दहाड़ उठता है, विवश माँ का हृदय
हे माँ देवी कैलासिनी
जगत जननी कल्याणी
तुम हो सारे जगत की माता
मैं निज बेटे की हतभागिन जननी
माँ तुमको मालूम है, जिसके लिए मैं
तुमसे करूणा की भीख मांगने आई हूँ
वह कोई अपराधी नहीं, मेरा अंश है
मेरे जीने का अभिप्राय है,बुढ़ापे की लाठी है
झुकी और कमजोर अस्थियों की शक्ति है
मेरे सुत के तन से मधुर भाव छलकता है
अमृत से भरा वह प्याला है
जिसे चूम – चूम कर मैं जीती हूँ
इसलिए मेरी प्रार्थना, तुम स्वीकार करो
और मेरे सुत को मंगलमय वरदान दो
मेरा बेटा स्वभाव का बड़ा ही मीठा है
दुख के करुवेपन सह नहीं सकता है
मेरे आँगन का चाँद है, अँधेरे का उजाला है
सुबह की उषा किरण की तरह सुखदायी है
ओस कण की तरह प्यारा और मनमोहक है
तुम्हारे सिवा , इस लोक में मेरा कौन है माता
तुम भलीभांती जानती हो, इस दुनिया में
केवल माँ बन जाने से ममत्व पूरा नहीं हो जाता
इसलिए विनती है, मेरे सुत का मंगलमय कर दो जीवन
बदले में तुम ले लो मेरा, कोई भी स्वर्णिम क्षण
मुझको मेरा सुख तृणवत लगता है
मैं कैसे देखूँ, पुत्र का व्यथित मन
रुपया- पैसा, सोना- चाँदी मेरे किस काम का
यह सब तो है माटी धन
तुम लौटा दो मेरे पुत्र का मधुमय जीवन
जब देखती हूँ अपने सुत को उदास
बज्रयान टूट पड़ता है मेरे कलेजे पर
दहाड़ उठता है, विवश माँ का हृदय
किसी जख्मी शेरनी की तरह
कब तक बेटे को रुग्ण और उदास देखूँ
कब तक अपने ही तन का लहू
निचोड़ - निचोड़ कर पीती रहूँ
माता भर दो उसके हृदय में सुख-विभुता
और मंगलमय कर दो जीवन उसका
तुम प्रकाश की महासिंधु हो
थोडी रोशनी मेरे सुत को भी दे दो
तुम्हारे मन की ये कैसी दुबिधा
कि देवी होकर भी मेरे पुत्र का
मधुमय जीवन लौटाने से हिचक रही हो
तुम मेरी तरह असहाय नारी नहीं हो
तुम महाशक्ति की देवी हो
फिर क्यों नहीं, मेरे सुत के दुख – दर्द
के गरल को अमृत समझ पी लेती हो
और अपना प्रेम- पीयूष बरसाकर
उसके तन-मन को शीतल कर देती हो
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