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Dr. Srimati Tara Singh
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सूरदास

 

सूरदास

                                          -----डॉ० श्रीमती तारा सिंह


                    प्रमाणिक ग्रंथों के मतानुसार कृष्णभक्त सूरदास का जन्म 1535  में बैशाख शुक्ल पंचमी को हुआ था । कुछ लोगों का मानना है कि इनका जन्म रेणुका क्षेत्र में हुआ था, मगर कुछ विद्वानों के अनुसार इनका जन्म हरियाणा में स्थित बल्लभगढ़ के पास सोही या सीही ग्राम में हुआ था । अकबरकालीन फ़ारसी इतिहासों से पता चलता है कि उस समय कई सूरदास नामधारी कवि हुए , पर वे प्रसिद्ध सूरदास से भिन्न थे । वे ब्रजभाषा के प्रथम कवि थे । वे जाति के ब्राह्मण थे, लोग इन्हें जन्मान्ध मानते हैं लेकिन क्या सचमुच के वे जन्मांध थे या नहीं, सठीक प्रमाण कहीं से नहीं मिलता । कुछ इतिहासकारों का मानना है कि अगर वे जन्मांध होते,तो रूप-दर्शन , रंगों आदि का सजीव ,साकार वर्णन नहीं कर पाते । इसलिए हो सकता है, कि जन्म के कुछ वर्षों बाद किसी चक्षु रोग में वे अंधे हुए हों ।

                  वे अपने गाँव सीही से मात्र 18 वर्ष की आयु में मथुरा के विश्रामघाट आ गये । मगर कुछ दिनों बाद ही उस स्थान को छोड़कर यमुना तट पर गऊ घाट आकर रहने लगे । चौरासी वैष्णवन की वार्ता के अनुसार इस कृष्ण भक्त, अंधे कवि को बल्लभाचार्य ,जो भारत दर्शन कर भक्ति का प्रचार किया करते थे, ने ही पुष्टि मार्ग में दीक्षित कर, इन्हें दास्य-भाव से छुड़ाकर , कृष्ण की मधुर लीलाओं का रस चखाया । उन्होंने ही उन्हें कृष्ण बाल-लीला की रचना करने सुझाया और जब एक दिन निज रचित विनय के पद बल्लभाचार्य को सुनाये, तो वे अति प्रसन्न हो गये और सूरदास को गोवर्धन में ले जाकर श्रीनाथमंदिर में कीर्तन का मुखिया बना दिये । बाद में बल्लभाचार्य के बेटे बिट्ठलदास ने सूरदास को अष्टछाप के कवियों में मुख्य स्थान दिया । आज सूरदास जी समूची कृष्णभक्ति शाखा का प्रतिनिधित्व करते हैं ।

                   सूरदास की तीन रचनाएँ प्रसिद्ध हैं, सूरसागर, सूरसारावली और साहित्य लहरी ; लेकिन इनकी कृति का मुख्य आधार सूरसागर है । यह ग्रंथ श्रीमद्भागवत ग्रंथ के दशम स्कन्ध के आधार पर रचा गया एक स्वतंत्र काव्य है । सूरदास ने लगभग एक लाख पद्यों की रचना की । सूरसागर में ही उनके एक लाख पद मिलते हैं । सूरसागर कृष्ण लीला का एक विशाल संग्रह है; प्राय: उनके सभी पदों में उनका छाप देखने मिलता है और सूरसागर ही उनका प्रमाणिक ग्रंथ भी है । साहित्य लहरी और सूरसागर सारावली प्रमाणिक नहीं जान पड़ते । 

                 सूरदास वास्तव रस के प्रतिमूर्ति थे । वात्सल्य का इतना श्रेष्ठ कवि संसार में दूसरा नहीं हुआ । भाषा की कोमलता, सरसता तथा मधुरता की दृष्टि में सूरदास , अपने उपनाम आप हैं । उन्होंने कृष्ण का बाल रूप कुछ इस प्रकार वर्णन किया -------

’ हरि  अपने  आँगन  कछु  गावत

                  तनक-तनक चरननि सौ नाचत, मनहीं-मनहीं रिझावत

                  बाँह उठाई काजरी-धौरी गैयनि टेरी बुलावत

                  कबहुँक बाबा नंद बुलाबत, कबहुँक घर में आवत

                  माखन  तनक  आपने  कर  लै, मैं  नावत

                  दूरि देखति जसुमति यह लीला, हरष आनंद बढ़ावत

                  सूरश्याम के बाल-चरित, नित-नित ही देखत भावत यही ।’

यही कारण है, कि प्राचीण काव्यमर्मग्यों ने, सूर-सूर, तुलसी-शशि की उक्ति द्वारा सूरदास को काव्याकाश का सूर्य कहकर उन्हें गौरव दिया है । जिन लोगों ने सूर को तुलसी से श्रेष्ठ माना, वे काव्य को शुद्ध काव्य की कसौटी पर नहीं परखते । वे काव्य में शिवत्व को, लोक-कल्याण को , धर्म और नीति को ही कदाचित अधिक महत्व देते हैं । ऐसे तो ’अष्टछाप’ कृष्ण भक्त कवियों के अलावा भी अनेक बड़े-बड़े कवि हो चुके हैं । तुलसी दास रामभक्ति धारा के सर्वश्रेष्ट कवि हैं , पर उनके पीछे किसी संगठन का बल नहीं था । उस समय राम –भक्ति के संगठन की पृष्ठभूमि में बल्लभाचार्य जैसे कोई महापुरुष नहीं थे । अत: सूर और तुलसी में कौन बड़े हैं, इस बात पर निर्भर करता है कि काव्य-मंदिर में सुन्दरतम को प्रतिष्ठित किया जाय या ’शिवम’ को । हिन्दी के तीन दास कवि : कबीरदास, तुलसीदास और सूरदास , सत्यम, शिवम, सुन्दरम के कवि हैं । हिंदी मंदिर की ये त्रिमूर्ति नित्य वंदनीय हैं । 

                 सूरदास ब्रजभाषा के राष्ट्रकवि हैं  । इनके समान , सुंदर, स्वभाविक और चलती हुई ब्रजभाषा, एक दो कवियों में ही देखने मिलती है । इनकी भाषा में प्रवाह तथा स्वभाविकता जैसी भाषा, रसखान को छोड़़कर और किसी में नहीं मिलती । सूर की कविता का एक और गुण यह है कि इनकी कविताएँ विशेष हृदयस्पर्शी और भावभरी होती हैं । यही कारण है ,कि इनकी कविताएँ पढ़ते या सुनते , हृदय के मन के आगे, आँखों के सामने चित्र पूर्णतया साकार हो जाते हैं । इसीलिए इनकी रचनाओं को हिंदी साहित्य का अमूल्य रत्न माना गया है । 

                  इस महाकवि का ’गोलोकवास’ सन 1564 पारासोली में हुआ ।  यह दोहा इनके सम्मानार्थ सर्वथा है --------------

              ’किधौं सूर के सर लग्यों, किधौं सूर की पीर

              किधौं सूर के पद लग्यों, बेध्यो सकल शरीर ’ ॥

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