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Dr. Srimati Tara Singh
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भीड़ के बीच बिखरा भरोसा

 

"भीड़ के बीच बिखरा भरोसा - आंदोलन से अविश्वास तक" 

भारत ने स्वतंत्रता के बाद से कई बड़े राजनैतिक आंदोलन देखे हैं। उनमें से कुछ ने सरकारें हिला दीं, कुछ अख़बारों की सुर्ख़ियों में ही दम तोड़ गए। फ़र्क़ अक्सर एक ही बात से पड़ता था कि आम आदमी घर से निकला या नहीं। जेपी का आंदोलन हो, 2011 में अन्ना का रामलीला मैदान हो या किसानों का साल भर चला धरना - तीनों में मुद्दा किसी न किसी रूप में हर घर तक पहुँच गया था। अब हर जगह यह सवाल पूछा जा रहा है कि कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) और राहुल गांधी के ‘वोट चोरी’ अभियान को जनता का साथ क्यों नहीं मिल रहा। सवाल जायज़ है, पर उसके भीतर एक मान्यता छिपी है कि साथ मिला ही नहीं। उसे परखे बिना आगे बढ़ना ठीक नहीं होगा।

परखने पर पहली बात यह निकलती है कि सीजेपी को जनता का साथ मिला था औरख़ूब मिला। मई 2026 में बने इस व्यंग्यात्मक संगठन के इंस्टाग्राम फ़ॉलोअर हफ़्ते भर से कम में 2.2 करोड़ से ऊपर पहुँच गए। द वीक ने लिखा कि 20 जुलाई को, संसद के मानसून सत्र के पहले दिन, देश भर से हज़ारों लोग दिल्ली आए। एनईईटी-यूजी 2026 के पेपर लीक पर हफ़्तों जंतर-मंतर पर धरना चला औरपीटीआई के हवाले से डीटी नेक्स्ट ने ख़बर दी कि 25 जुलाई को शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने इस्तीफ़ा दे दिया। फ्री प्रेस जर्नल के मुताबिक सीजेपी उनके इस्तीफ़े को पहले से ‘अनिवार्य’ माँग बता रही थी। जो आंदोलन मंत्री की कुर्सी ले जाए, उसे जन-समर्थन से वंचित कहना अन्याय होगा। पेपर लीक की चोट भी सीधी थी, क्योंकि वह उन परिवारों पर पड़ती है जिनके बच्चे बरसों तैयारी करते हैं।

दिक़्क़त बाद में शुरू हुई। आउटलुक के मुताबिक 10 अक्टूबर को सीजेपी ने मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफ़े की माँग पर दूसरी लहर चलाई। मुद्दा था मतदाता सूची का विशेष गहन पुनरीक्षण, यानी एसआईआर। पेपर लीक में हर माँ-बाप को अपना नुक़सान दिखता है। मतदाता सूची की बहस में पहले समझाना पड़ता है कि नुक़सान क्या है और किसका है। फ़र्क़ मेरे अनुमान से यहीं पड़ा। यह किसी सर्वे का नतीजा नहीं, मेरा अपना अंदाज़ा है।

10 अक्टूबर की भीड़ पर फ़ैसला सुनाने से पहले यह देख लेना चाहिए कि उस दिन दिल्ली कैसी थी। एएनआई की ख़बर (डेवडिस्कोर्स पर) के अनुसार पुलिस ने जंतर-मंतर पर अनुमति देने से पहले ही मना कर दिया था। उसका कहना था कि वहाँ एक हज़ार लोगों की ही गुंजाइश है। द वीक लिखता है कि साठ हज़ार से ज़्यादा सुरक्षाकर्मी लगाए गए, चार किलोमीटर के दायरे में इंटरनेट बंद रहा, मेट्रो के कई स्टेशन बंद हुए और सुप्रीम कोर्ट को दख़ल देकर कहना पड़ा कि आम यात्रियों को बेवजह तकलीफ़ न दी जाए। सीजेपी के तीन बड़े नेता विमान से उतरते ही हिरासत में थे। यूएनआई ने सैकड़ों प्रदर्शनकारियों के हिरासत में लिए जाने की ख़बर दी। ऐसे घेरे में कितने लोग पहुँच पाते, यह कोई नहीं बता सकता।

फिर भी तस्वीर को पूरी तरह सफ़ाई देने लायक़ नहीं कहा जा सकता। द प्रिंट के अनुसार 14 अक्टूबर को सह-संयोजक आशुतोष रंका और सौरव दास को पाँच दिन की न्यायिक हिरासत में भेजा गया। जंतर-मंतर तब तक प्रदर्शन-स्थलों की सूची से हटाया जा चुका था। 16 अक्टूबर की रिपोर्ट में द वीक ने बताया कि कनॉट प्लेस के प्रदर्शन में बहुत कम लोग थे और पहले चरण वाला खिंचाव ढीला पड़ रहा था। आंदोलन के तीनों बड़े चेहरे उस समय या तो हिरासत में थे या घर में पाबंद। वहाँ मौजूद एक प्रदर्शनकारी ने ख़ुद माना कि पहले जितने लोग नहीं हैं।

सीजेपी की एक कमज़ोरी उसके जन्म में ही थी। नेशनल हेराल्ड ने प्रशांत किशोर को उद्धृत किया है कि शुरुआती दिनों में यह सोशल मीडिया का अभियान भर था, जिसका कोई स्थापित सांगठनिक ढाँचा नहीं था। साथ में उन्होंने इसे बेरोज़गारी, भ्रष्टाचार और महँगाई से उपजी बेचैनी का संकेत भी बताया था। न्यूज़ अरेना के मुताबिक रंका ने साफ़ कहा कि सीजेपी पार्टी नहीं है, सीधे चुनाव नहीं लड़ेगी, बस अपनी माँगों से सहमत ताक़तों का साथ देगी। द न्यूज़ मिनट और न्यूज़लॉन्ड्री के साझा न्यूज़लेटर में कांग्रेस के भीतर की हिचक का ज़िक्र है। पार्टी को आंदोलन की वैचारिक ज़मीन साफ़ नहीं दिखती थी और आम आदमी पार्टी से उसकी निकटता भी खटकती थी। जिसके पास ढाँचा न हो और जिसकी दिशा पर साथी भी उलझन में हों, उसके लिए ऑनलाइन लोकप्रियता को लंबी लड़ाई में बदलना मुश्किल होता है।

विपक्ष की आपसी खींचतान मुझे सबसे ज़्यादा खटकती है। 1977 में विपक्ष ने अपने दलों के झंडे उतारकर जनता पार्टी बना ली थी। इस बार आउटलुक की रिपोर्ट के मुताबिक कांग्रेस आंदोलन के पहले महीने में जंतर-मंतर से जान-बूझकर दूर रही औरपार्टी के भीतर अन्ना आंदोलन की याद का हवाला दिया गया, यानी डर कि ग़ैर-राजनीतिक आंदोलन कल प्रतिद्वंद्वी बन सकता है। यह रिपोर्टों में बताया गया कारण है, पार्टी का आधिकारिक बयान नहीं। द स्टेट्समैन ने छापा कि जब राहुल गांधी संसद-यात्रा के बाद प्रधानमंत्री आवास के पास धरने पर बैठे, तो आम आदमी पार्टी की आतिशी ने उसे कांग्रेस और भाजपा के बीच ‘फ़िक्स्ड मैच’ कह दिया। 10 अक्टूबर के प्रदर्शन से कांग्रेस दूर रही और आउटलुक के अनुसार सीजेपी भी राहुल के घर हुई इंडिया गठबंधन की बैठक में नहीं गई। राहुल ने खुलकर सीजेपी का समर्थन पहली बार 14 अक्टूबर को किया, द प्रिंट के मुताबिक तब, जब रंका और दास जेल भेजे जा चुके थे। जब एक ही मुद्दे पर लड़ने वाले एक-दूसरे को शक से देखें, तो आम आदमी क्यों माने कि यह जनता की लड़ाई है, मंच की नहीं?

राहुल गांधी के ‘वोट चोरी’ अभियान का हाल फ्री प्रेस जर्नल में 30 सितंबर को वरिष्ठ पत्रकार भावदीप कांग ने बयान किया है। उनकी दलील है कि मताधिकार भारतीयों के लिए लगभग पवित्र चीज़ है, इसलिए उसके हनन पर जनता को सड़क पर होना चाहिए था। मगर जिन राज्यों में एसआईआर हुआ, वहाँ पार्टियों के अपने कार्यक्रमों के सिवा कोई प्रदर्शन नहीं दिखा। उनके मुताबिक लोगों का ग़ुस्सा असुविधा पर है: ख़राब सॉफ़्टवेयर, उलझी प्रक्रिया, काम के बोझ से दबे बूथ-स्तर के अधिकारी। यह परेशानी सब दलों के समर्थकों ने उठाई, इसलिए लोगों के मन में बात ‘वोट चोरी’ की कम, ‘गड़बड़-झंझट’ की ज़्यादा बनी। कांग्रेस के भीतर भी कई नेता अभियान को लेकर आश्वस्त नहीं हैं, यह भी वे लिखती हैं। यह एक टिप्पणीकार का आकलन है, कोई सर्वे नहीं।

क़ानूनी ज़मीन भी आसान नहीं। बार एंड बेंच के अनुसार सुप्रीम कोर्ट ने 27 मई 2026 को बिहार और दूसरे राज्यों के एसआईआर को वैध ठहराया। लाइव लॉ के हवाले से द क्विंट ने लिखा कि अदालत ने आयोग का यह अधिकार अनुच्छेद 324 और जनप्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 21(3) में पाया। न्यूज़लॉन्ड्री की रिपोर्ट में एक और बात है जो दोनों पक्षों को ध्यान में रखनी चाहिए। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची की पीठ ने कहा कि आयोग नागरिकता की जाँच कर सकता है, पर उसका अंतिम फ़ैसला नहीं कर सकता औरसूची में पहले से दर्ज मतदाताओं के पक्ष में अनुमान रखना होगा। अदालत की मुहर के बाद केवल नारे से काम नहीं चलता, प्रमाण चाहिए। यह मेरी राय है।

पर विपक्ष के हाथ ख़ाली भी नहीं हैं। इंडियन एक्सप्रेस की 23 सितंबर की रिपोर्ट कहती है कि चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने दस महीनों में एसआईआर से जुड़े फ़ैसलों पर कम से कम 14 बार लिखित आपत्ति दर्ज की, इस शिकायत के साथ कि फ़ैसले उनकी जानकारी के बिना हुए। पीटीआई की रिपोर्ट (द प्रिंट पर) के मुताबिक आयोग का जवाब है कि उसके सब आदेश पूरी वैधानिकता से जारी हुए और सदस्यों के सवाल सामान्य प्रशासनिक कामकाज का हिस्सा हैं। महाराष्ट्र में मुख्य निर्वाचन अधिकारी के आँकड़े, जो फ्री प्रेस जर्नल ने छापे, बताते हैं कि 9.78 करोड़ मतदाताओं में से 7.71 करोड़ प्रारूप सूची में आए और क़रीब 2.07 करोड़ के गणना-प्रपत्र न मिलने से उनके नाम बाहर रहे। राहुल गांधी ने इसे ‘वोट चोरी’ कहा (पीटीआई)। अधिकारियों का कहना है कि प्रारूप सूची से बाहर होना स्थायी विलोपन नहीं है और दावे-आपत्ति का मौक़ा 30 सितंबर तक था। आईएएनएस के अनुसार बाहर रहे नामों में क़रीब 34 लाख मृतकों के और 17 लाख दोहरी प्रविष्टियों के भी थे। यानी झगड़ा आँकड़ों की व्याख्या का भी है औरसवाल पूछने का हक़ विपक्ष को है। उसका यह तर्क भी वज़नी है कि जब राजधानी में प्रदर्शन की जगह ही हटा दी जाए और नेता हिरासत में हों, तब ख़ाली सड़क को जन-समर्थन के अभाव का सबूत नहीं माना जा सकता।

एक बात ईमानदारी से कहनी होगी। आज की जन-भावना नापने वाला कोई भरोसेमंद राष्ट्रव्यापी सर्वेक्षण मुझे नहीं मिला। ‘जनता ने साथ नहीं दिया’ इसलिए मापे हुए तथ्य से ज़्यादा अनुमान है, जो प्रदर्शनों की रिपोर्टों और टिप्पणीकारों की राय से बनता है। उसी अनुमान पर चलूँ तो मुझे लगता है कि पेपर लीक की चोट सबको दिखती थी, जबकि वोटर लिस्ट का दर्द ज़्यादातर लोगों को असुविधा लगा। सीजेपी के पास ढाँचा नहीं था और कांग्रेस से उसकी बनी नहीं। राहुल का आरोप जितना बड़ा था, उसके साथ रखे गए प्रमाण उतने बड़े नहीं दिखे, कम से कम अदालत और आम लोगों की नज़र में। फिर भी न सीजेपी की उपलब्धि छोटी है, न आयोग के भीतर की दरारें हल्की। एक युवा आंदोलन ने मंत्री से इस्तीफ़ा दिलवाया और आयोग के कामकाज पर बहस दोबारा खुल गई। आगे क्या होगा, मैं नहीं कहता। इतनी लंबी उम्र में अपनी भविष्यवाणियाँ मैंने ख़ुद ग़लत होती देखी हैं। हाँ, इतना पक्का है कि जनता को कोसने से आंदोलन आगे नहीं बढ़ते।



डॉ. शैलेशशुक्ला | Dr. Shailesh Shukla

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