वही पुरानी लीक, वही कसौटी
सूरज , चाँद , तारे , आसमाँ , जमीं
सब हैं अपनी जगह , सब हैं वहीं
फ़िर मनुज जीवन का शैशव -यौवन
जीवन - मरण से क्यों है दोलित
क्यों नहीं मनुज की,आशा और अभिलाषा
उसके पदचापों से होकर कंपित
मन आकार ग्रहण कर रहती जीवित
क्यों मनुज प्रणों के लघु जलकण में
क्षण में महाकाल हो उठता कलवित
सृष्टि पहले तो जग अंधकार को हरने
स्वर्ग की अमर किरण धरती को प्रदान करती
बाद महानाश में उसे कर देती सम्मिलित
सृष्टि का यह लौकिक ’औ’ अलौकिक कला
पृथ्वी पर आरम्भ काल से चलती आ रही
इसमें न परिवर्तन आया कभी जरा भी
वही पुरानी लीक , वही जर्जर कसौटी जिस
पर चलकर प्रकृति का विश्लेषण बन ’नाश’
अनन्त काल से इस जन - धरणी पर
प्रकृति के काम-काज में रहता रहा सम्मिलित
मनुज भू पर जिस रोज उतरता
उसके पहले की धरी पीर उसे मिलती
सृष्टि कहती ,पंचतंत्र के सपूत, मत कर
अपना मन मैला, यह शरीर तुम्हारा
अधिक समय तक भस्मावृत होकर
नहीं है रहनेवाला,देखना एक दिन तुम
अपने ही भष्मशेष से हो उठोगे जीवित
अभी तुम चलकर गंगा स्नान कर लो
तुमको नव वस्त्रों से करना है विभूषित
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