Swargvibha
Dr. Srimati Tara Singh
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हमारी सांस्कृतिक विरासत

 

हमारी सांस्कृतिक विरासत*


हमारी सांस्कृतिक विरासत अनुपम , उत्तम , उल्लेखनीय , प्रशंसनीय एवं देश की  अमूल्य धरोहर है । भारत  की सांस्कृतिक विरासत में एक ऐसा आकर्षण है जिसे  देख कर हर अनजान व्यक्ति  सम्मोहित हो जाता है ।  सांस्कृतिक विरासत का जादुई प्रभाव भारतीय लोगों के साथ - साथ विदेशियों पर भी पड़ता है। वे सभी इस सांस्कृतिक विरासत को देखने के लिए खिंचे चले आते हैं । हमारे देश में दो प्रकार की सांस्कृतिक विरासत देखने को मिलती है एक मूर्त और दूसरी अमूर्त। हमारे देश की मूर्त सांस्कृतिक विरासत सदियाॅं बीत जाने पर भी आज तक उनका आकर्षण ज्यों का त्यों कायम है । ये वे भौतिक वस्तुऍं या चर्चित स्थान हैं जिन्हें हम देख और छू भी सकते हैं । प्राचीन काल में बनी इमारतें और स्मारक जैसे - आगरा का ताज महल , दिल्ली की कुतुब मीनार , जामा मस्जिद  एवं लाल किला , जयपुर का हवा महल , हैदराबाद की चार मीनार  ,  आदि  इतिहास के प्रामाणिक  साक्ष्य हैं ।  देवी - देवताओं के प्राचीन भव्य मंदिर जैसे - तिरुपति बालाजी , केदारनाथ,  काशी विश्वनाथ , बद्रीनाथ , वैष्णो देवी , रामेश्वरम्  , मीनाक्षी मंदिर ,  सोमनाथ ,  जगन्नाथ ,  कोणार्क सूर्य मंदिर, कामाख्या ,  द्वारिका , स्वर्ण मंदिर और सारनाथ व सांची के स्तूप आदि हमारी धार्मिक और आध्यात्मिक आस्था के प्रतीक हैं । बहुत सी ऐतिहासिक वस्तुऍं जैसे - रथ ,  घोड़ा गाड़ी , बैल गाड़ी , विमान , कोयले से चलने वाले भाप के इंजन आदि  धरोहर है । चांदी , तांबा, तथा अन्य धातुओं के पुराने सिक्के , बर्तन , आभूषण , शिकार  व लड़ाई के अनेक प्रकार के हथियार और पांडुलिपियांँ आदि सभी सांस्कृतिक विरासत के अद्भुत प्रतीक हैं। पुरानी कलाकृतियां   , मूर्तियां ,  चित्रकारी और शिल्पकला आदि भी दक्षिण भारत के अनेक मंदिरों में स्थापित हैं तथा खजुराहो , सारनाथ, अजंता एलोरा की गुफाएं  भित्तिचित्रों और कलाकृतियों के लिए विशेष आकर्षण बनाए हुए है ।

 जहाॅं तक अमूर्त सांस्कृतिक विरासत की बात है ये तो वास्तव में  सराहनीय और प्रशंसनीय  है । ये हमारे समाज की वे जीवंत परंपराएं और ज्ञान हैं जिन्हें छुआ नहीं जा सकता, लेकिन अनुभव और आभास किया जा सकता है । इसमें मौखिक परंपराऍं , लोक कथाऍं  ,  भाषाऍं ,  बोलियाॅं और मुहावरे शामिल हैं । प्रदर्शन कलाऍं ,  शास्त्रीय नृत्य (जैसे कत्थक, भरतनाट्यम ), लोक संगीत और नाटक। सामाजिक प्रथाएंँ , तीज त्योहार जैसे - दिवाली , होली , कुंभ मेला , शादी-विवाह की रस्में और स्थानीय मेले। सूरजकुंड का क्राफ्ट मेला जहाॅं पारंपरिक कलाकारों को लोक नर्तकों  , संगीतकारों ,  हस्त शिल्पियों , बुनकरों आदि के हुनर के प्रदर्शन का एक विशाल समृद्ध मंच बनाया गया है । पारंपरिक ज्ञान में आयुर्वेद , योग , हस्तशिल्प बनाने का हुनर और पारंपरिक व्यंजन अमूर्त सांस्कृतिक विरासत के विभिन्न आयाम हैं । इनकी खूबसूरती , पहचान पर  हमें गर्व है । यह हमें बताती है कि हमारी जड़ें कहाॅं तक हैं और हमें अपने  अस्तित्व की पहचान का बोध कराती है। सामाजिक एकता भी  लोगों को साझा मूल्यों, त्योहारों और परंपराओं के जरिए एक सूत्र में बांधती है। आर्थिक विकास की दृष्टि से यदि आकलन किया जाए तो हमारे ऐतिहासिक स्थल और सांस्कृतिक उत्सव पर्यटन (Tourism) को बढ़ावा देते हैं, जिससे स्थानीय लोगों को रोजगार मिलता है।

        संयुक्त राष्ट्र शैक्षणिक , वैज्ञानिक एवं सांस्कृतिक संगठन ( यूनेस्को ) ने दुनिया भर की महत्त्वपूर्ण सांस्कृतिक विरासतों को संरक्षित करने के लिए उन्हें *विश्व धरोहर स्थल* घोषित करता है। इसमें भारत के 44 स्थल यूनेस्को विश्व धरोहर में शामिल हैं जिनमें 36 सांस्कृतिक और सात प्राकृतिक हैं । सांस्कृतिक में ताजमहल , आगरा का किला , अजंता एलोरा की गुफाएं , सांची के बौद्ध स्तूप , हंपी के स्मारक ,  कोणार्क सूर्य मंदिर ,  शांति निकेतन , फतेहपुर सीकरी , खजुराहो , हुमायूं का मकबरा , कुतुब मीनार , लाल किला,  जंतर मंतर , नालंदा, जयपुर , अहमदाबाद , चंडीगढ़ ,  दिल्ली आदि शामिल हैं । प्राकृतिक स्थलों में काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान , सुंदरबन , पश्चिम घाट , केवलादेव ,  ग्रेट हिमालयन खंड , खंगचेंदजोंगा राष्ट्रीय उद्यान प्राकृतिक और सांस्कृतिक दोनों रूपों में महत्त्वपूर्ण माना गया है । हमारी सांस्कृतिक विरासत हमारी पहचान , इतिहास और परंपराओं का अमूल्य प्रतीक है। इसे सुरक्षित और संरक्षित रखना हर नागरिक और समाज का कर्तव्य है। 

  हमारी सांस्कृतिक धरोहरों को स्कूली पाठ्यक्रम और उच्च शिक्षा पाठ्यक्रम में समाविष्ट किया गया है ताकि विद्यार्थी स्थानीय और राष्ट्रीय इतिहास की सांस्कृतिक धरोहरों के प्रति आकर्षित रहें । सांस्कृतिक धरोहर यात्राऍं छात्रों और युवाओं में  नव चेतना , उत्साह एवं  ज्ञान का संचार करती हैं जिससे वे अपनी धरोहरों से जुड़ाव महसूस कर सकें। आज के युग में  आवश्यकता है कि प्राचीन पांडुलिपियों , दुर्लभ पुस्तकों , लोक गीतों और ऐतिहासिक *दस्तावेजों का डिजिटलीकरण*  किया जाए ताकि वे हमेशा के लिए सुरक्षित व संरक्षित हो जाएंँ। भारतीय पुरातत्त्व सर्वेक्षण विभाग और स्थानीय निकायों की ये जिम्मेदारी है कि हमारी सांस्कृतिक विरासत को बचाए रखें  । किसी भी धरोहर की रक्षा तब तक नहीं हो सकती जब तक उसके आसपास रहने वाले लोग जागरूक न हों। स्थानीय लोगों को धरोहरों के संरक्षण और *पर्यटन से जोड़कर रोजगार*  देना चाहिए। हमारी सांस्कृतिक विरासत केवल अतीत की धरोहर नहीं है , बल्कि भविष्य की नींव भी है। 

समय-समय पर विद्यार्थियों के लिए अन्तर्देशीय भ्रमणकारी आयोजन इस दिशा में प्रभावकारी सिद्ध हो सकते हैं।

प्रशासनिक इच्छाशक्ति , आधुनिक तकनीक और आम जनता के निरंतर सहयोग से ही हम हमारी सांस्कृतिक विरासत को आने वाली पीढ़ियों के लिए सुरक्षित रख सकते हैं।


       - डॉ. त्रिलोक चंद फतेहपुरी

             अटेली , महेन्द्रगढ़,  हरियाणा ।

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