बाध्य हैं। ऐसे में वीटो वाला देश अपने हितों के ख़िलाफ़ किसी प्रस्ताव को पारित होने से रोक सकता है। बिना वीटो की स्थायी सीट में यह सुरक्षा नहीं मिलती, क्योंकि अंतिम फ़ैसला तब भी वही पाँच देश करते रहेंगे जिनके पास यह अधिकार है। भारत इसे केवल रुतबे का नहीं, सिद्धांत और बराबरी का सवाल बताता है।

तीसरा लाभ आतंकवाद के ख़िलाफ़ लड़ाई से जुड़ा है। संयुक्त राष्ट्र की 1267 प्रतिबंध समिति तय करती है कि किस व्यक्ति या संगठन को आतंकी सूची में डाला जाए। भारत लंबे समय से कहता रहा है कि इस सूची में नाम जोड़ने और हटाने में पारदर्शिता की कमी है और वह इसे एक तरह का छिपा हुआ वीटो बता चुका है। इसी साल अगस्त में परिषद की बहस में भारत ने कहा कि सदस्यता का इस्तेमाल आतंकियों को वैधता दिलाने के लिए नहीं होना चाहिए। मसूद अज़हर का मामला इसकी मिसाल है। रिपोर्टों के अनुसार भारत ने 2009 में उसे सूची में डलवाने की कोशिश शुरू की थी, पर चीन ने बार-बार इसे रोका। आख़िरकार 2019 में अमेरिका की पहल के बाद चीन की आपत्ति हटी और वह सूची में आ सका। स्थायी सदस्य के रूप में भारत ऐसे मामलों में अपनी बात कहीं ज़्यादा मज़बूती से रख सकेगा, हालाँकि किसी दूसरे स्थायी सदस्य का वीटो इससे अपने आप ख़त्म नहीं हो जाएगा।

चौथा लाभ कूटनीतिक वज़न है। संयुक्त राष्ट्र और भारत सरकार के अनुसार भारत के लगभग 2.75 से 2.9 लाख कर्मी अब तक शांति-अभियानों में सेवा दे चुके हैं और क़रीब 180 की जान गई है। संयुक्त राष्ट्र के अनुमानों में भारत 2023 से दुनिया का सबसे अधिक आबादी वाला देश है और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष के मुताबिक़ 2027 में वह जापान को पीछे छोड़कर चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन जाएगा। हालाँकि संयुक्त राष्ट्र के आँकड़ों में भारत का क्रम बदलता रहता है; जून 2025 में वह 5,387 कर्मियों के साथ चौथे स्थान पर था। विश्व बैंक के अनुसार 2024 में भारत की प्रति व्यक्ति आय 2,694 डॉलर थी, जो जापान से करीब बारह गुना कम है, इसलिए आकार और समृद्धि का फ़र्क़ भी याद रखना होगा। इतना योगदान और वज़न रखने वाले देश के पास जब फ़ैसले की मेज़ पर स्थायी जगह होगी, तो विकासशील देशों की चिंताएँ भी ज़्यादा असरदार ढंग से उठ सकेंगी। सितंबर 2024 में देशों ने आम सहमति से पैक्ट फ़ॉर द फ़्यूचर अपनाया, जिसमें अफ़्रीका के साथ हुए ऐतिहासिक अन्याय को प्राथमिकता से दूर करने और एशिया-प्रशांत तथा लैटिन अमेरिका का प्रतिनिधित्व सुधारने की बात है।

इस माँग को समर्थन भी मिल रहा है। अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस और रूस भारत की स्थायी सदस्यता का समर्थन कर चुके हैं, हालाँकि अमेरिका का समर्थन सुधरी हुई परिषद के लिए है, जबकि रिपोर्टों के अनुसार चीन अकेला स्थायी सदस्य है जिसने खुला समर्थन नहीं दिया। सितंबर 2026 में हंगरी, पोलैंड, स्लोवाकिया और चेक गणराज्य ने भी भारत का साथ दिया।

अफ़्रीकी संघ की एज़ुलविनी सहमति भी दो स्थायी सीटें वीटो समेत माँगती है और जी-4 ने अफ़्रीका की इस साझा स्थिति का समर्थन किया है। यानी वीटो की माँग अकेले भारत की नहीं, विकासशील दुनिया के एक बड़े हिस्से की है। पैक्ट फ़ॉर द फ़्यूचर में भी वीटो को सुधार का प्रमुख तत्व माना गया है और उसका दायरा तथा उपयोग सीमित करने पर चर्चा का वादा है।

लेकिन तस्वीर का दूसरा पहलू भी देखना चाहिए। वीटो केवल रोक सकता है, किसी प्रस्ताव को पारित नहीं करवा सकता। उसकी एक क़ीमत भी होती है, क्योंकि 2022 के बाद वीटो होने पर महासभा में उस पर बहस होती है। भारत खुद भी वीटो के दुरुपयोग की शिकायत करता रहा है, इसलिए उसे इसका इस्तेमाल बहुत सोच-समझकर करना होगा। यह भी याद रखना चाहिए कि 2005 में जी-4 के जिस प्रस्ताव का भारत सह-प्रायोजक था, उसमें नए स्थायी सदस्यों के वीटो पर 15 साल की समीक्षा तक रोक का प्रावधान था। स्थायी सदस्य बनने पर कठिन मुद्दों पर साफ़ पक्ष लेना होगा, जिससे कुछ मित्र देश नाराज़ भी हो सकते हैं।

सबसे बड़ी बाधा चार्टर ख़ुद है। उसके अनुच्छेद 108 के अनुसार संशोधन के लिए महासभा के दो-तिहाई मत और पाँचों स्थायी सदस्यों समेत दो-तिहाई देशों का अनुमोदन ज़रूरी है। यानी रास्ता लंबा है और हर स्थायी सदस्य के पास रोकने की ताक़त है।

फिर भी भारत की माँग को ज़िद कहना ठीक नहीं होगा। सुधार की बहस अब अकेले भारत की नहीं रही, 193 देश इस पर बातचीत कर रहे हैं। जो देश शांति के लिए जान देता रहा हो, जिसकी आबादी और अर्थव्यवस्था दुनिया के भविष्य को आकार दे रही हो, उसके लिए बराबरी की माँग स्वाभाविक है। वीटो सहित स्थायी सीट भारत को सुरक्षा, आवाज़ और भरोसा, तीनों दे सकती है। बशर्ते वह धैर्य रखे, समर्थन जुटाए और मिली ताक़त को ज़िम्मेदारी से बरते।


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