लोकसंस्कृति की सुमधुर स्वर-साधिका :- डॉ. उषा श्रीवास्तव जी
नारी शक्ति का निर्माण ईश्वर ने बड़े ही फुर्सत से किया होगा तभी तो कुछेक नारी शक्ति वास्तव में अनमोल हैं। जिनका परिचय केवल उनकी उपलब्धियों से नहीं, बल्कि उनके व्यवहार, संवेदना और कर्म की सुगंध से है। डॉ. उषा श्रीवास्तव जी ऐसा ही एक प्रेरणादायी नारी शख्सियत हैं। साहित्य, लोककला, संस्कृति, भाषा और समाजसेवा के क्षेत्र में उनका निरंतर सक्रिय रहना उन्हें विशिष्ट बनाता है।
डॉ. उषा श्रीवास्तव जी का जन्म 28 जनवरी 1956 को सीतामढ़ी के नानी गाँव, थुम्मा में हुआ। उनके पिता श्री सत्यनारायण प्रसाद तथा पति श्री हरिशंकर प्रसाद हैं। गृह विज्ञान में स्नातकोत्तर शिक्षा प्राप्त करने वाली डॉ. उषा जी ने अपने जीवन को केवल नौकरी तक सीमित नहीं रखा, बल्कि साहित्य और लोकसंस्कृति की सेवा को भी अपने जीवन का महत्वपूर्ण उद्देश्य बनाया। बिहार सरकार की सेवानिवृत्त शिक्षिका होने के साथ-साथ वे साहित्यकार, संस्कृति कर्मी, समाजसेवी के रूप में भी अपनी सक्रिय भूमिका निभा रही हैं।
डॉ. उषा श्रीवास्तव जी की सबसे बड़ी विशेषताओं में से एक है- लोकसंस्कृति के प्रति उनका गहरा अनुराग। वे लोकगीतों को केवल मनोरंजन का साधन नहीं मानतीं, बल्कि उन्हें हमारी मिट्टी, परंपरा और सामूहिक यादों की धरोहर मानती हैं।
उनकी अपनी आवाज़ में गाए गए कजरी और लोकगीत जब मुझे फेसबुक प्लेटफॉर्म पर सुनने को मिलते हैं तो उनमें मुझे केवल संगीत नहीं, बल्कि मिट्टी की महक, जीवन की संवेदना और परंपरा की आत्मा महसूस होती है। वे इस प्रयास में निरंतर लगी हैं कि आने वाली पीढ़ी आधुनिकता की दौड़ में अपनी पारंपरिक लोकविरासत को न भूले और हमारी लोकसंस्कृति की संवेदना उसके भीतर जीवित रहे।
राज्य युवा महोत्सव और राष्ट्रीय युवा महोत्सव सहित अनेक अवसरों पर उन्होंने लोकगीत एवं लोकनृत्य की प्रस्तुतियों में समूह प्रमुख के रूप में विभिन्न राज्यों में बिहार की सांस्कृतिक पहचान को स्वर दिया है। स्वर्णिम कला केंद्र की स्थापना के माध्यम से भी वे लोककला को समर्पित अपना महत्वपूर्ण योगदान दे रही हैं।
डॉ. उषा जी की लेखनी हिंदी के साथ-साथ बज्जिका, मैथिली और भोजपुरी में भी सक्रिय है। उनकी प्रकाशित कृतियों में टुकड़ा-टुकड़ा एहसास, मंजुलिया, टुकड़ों में बंटी धूप, भारत की लोक भाषाएं, जन भाषाएं, पारंपरिक विवाह गीत, बज्जिका लोक मरजादा के गीत, बज्जिका के सोलह संस्कार गीत और छोटकी दुल्हिन जैसी रचनाएँ उल्लेखनीय हैं।
उनका साहित्य केवल कल्पना का संसार नहीं रचता, बल्कि लोकजीवन, नारी चेतना, भाषा, संस्कृति और समाज की वास्तविक तस्वीर भी प्रस्तुत करता है। पंचम विश्व हिंदी सम्मेलन, 1996 में उनके आलेख की स्वीकृति उनकी साहित्यिक यात्रा का महत्वपूर्ण पड़ाव रही।
डॉ. उषा श्रीवास्तव जी ने अनेक साहित्यिक एवं सांस्कृतिक संस्थाओं में महत्वपूर्ण दायित्व निभाए हैं। वे संस्कार भारती उत्तर बिहार की प्रांत मंत्री, विभिन्न राष्ट्रीय सांस्कृतिक मंचों की पदाधिकारी तथा अखिल भारतीय साहित्यिक आयोजनों की संयोजिका रही हैं। उन्होंने स्वर्णिम वसुंधरा जैसी नारी चेतना को समर्पित पत्रिका तथा बज्जिका जयंती जैसी भाषा-संस्कृति केंद्रित पत्रिका के संपादन के माध्यम से भी अपनी सक्रिय भूमिका निभाई है।
लोकसाहित्य और लोकसंस्कृति पर उनके अनेक आलेख विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुए हैं। उत्तर बिहार के लोकनृत्य, छठ, गंगा, सीता और बिहार की लोकपरंपराओं पर उनका लेखन उनकी सांस्कृतिक दृष्टि की व्यापकता को दर्शाता है।
डॉ. उषा श्रीवास्तव जी की साहित्यिक और सांस्कृतिक यात्रा अनेक राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय सम्मानों से अलंकृत है। साहित्य रश्मि सम्मान से लेकर साहित्य शिरोमणि, महादेवी वर्मा राष्ट्रीय शिखर सम्मान, सहोदरी रत्न सम्मान, कबीर कोहिनूर सम्मान, साहित्य साधना सम्मान, साहित्य सेवी मानद उपाधि, सारस्वत कर्मयोगी सम्मान, अटल रत्न सम्मान, बज्जिका साहित्य सम्मान और भारत-श्रीलंका हिंदी गौरव सम्मान जैसे अनेक सम्मान उनकी दीर्घ साहित्यिक-सांस्कृतिक साधना के साक्षी हैं।
लेकिन उनके व्यक्तित्व की सबसे सुंदर बात यह है कि सम्मानों की इतनी लंबी यात्रा के बावजूद उनके व्यवहार में कोई अहंकार नहीं दिखता है। उनकी वाणी की मिठास और व्यवहार की सरलता ही उनके व्यक्तित्व का सबसे अनमोल आभूषण है।
मेरी डॉ. उषा श्रीवास्तव माता श्री जी से पहली मुलाकात शंभु अगेही सम्मान समारोह, दरभंगा में हुई। पहली भेंट में ही उनके व्यक्तित्व ने मुझे प्रभावित किया। बाद में उनके फेसबुक पटल पर जब उन्हें अपनी सुमधुर आवाज़ में कजरी और लोकगीत गाते हुए देखा-सुना, तो उनके प्रति सम्मान और भी बढ़ गया।
मुझे लगा कि यह केवल गीत गाने का प्रयास नहीं है; यह अपनी जड़ों को बचाए रखने का एक सुंदर संकल्प है। आज जब नई पीढ़ी धीरे-धीरे अपनी लोकपरंपराओं से दूर होती जा रही है, तब डॉ. उषा माता श्री जी का यह प्रयास सचमुच प्रशंसनीय और अनुकरणीय है।
उम्र की जिस दहलीज पर अधिकांश लोग अपनी कलम को विश्राम दे देते हैं, उस पड़ाव पर भी डॉ. उषा श्रीवास्तव माता श्री जी की साहित्य और संस्कृति के प्रति सक्रियता अत्यंत प्रेरणादायी है। उनका जीवन यह संदेश देता है कि सृजन की कोई उम्र नहीं होती और संस्कृति की सेवा के लिए कभी अवकाश नहीं होता।
ऐसे व्यक्तित्व पर कुछ शब्द लिखना मेरे लिए केवल लेखन करना ही नहीं, बल्कि आत्मिक सम्मान का विषय है। मैं स्वयं को कृतार्थ अनुभव कर रहा हूँ कि मुझे डॉ. उषा श्रीवास्तव माता श्री जी जैसे लोकसंस्कृति की सजग प्रहरी, साहित्य की साधिका और मधुर व्यवहार की धनी व्यक्तित्व के बारे में कुछ लिखने का अवसर मिला।
इनके व्यक्तित्व पर चंद पंक्तियां लिखना चाहूंगा कि --
जिन्होंने लोकधुनों को दिल से सँवारा है,
बज्जिका को अपने शब्दों में उतारा है।
उषा जी का सृजन सिर्फ लेखन नहीं,
यह अपनी मिट्टी से प्रेम का उजियारा है।
कजरी की तान में सावन बोलता है,
लोकगीतों में अपना गाँव बोलता है।
उषा जी जब स्वर देती हैं परंपरा को,
हर गीत में बिहार का मन डोलता है।
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