उस दर्पण में स्वयं को देखो जब,
पल में दिख जाएँ चेहरे के दाग सब।
ऐसे ही यह सच्चे मन का दर्पण है निमित्त ,
दिखने दाग हमारे व्यक्तित्व में निहित।
जैसे वह दर्पण कुरूपता नहीं छुपा पाता,
इस दर्पण में भी हर विकार दिख ही जाता।
उस दर्पण को बाज़ार से खरीदा है जाता,
यह दर्पण तो हर मनुष्य में पाया जाता।
उस दर्पण पर जमी धूल से मानव स्वयं को न देख पाये,
इस दर्पण पर भी विकारों की धूल जाम जाये।
हटा दो इस धूल को दर्पण से अगर,
उभरता है स्वच्छ व्यक्तित्व तब दमककर।
वह दर्पण तो टूट भी है जाता,
स्वच्छ मन के दर्पण को कोई न तोड़ पाता।
उस कुरूपता को नहीं सकते बदल,
पर विकारों को हटाने में सभी हैं सबल।
आवश्यक है तो केवल मेहनत करना,
फिर है सबकी केवल प्रशंसा बटोरना।
इसलिए रखो अपने मन का दर्पण साफ सदा ,
विकारों की धूल को कहो सदा के लिए अलविदा।
डॉ टिंपल सुघन्ध।
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