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एआई के न्यायपूर्वक एवं सार्वभौमिक समावेशी प्रयोग के लिए जरूरी उपाय
कृत्रिम बुद्धिमत्ता यानी एआई आज हमारे जीवन में तेजी से जगह बना रही है। पढ़ाई से लेकर व्यापार तक, खेती से लेकर स्वास्थ्य तक और पत्रकारिता से लेकर सरकारी कामकाज तक, इसका इस्तेमाल बढ़ रहा है। आने वाले समय में एआई केवल सुविधा देने वाली तकनीक नहीं रहेगी, बल्कि काम करने, सीखने और निर्णय लेने का एक महत्वपूर्ण साधन बन सकती है। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यह नहीं है कि एआई कितनी तेजी से विकसित होगी, बल्कि यह है कि इसका लाभ किसे मिलेगा। यदि एआई का फायदा केवल अमीर देशों, बड़ी कंपनियों और अधिक आय वाले लोगों तक सीमित रह गया, तो दुनिया में पहले से मौजूद आर्थिक और सामाजिक असमानता और बढ़ सकती है। इसलिए जरूरी है कि एआई का विकास और उसका इस्तेमाल न्यायपूर्ण हो और समाज के हर वर्ग तथा दुनिया के हर हिस्से तक उसकी पहुँच हो। संयुक्त राष्ट्र शैक्षिक, वैज्ञानिक और सांस्कृतिक संगठन ने भी एआई के संबंध में मानव अधिकार, समानता, पारदर्शिता, गोपनीयता, मानवीय निगरानी और भेदभाव से बचाव को महत्वपूर्ण माना है।
सबसे पहले एआई को आम लोगों के लिए सस्ता और आसानी से उपलब्ध बनाना होगा। आज किसी विकसित देश में एआई की जो सदस्यता शुल्क सामान्य लग सकती है, वही शुल्क किसी विकासशील देश के विद्यार्थी, शिक्षक या छोटे व्यापारी के लिए बहुत अधिक हो सकती है। इसलिए दुनिया के सभी देशों के लिए एक जैसी कीमत रखना हमेशा न्यायपूर्ण नहीं हो सकता। एआई कंपनियों को अलग-अलग देशों की आय, क्रय-शक्ति और जीवन-यापन की लागत को ध्यान में रखकर कीमत तय करनी चाहिए। विद्यार्थियों, शिक्षकों, शोधकर्ताओं, छोटे कारोबारियों और गैर-लाभकारी संस्थाओं के लिए कम कीमत वाली योजनाएँ होनी चाहिए। विश्वविद्यालयों और सार्वजनिक पुस्तकालयों को सामूहिक सदस्यता देकर बड़ी संख्या में लोगों तक एआई पहुँचाई जा सकती है। यदि एआई को भविष्य की महत्वपूर्ण ज्ञान और उत्पादकता तकनीक माना जा रहा है, तो उसे केवल अधिक पैसा खर्च कर सकने वाले लोगों की सुविधा नहीं बनाया जा सकता।
एआई की समान पहुँच के लिए केवल सस्ती सदस्यता पर्याप्त नहीं होगी। इसके लिए इंटरनेट, बिजली और डिजिटल उपकरण भी जरूरी हैं। आज भी दुनिया के करोड़ों लोग इंटरनेट से बाहर हैं। अंतरराष्ट्रीय दूरसंचार संघ के वर्ष दो हजार पच्चीस के अनुसार दुनिया की लगभग तीन-चौथाई आबादी इंटरनेट से जुड़ी है, लेकिन लगभग दो अरब बीस करोड़ लोग अभी भी इंटरनेट से बाहर हैं और इनमें अधिकांश निम्न तथा मध्यम आय वाले देशों में रहते हैं। इंटरनेट की कीमत भी हर जगह समान रूप से वहनीय नहीं है। निम्न-मध्यम आय वाले देशों में मोबाइल इंटरनेट पर लोगों की आय का बोझ उच्च आय वाले देशों की तुलना में औसतन लगभग सात गुना और निम्न आय वाले देशों में लगभग बाईस गुना अधिक है। ऐसे में यदि किसी व्यक्ति के लिए इंटरनेट ही महंगा है, तो उससे महंगी एआई सेवा खरीदने की उम्मीद करना व्यावहारिक नहीं है। इसलिए एआई के सार्वभौमिक उपयोग के लिए सस्ता और भरोसेमंद इंटरनेट, ग्रामीण क्षेत्रों में बेहतर संपर्क व्यवस्था और पर्याप्त बिजली उपलब्ध कराना भी जरूरी है।
इसके साथ एआई की समझ को आम लोगों तक पहुँचाना भी बहुत जरूरी है। एआई का इस्तेमाल करना और एआई को समझना दो अलग बातें हैं। किसी व्यक्ति को यह पता होना चाहिए कि एआई किस तरह काम करती है, उससे मिलने वाली जानकारी की जाँच कैसे करनी है और किन मामलों में उस पर पूरी तरह भरोसा नहीं किया जा सकता। बच्चों और युवाओं के साथ-साथ शिक्षकों, सरकारी कर्मचारियों, पत्रकारों, किसानों, व्यापारियों और सामान्य नागरिकों को भी एआई की बुनियादी जानकारी दी जानी चाहिए। स्कूलों, कॉलेजों और प्रशिक्षण संस्थानों में एआई साक्षरता को बढ़ावा देना चाहिए। यह प्रशिक्षण केवल अंग्रेजी में नहीं, बल्कि स्थानीय भाषाओं में भी होना चाहिए। विश्व बैंक ने भी विकासशील देशों में एआई के लिए संपर्क सुविधा, संगणना क्षमता, स्थानीय संदर्भ और कौशल को महत्वपूर्ण आधार माना है।
भाषा का सवाल भी एआई के समावेश से सीधे जुड़ा हुआ है। दुनिया के बहुत बड़े हिस्से की आबादी अंग्रेजी में काम नहीं करती। यदि एआई केवल कुछ बड़ी भाषाओं में अच्छी तरह काम करेगी, तो करोड़ों लोग उसकी पूरी क्षमता का लाभ नहीं उठा पाएँगे। भारत इसका बड़ा उदाहरण है। यहाँ हिंदी सहित अनेक भारतीय भाषाएँ करोड़ों लोगों के दैनिक जीवन का हिस्सा हैं। इसलिए एआई को भारतीय भाषाओं में बेहतर बनाने की जरूरत है। यही बात अफ्रीका, एशिया और लैटिन अमेरिका की स्थानीय भाषाओं पर भी लागू होती है। स्थानीय भाषा में उपलब्ध एआई शिक्षा, खेती, स्वास्थ्य, सरकारी योजनाओं और रोजगार से जुड़ी जानकारी को उन लोगों तक पहुँचा सकती है जो अंग्रेजी में सहज नहीं हैं। यूनेस्को ने भी एआई में बहुभाषिकता, सांस्कृतिक विविधता और वंचित समूहों की आवश्यकताओं को ध्यान में रखने पर जोर दिया है।
एआई के न्यायपूर्ण इस्तेमाल के लिए यह भी जरूरी है कि उसके निर्णय किसी व्यक्ति या समुदाय के साथ भेदभाव न करें। एआई जिस जानकारी और आँकड़ों से सीखती है, उनमें यदि पहले से मौजूद सामाजिक या लैंगिक पक्षपात है, तो उसके परिणामों में भी उसका असर आ सकता है। इसलिए रोजगार, शिक्षा, बैंकिंग, बीमा, स्वास्थ्य या सरकारी सेवाओं जैसे संवेदनशील क्षेत्रों में इस्तेमाल होने वाली एआई प्रणालियों की नियमित जाँच होनी चाहिए। यह देखा जाना चाहिए कि किसी भाषा, क्षेत्र, लिंग, आय-वर्ग या सामाजिक समूह के साथ अनुचित व्यवहार तो नहीं हो रहा। यदि कोई एआई प्रणाली गलत या पक्षपातपूर्ण परिणाम देती है, तो उसे सुधारने की स्पष्ट व्यवस्था होनी चाहिए। एआई के विकास में केवल तकनीकी दक्षता पर्याप्त नहीं है; उसमें सामाजिक न्याय की समझ भी होनी चाहिए।
गोपनीयता की रक्षा भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। एआई के लिए बहुत बड़ी मात्रा में आँकड़ों की जरूरत पड़ सकती है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि लोगों की निजी जानकारी पर उनका अधिकार समाप्त हो जाए। व्यक्तिगत, आर्थिक, स्वास्थ्य और अन्य संवेदनशील जानकारी का इस्तेमाल उचित नियमों और सुरक्षा के साथ होना चाहिए। लोगों को यह जानने का अधिकार होना चाहिए कि उनकी जानकारी किस उद्देश्य से ली जा रही है और उसका इस्तेमाल कहाँ किया जा रहा है। यूनेस्को की एआई संबंधी सिफारिश में भी पूरे एआई जीवनचक्र के दौरान गोपनीयता और आँकड़ा सुरक्षा की आवश्यकता पर जोर दिया गया है।
एआई के महत्वपूर्ण निर्णयों में मनुष्य की भूमिका भी बनी रहनी चाहिए। यदि किसी व्यक्ति को नौकरी देने, ऋण देने, इलाज से संबंधित महत्वपूर्ण निर्णय लेने या किसी नागरिक के अधिकारों को प्रभावित करने वाले काम में एआई का इस्तेमाल किया जा रहा है, तो केवल मशीन के निर्णय को अंतिम नहीं माना जाना चाहिए। किसी जिम्मेदार व्यक्ति या संस्था के पास उस निर्णय की जाँच करने और आवश्यकता पड़ने पर उसे बदलने की क्षमता होनी चाहिए। यूनेस्को स्पष्ट रूप से मानवीय निगरानी और अंतिम मानवीय जिम्मेदारी को महत्वपूर्ण मानता है। इससे यह भी सुनिश्चित होगा कि तकनीकी गलती होने पर जिम्मेदारी किसी मशीन के नाम पर टाल न दी जाए।
एआई के कारण रोजगार की दुनिया में होने वाले बदलाव को भी गंभीरता से समझना होगा। कुछ कामों में एआई मनुष्य की सहायता करेगी, कुछ कामों को आसान बनाएगी और कुछ कामों के स्वरूप में बदलाव ला सकती है। इसलिए जिन लोगों के काम बदलने की संभावना है, उन्हें नए कौशल सीखने के अवसर देने होंगे। सरकारों, कंपनियों और शिक्षण संस्थानों को मिलकर ऐसे प्रशिक्षण कार्यक्रम चलाने चाहिए जिनसे लोग एआई के साथ काम करना सीख सकें। खासकर छोटे शहरों, ग्रामीण क्षेत्रों और कम आय वाले वर्गों के लोगों को इस बदलाव से बाहर नहीं छोड़ा जाना चाहिए। एआई का उद्देश्य केवल लागत कम करना नहीं, बल्कि मनुष्य की क्षमता बढ़ाना होना चाहिए।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि विकासशील देशों को एआई के केवल उपभोक्ता के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। इन देशों में स्थानीय समस्याओं, भाषाओं और जरूरतों को समझने वाले लोग हैं। उन्हें एआई के विकास, शोध और नए अनुप्रयोगों में भाग लेने का अवसर मिलना चाहिए। स्थानीय विश्वविद्यालयों, शोध संस्थानों और नए उद्यमों को एआई से जुड़े अनुसंधान के लिए सहायता मिलनी चाहिए। इससे स्थानीय जरूरतों के अनुसार बेहतर एआई प्रणालियाँ विकसित हो सकेंगी और तकनीकी निर्भरता भी कम होगी। विश्व बैंक ने भी विकासशील देशों में स्थानीय आँकड़ों, कौशल, संगणना क्षमता और नवाचार के आधार को मजबूत करने की जरूरत बताई है।
अंत में यह समझना जरूरी है कि एआई का असली मूल्य केवल इस बात से तय नहीं होगा कि वह कितनी तेज या कितनी शक्तिशाली है। उसकी असली सफलता इस बात से तय होगी कि वह आम मनुष्य के जीवन को कितना बेहतर बनाती है। यदि एक गरीब देश का विद्यार्थी भी अच्छी शिक्षा में एआई की मदद ले सके, यदि किसान अपनी भाषा में उपयोगी जानकारी पा सके, यदि छोटा व्यापारी बड़े व्यापारियों की तरह आधुनिक तकनीक का इस्तेमाल कर सके और यदि किसी ग्रामीण नागरिक को केवल भाषा या पैसे की कमी के कारण एआई से वंचित न होना पड़े, तभी एआई की प्रगति को सही अर्थों में मानव प्रगति कहा जा सकेगा। इसलिए हमें ऐसी एआई व्यवस्था बनानी होगी जिसमें सस्ती पहुँच, बेहतर इंटरनेट, स्थानीय भाषाएँ, एआई शिक्षा, गोपनीयता, निष्पक्षता, पारदर्शिता और मानवीय नियंत्रण साथ-साथ चलें। एआई कुछ लोगों की शक्ति बढ़ाने वाली तकनीक बनने के बजाय पूरी मानवता की क्षमता बढ़ाने वाली तकनीक बने, यही उसके न्यायपूर्ण और सार्वभौमिक समावेशी भविष्य की सबसे बड़ी शर्त है।
डॉ. शैलेशशुक्ला | Dr. Shailesh Shukla
गृहमंत्रालय, भारतसरकारद्वारा'राजभाषागौरवपुरस्कार' सेसम्मानित | Honoured with the "Rajbhasha Gaurav Award" by the Ministry of Home Affairs, Government of India.
वैश्विकसमूहसंपादक, सृजनसंसारअंतरराष्ट्रीयपत्रिकासमूह | Global Group Editor, Srijan Sansar Group of International Journals
सलाहकारसंपादक, गौड़सन्सटाइम्स | Consulting Editor, GaurSons Times
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