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नरेन से विवेकानंद

 

नरेन से विवेकानंद 


डॉ उषा श्रीवास्तव 


स्वामी विवेकानंद का बचपन का नाम था - *नरेंद्रनाथ दत्त*। सब उन्हें प्यार से *नरेन* कहते थे। उनका  जन्म 12 जनवरी 1863, कलकत्ता (अब कोलकाता) में। पिता विश्वनाथ दत्त बड़े वकील थे, माता भुवनेश्वरी देवी बहुत धार्मिक थीं।नरेन बहुत शरारती था। घर में दो-दो नौकर उसे संभाल नहीं पाते थे। पर शरारत में भी दया थी।एक बार की बात है। नरेन के पिता ने उसे नया कपड़ा पहनाया। नरेन बाहर खेलने गया। देखा - एक गरीब बच्चा ठंड से कांप रहा है। नरेन ने तुरंत अपना नया कुर्ता उतार कर उसे दे दिया। घर आया तो सिर्फ बनियान में।माँ ने डाँटा - "नया कुर्ता कहाँ गया?"नरेन बोला - "माँ, वह बच्चा भगवान था। भगवान ठंड में कांप रहे थे, तो मैंने दे दिया।"

माँ की आँखों में आँसू आ गए। यही था उसका बाल-हृदय

नरेन को खेल-खेल में ही ध्यान लग जाता था।उसके दोस्त थे - एक बार वे सब मिल कर ध्यान का खेल खेल रहे थे। सब आँख बंद करके बैठे। थोड़ी देर में एक सांप निकला। सब बच्चे चिल्ला कर भाग गए। पर नरेन आँख बंद किए बैठा रहा। उसे पता ही नहीं चला कि सांप आया था।

माँ कहती थीं - "मेरा नरेन तो बचपन से ही शिव है!"

घर में एक कमरे में वे रोज शाम को ध्यान करते। माँ ने बताया था - रोज सोने से पहले ईश्वर को याद करो।

नरेन जैसा सवाल पूछने वाला बच्चा कोई नहीं था।वह हर बात पर पूछता - "यह ऐसा क्यों है?"एक बार पिता के एक मुवक्किल आए, बहुत बड़े आदमी। पिता ने कहा - "इनके सामने शरारत मत करना।"नरेन ने पूछा - "क्यों? क्या ये भगवान से भी बड़े हैं?"पिता चुप हो गए। नरेन के मन में बचपन से ही था - *सब मनुष्य बराबर हैं, कोई छोटा-बड़ा नहीं।*

इसी सवाल ने उसे बाद में बनाया - जिसने पूछा - "क्या आपने भगवान को देखा है?" यही सवाल वह रामकृष्ण परमहंस के पास ले गया।नरेन को डर नाम की चीज़ पता ही नहीं थी।एक बार अंग्रेज घोड़े पर जा रहा था। गली के बच्चे डर के भाग गए। नरेन बीच सड़क पर खड़ा रहा। अंग्रेज ने घोड़ा उसके पास ला दिया। नरेन ने आँखों में आँख डाल कर देखा। अंग्रेज को ही हटना पड़ा।वह कहता था - "डर ही सबसे बड़ा पाप है!"नरेन पढ़ाई में बहुत तेज था। एक बार जो पढ़ लेता, याद हो जाता। पर वह सिर्फ किताबी कीड़ा नहीं था। घुड़सवारी, तैराकी, कुश्ती, गाना-बजाना - सब आता था।उसकी आवाज बहुत मीठी थी। वह भजन गाता तो सब मंत्रमुग्ध हो जाते।अपना टिफिन, किताब, पेंसिल - जो हो सके बाँटो।ऐसा क्यों?" पूछने से ही ज्ञान बढ़ता है। सच बोलने में डरो मत।रोज 5 मिनट आँख बंद करके बैठो - मन शांत होगा  ।कोई छोटा-बड़ा नहीं, सब भारत माता के बच्चे।विवेकानंद ने कहा था - "उठो, जागो और तब तक मत रुको जब तक लक्ष्य न प्राप्त हो जाए।"

> यह लक्ष्य उन्होंने बचपन में ही बना लिया था ।

 


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