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Dr. Srimati Tara Singh
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आखिर कब तक चलेगी अमेरिका की दादागिरी?

 

आखिर कब तक चलेगी अमेरिका की दादागिरी?

विश्व राजनीति में शक्ति का संतुलन जब भी एकतरफा हुआ है, तब-तब मानवता ने उसकी भारी कीमत चुकाई है। आज 30 मई 2026 को दुनिया जिस अस्थिरता, युद्ध, आर्थिक तनाव और ऊर्जा संकट के दौर से गुजर रही है, उसमें अमेरिका की भूमिका पर गंभीर प्रश्न उठ रहे हैं। विशेष रूप से डोनाल्ड ट्रम्प के नेतृत्व में अमेरिकी विदेश नीति ने अंतरराष्ट्रीय संबंधों को सहयोग और कूटनीति से हटाकर दबाव, प्रतिबंध, सैन्य हस्तक्षेप और आर्थिक धमकियों की दिशा में धकेल दिया है। परिणाम यह हुआ है कि दुनिया का बड़ा हिस्सा भय, असुरक्षा और अनिश्चितता के वातावरण में जीने को मजबूर है।

जनवरी 2026 में वेनेजुएला में जो कुछ हुआ, उसने अंतरराष्ट्रीय कानून और राष्ट्रीय संप्रभुता की अवधारणा को झकझोर कर रख दिया। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने सार्वजनिक रूप से दावा किया कि अमेरिकी सैन्य कार्रवाई के दौरान वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो को पकड़ लिया गया और उन्हें देश से बाहर ले जाया गया। अमेरिकी प्रशासन ने इसे लोकतंत्र और कानून व्यवस्था की कार्रवाई बताया, जबकि दुनिया के अनेक देशों और अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों ने इसे एक संप्रभु राष्ट्र के खिलाफ प्रत्यक्ष हस्तक्षेप माना।

यह प्रश्न स्वाभाविक है कि यदि किसी शक्तिशाली देश को यह अधिकार मिल जाए कि वह दूसरे देश के निर्वाचित राष्ट्रपति को सैन्य बल के माध्यम से गिरफ्तार कर ले, तो फिर अंतरराष्ट्रीय कानून का अस्तित्व ही क्या रह जाता है? क्या यही नियम अमेरिका अपने ऊपर लागू होने देगा? यदि कोई अन्य महाशक्ति किसी अमेरिकी राष्ट्रपति के विरुद्ध ऐसा कदम उठाए तो क्या वाशिंगटन उसे वैध मानेगा? यही दोहरा मापदंड आज अमेरिकी विदेश नीति की सबसे बड़ी आलोचना का कारण बन चुका है।

वेनेजुएला का मामला केवल सत्ता परिवर्तन तक सीमित नहीं है। यह उस मानसिकता का प्रतीक है जिसमें दुनिया के संसाधनों, विशेष रूप से ऊर्जा संसाधनों, पर नियंत्रण को रणनीतिक अधिकार समझ लिया जाता है। वेनेजुएला दुनिया के सबसे बड़े प्रमाणित तेल भंडारों वाले देशों में गिना जाता है। ऐसे में वहां की राजनीतिक व्यवस्था में अमेरिकी हस्तक्षेप को केवल लोकतंत्र की चिंता मान लेना वास्तविकताओं से आंख मूंदना होगा।

इसी प्रकार 2026 में ईरान के साथ हुए संघर्ष ने भी दुनिया को भयावह संदेश दिया। फरवरी 2026 में दक्षिणी ईरान के एक प्राथमिक विद्यालय पर हुए हमले में बड़ी संख्या में बच्चों और शिक्षकों की मौत हुई। मानवाधिकार संगठन ह्यूमन राइट्स वॉच ने इस घटना की स्वतंत्र जांच की मांग करते हुए इसे संभावित युद्ध अपराध बताया। संगठन ने स्पष्ट कहा कि नागरिकों और स्कूलों पर हमले अंतरराष्ट्रीय मानवीय कानून के गंभीर उल्लंघन हैं।

अंतरराष्ट्रीय मीडिया संस्थानों और जांच रिपोर्टों में यह भी सामने आया कि ईरान के विभिन्न क्षेत्रों में स्कूलों और नागरिक परिसरों को निशाना बनाया गया। इन घटनाओं ने यह प्रश्न खड़ा किया कि क्या आतंकवाद से लड़ने या सुरक्षा के नाम पर बच्चों के जीवन को जोखिम में डालना किसी भी परिस्थिति में उचित ठहराया जा सकता है?

ईरान संघर्ष का एक और गंभीर परिणाम वैश्विक ऊर्जा संकट के रूप में सामने आया। दुनिया के लगभग पांचवें हिस्से के तेल परिवहन का मार्ग माने जाने वाले होर्मुज जलडमरूमध्य में तनाव और रुकावटों ने पूरी वैश्विक अर्थव्यवस्था को हिला दिया। ऊर्जा बाजारों में भारी उतार-चढ़ाव आया, तेल की कीमतें तेजी से बढ़ीं और अनेक देशों में महंगाई का दबाव बढ़ गया। अंतरराष्ट्रीय वित्तीय विश्लेषणों में यह स्वीकार किया गया कि होर्मुज क्षेत्र में अस्थिरता का प्रभाव केवल मध्य पूर्व तक सीमित नहीं रहता, बल्कि पूरी दुनिया की ऊर्जा सुरक्षा पर पड़ता है।

ऊर्जा संकट के साथ-साथ ट्रम्प की आर्थिक नीतियों ने भी वैश्विक तनाव को बढ़ाया। “अमेरिका फर्स्ट” की नीति के नाम पर लगातार बढ़ाए गए टैरिफ और व्यापारिक प्रतिबंधों ने अंतरराष्ट्रीय व्यापार व्यवस्था को अस्थिर किया। कई आर्थिक अध्ययनों ने संकेत दिया है कि व्यापार युद्धों और प्रतिशोधात्मक टैरिफों के कारण वैश्विक रोजगार, निर्यात और उत्पादन पर नकारात्मक प्रभाव पड़ा। एक अध्ययन के अनुसार सबसे खराब स्थिति में करोड़ों नौकरियों पर प्रभाव पड़ सकता है और सबसे अधिक नुकसान निम्न आय तथा असंगठित श्रमिकों को झेलना पड़ता है।

टैरिफ नीति का प्रभाव केवल अमेरिका और चीन तक सीमित नहीं रहा। वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाएं बाधित हुईं, निवेशकों का विश्वास प्रभावित हुआ और कई देशों को अपनी व्यापारिक रणनीतियों पर पुनर्विचार करना पड़ा। आर्थिक विशेषज्ञों ने यह भी पाया कि अत्यधिक टैरिफ न केवल वैश्विक कल्याण को नुकसान पहुंचाते हैं, बल्कि अंततः अमेरिकी उपभोक्ताओं और उद्योगों पर भी अतिरिक्त बोझ डालते हैं।

डोनाल्ड ट्रम्प की आलोचना केवल विदेश नीति तक सीमित नहीं है। उनके शासनकाल में अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं और बहुपक्षीय सहयोग की अवधारणा को भी लगातार कमजोर किया गया। संयुक्त राष्ट्र, वैश्विक जलवायु समझौतों, व्यापारिक संस्थाओं और अंतरराष्ट्रीय सहयोग तंत्रों के प्रति बार-बार संदेह और टकराव का रवैया अपनाया गया। इससे दुनिया में यह संदेश गया कि सबसे शक्तिशाली राष्ट्र स्वयं उन नियमों का सम्मान करने को तैयार नहीं है, जिनका पालन करने की अपेक्षा वह दूसरों से करता है।

इतिहास पर दृष्टि डालें तो यह प्रवृत्ति नई नहीं है। इराक में कथित विनाशकारी हथियारों के नाम पर युद्ध छेड़ा गया, लेकिन बाद में ऐसे हथियार नहीं मिले। लीबिया में हस्तक्षेप के बाद स्थिर लोकतंत्र नहीं बल्कि दीर्घकालिक अराजकता पैदा हुई। अफगानिस्तान में दो दशक तक सैन्य उपस्थिति के बाद अचानक वापसी ने वहां के भविष्य को अनिश्चितता में छोड़ दिया। इन घटनाओं ने दुनिया को यह सोचने पर मजबूर किया कि क्या अमेरिकी हस्तक्षेप वास्तव में लोकतंत्र और मानवाधिकारों के लिए होते हैं या उनके पीछे भू-राजनीतिक और आर्थिक हित अधिक प्रभावी रहते हैं।

आज स्थिति यह है कि दुनिया के अनेक हिस्सों में अमेरिका के प्रति अविश्वास बढ़ा है। लैटिन अमेरिका में उसे हस्तक्षेपकारी शक्ति के रूप में देखा जाता है। पश्चिम एशिया में उसे युद्धों और अस्थिरता से जोड़कर देखा जाता है। एशिया में व्यापारिक और सामरिक दबावों को लेकर चिंताएं हैं। यहां तक कि यूरोप के अनेक देशों में भी यह बहस चल रही है कि क्या अमेरिकी नीतियों पर पूर्ण निर्भरता दीर्घकालिक रूप से सुरक्षित है।

सबसे बड़ी चिंता यह है कि इस पूरी प्रक्रिया में सबसे अधिक नुकसान आम नागरिकों को होता है। युद्धों में मरने वाले बच्चे किसी सरकार के नहीं, मानवता के बच्चे होते हैं। ऊर्जा संकट का बोझ किसी राष्ट्रपति पर नहीं, बल्कि सामान्य परिवारों पर पड़ता है। व्यापार युद्धों का असर बड़े नेताओं पर नहीं, बल्कि मजदूरों, किसानों और छोटे उद्योगों पर पड़ता है। यही कारण है कि आज दुनिया के अनेक हिस्सों में यह मांग उठ रही है कि अंतरराष्ट्रीय राजनीति को शक्ति प्रदर्शन नहीं, बल्कि सहयोग, सम्मान और संवाद के आधार पर चलाया जाए।

यह कहना गलत होगा कि दुनिया की सारी समस्याओं के लिए केवल अमेरिका जिम्मेदार है। अन्य देशों की भी अपनी जिम्मेदारियां और गलतियां हैं। लेकिन जब कोई राष्ट्र स्वयं को वैश्विक नेतृत्व का दावेदार बताता है, तब उससे अधिक जिम्मेदारी और संतुलन की अपेक्षा भी की जाती है। दुर्भाग्य से ट्रम्प युग की अनेक नीतियां इस कसौटी पर खरी नहीं उतरतीं।

दुनिया को आज ऐसे नेतृत्व की आवश्यकता है जो टकराव नहीं, समाधान खोजे; जो प्रतिबंध नहीं, संवाद को प्राथमिकता दे; जो सैन्य शक्ति नहीं, मानवीय संवेदना को महत्व दे। यदि वैश्विक राजनीति लगातार दादागिरी, आर्थिक दबाव और सैन्य हस्तक्षेप के रास्ते पर चलती रही, तो उसका परिणाम और अधिक युद्ध, अधिक अस्थिरता और अधिक मानवीय त्रासदी के रूप में सामने आएगा।

इसलिए प्रश्न आज भी उतना ही प्रासंगिक है—कब तक चलेगी अमेरिका की दादागिरी? इसका उत्तर शायद तब मिलेगा जब दुनिया शक्ति के भय से नहीं, बल्कि न्याय, समानता और अंतरराष्ट्रीय सम्मान के सिद्धांतों पर खड़ी होगी।


डॉ. शैलेश शुक्ला | Dr. Shailesh Shukla

वैश्विक समूह संपादक, सृजन संसार अंतरराष्ट्रीय पत्रिका समूह | Global Group Editor,Srijan Sansar Group of International Journals

सलाहकार संपादक, नईदुनिया  एवं गौड़सन्स टाइम्स | Consulting Editor, NaiDunia & GaurSons Times

आशियाना, लखनऊ - 226012, उत्तर प्रदेश | Ashiyana, Lucknow – 226012, Uttar Pradesh

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