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''लोक-भाषा और राष्ट्रीय आन्दोलन"

 

''लोक-भाषा और राष्ट्रीय आन्दोलन"


डॉ उषा श्रीवास्तव


जब अंग्रेज कहते थे - "भारत एक देश नहीं, भाषाओं का अजायबघर है", तब हमारे नेताओं ने उसी भाषा को हथियार बनाया।

       लोक-भाषा का अर्थ है - जनता की भाषा। जो घर में, खेत में, हाट में बोली जाती है। जैसे - बज्जिका, भोजपुरी, मैथिली, अवधी, ब्रज, राजस्थानी। देश में बोली जाने वाली सभी भाषाएं।राष्ट्रीय आन्दोलन का अर्थ है - देश को आजाद कराने की लड़ाई।क्या भाषा भी आजादी दिला सकती है? हाँ, और सबसे ज्यादा उसी ने दिलाई।

अंग्रेजों ने 1835 में मैकाले की शिक्षा नीति लागू की। उन्होंने कहा - अंग्रेजी पढ़ो, बाकी भाषाएं गँवारू हैं।उनका उद्देश्य था:- भारतीयों को अपनी ही भाषा से शर्म आने लगे - गाँव और शहर के बीच दीवार बन जाए - वकील, बाबू अंग्रेजी में बोलें, किसान समझे ही नहीं।पर हुआ उल्टा।

हमारे नेताओं ने समझ लिया - दिल्ली के अंग्रेज को हराना है तो गाँव की भाषा में जाना होगा।

गाँधी जी गुजराती में बोलते थे, हिन्दी में लिखते थे, पर हर जगह लोक-भाषा का सम्मान करते थे। 1917 में चम्पारण आए तो उन्होंने बज्जिका-भोजपुरी में किसानों से बात की। नील आन्दोलन में भोजपुरी गीत ही नारा बन गया -

> "फिरंगिया के राज में, दुखवा अपार बा"

गाँधी जी ने कहा था - "अगर स्वराज पाना है तो अपनी भाषा में पाओ।"

 बज्जिका-भोजपुरी-मैथिली का योगदान  महत्वपूर्ण है।

मुजफ्फरपुर, चम्पारण, सारण - इसी तिरहुत-भोजपुर में आन्दोलन सबसे तेज था। औरतें जाँता-चक्की पर गातीं - "बृटिश राज के हटावे के बा"

*भिखारी ठाकुर* ने बिदेसिया नाटक से लोगों को जगाया - परदेश गए पति की कहानी में अंग्रेजी राज का दर्द था।- *राहुल सांकृत्यायन* ने भोजपुरी में किसानों को ललकारा।जब क्रांतिकारी पर्चा बाँटते थे तो अंग्रेजी में नहीं, लोक-भाषा में लिखते थे ताकि अनपढ़ भी समझ ले।

सभी लोक-भाषाओं को जोड़ने के लिए हिन्दी बनी। 1885 में कांग्रेस बनी, 1920 में हिन्दी उसका मंच बनी।- बाल गंगाधर तिलक ने कहा - "हिन्दी राष्ट्रभाषा बने- *भारतेन्दु हरिश्चन्द्र* ने लिखा - "निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल- *सुभद्रा कुमारी चौहान* की कविता - "बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी" - यह बुंदेलखंडी लोक-भाषा की ही ताकत थी। मुजफ्फरपुर का उदाहरण आपके अपने मुजफ्फरपुर ने इसमें बड़ी भूमिका निभाई।1857 में जब मंगल पांडे बक्सर से चले, तो तिरहुत में बज्जिका में संदेश गया - "गोरा भागे लागल।"खुदीराम बोस जब मुजफ्फरपुर में बम फेंकने आए, तो उन्हें शरण किसने दी? बज्जिका बोलने वाले आम लोगों ने। अदालत में जब खुदीराम से पूछा गया - "तुमने बम क्यों फेंका?" तो उन्होंने बंगला में नहीं, हिन्दी-भोजपुरी मिली भाषा में कहा - "देश के लिए।"

जगदीश नारायण मंडल जैसे गोड्डा-मुजफ्फरपुर के नेता गाँव-गाँव बज्जिका में ही भाषण देते थे - "अंग्रेज भगावे के हए।"

आजादी मिल गई, पर लड़ाई खत्म नहीं हुई। आज लड़ाई है - अपनी भाषा बचाने की।

आज अंग्रेजी फिर से हावी है। बच्चा कहता है - "मम्मी, वॉटर दो।" पानी नहीं कहता।

तो हमें फिर से लोक-भाषा को हथियार बनाना होगा। आन्दोलन में लोक-भाषा ने देश बचाया, वैसे आज संस्कृति बचाएगी *राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020* में कहा गया है - प्राथमिक शिक्षा मातृभाषा में हो। यह उसी आन्दोलन की जीत है।

लोक-भाषा केवल शब्द नहीं, जनता की आत्मा है। राष्ट्रीय आन्दोलन ने दिखा दिया - जब आत्मा जागती है, तब साम्राज्य गिरते हैं।

अंग्रेजों के पास बंदूक थी, हमारे पास बोली थी। और बोली जीत गईं।


> *"भाषा गई तो संस्कृति गई, संस्कृति गई तो देश गया।*

 


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