पश्चिमी सभ्यता का बुखार
कभी गांधी जी ने कहा था,’हमें अँग्रेजों से कोई शिकायत नहीं । मगर उनकी अँग्रेजियत से हमें नफ़रत है ।’ इसीलिए हमारे देश में कोई अँग्रेज अगर रहना चाहे तो रहे, मगर उसकी अँग्रेजियत को रहने नहीं दी जायेगी । गांधी जी भविष्य – चिन्तक थे । शायद इसीलिए उन्होंने ऐसा कहा होगा । आज हमारे देश से अँग्रेज तो चले गये मगर अँग्रेजियत धीरे – धीरे हमारे देश में फ़िर से पावँ जमाने लगा । लोग बात – बात में ’सौरी’,”थैंक यू’ जैसे लब्जों का बिना कुछ सोचे – समझे व्यवहार करने लगे । हिन्दी में बातें करना अपने व्यक्तित्व के खिलाफ़ समझने लगे ।
कल मुम्बई से दिल्ली जाने के दौरान राजधानी एक्सप्रेस में ऐसे ही एक देशी अँग्रेज से हमारी भेंट हो गई । रात के करीब दश बज रहे थे ।सभी यात्री रात का खाना खाकर अपने- अपने सीट पर सोने की तैयारी कर रहे थे । मैं नीचे की सीट पर लेटी हुई थी । मेरे बराबर के सीट पर एक बुजुर्ग करीब अस्सी साल के रहे होंगे, लेटे हुए थे । ऊपर की सीट पर एक नौजवान जूता सहित सोने चला गया । कुछ देर तक वे कुछ पत्रिकाएँ या अँग्रेजी उपन्यास क्या था मैं भली भाँति देख तो नहीं सकी, लेकिन कुछ तो वे पढ़ रहे थे । जब रात के बारह बजे, तब अचानक उन्होंने ऊपर से उस बुजुर्ग को आवाज लगाई,’ हेलो, हेलो ! बुजुर्ग , जो गहरी नीद में उस वक्त सो रहे थे । घबराते हुए उठे ।ऊपर की तरफ़ मुँह उठाकर पूछा,’ बॆटा ! क्या तुम मुझसे कुछ कह रहे हो ?’ नवयुवक ने अपने पाँव के जूते बढ़ाते हुए कहा,’ प्लीज़ आंकल ! इसे नीचे सीट के भीतर रख दो ।’ बुजुर्ग , बिना कुछ बोले, उसके जूते को सीट के नीचे रख दिया; फ़िर आवाज आई ,’थैंक यू, अंकल’ । वह बुजुर्ग मुसकुराया और सो गय । यह सब देखकर मुझे ऐसा ही लगा कि पश्चिमी सभ्यता हमें कहाँ ले आयी । एक तो जिसे खुद सहायता की आवश्यकता है, उससे काम करवाया । वह भी पावँ के जूते को पकड़ने का ! बाद फ़िर , ’थैंक यू अंकल’ कहकर उसके एह्सान का बदला चुकाया। क्या यही कहती है ,हमारी भारतीय सभ्यता ? जिस किसी से भी, कोई काम करवा लो । बदले में अँग्रेजी का पानी चढ़ाया दो बोल, बोल दो ।, ताकि उसे सुनकर सहायता करनेवाला यह सोंचे,’ मुझे अँग्रेजीमें धन्यवाद देकर सचमुच मेरा जीवन ताड़ दिया । धिक्कर है ऐसे धन्यवाद के लब्जों को, जिन्हें यह भी नहीं पता, कि इसे कहाँ व्यवहारकरना चाहिए ?
शायद ऐसा बेहूदा और शर्मनाक व्यवहार अँग्रेज भी अपने बुजुर्गों के साथ नहीं करते होंगे । लेकिन हमारे देश के देशी अँग्रेज , अँग्रेजों से भी आगे निकल आये ।
मैं तो ऐसे अँग्रेज से उसकी अँग्रेजियत को ज्यादा पसंद करूँगी । ईश्वर ही हमारे समाज कीअब रक्षाकर सकते हैं अन्यथा कुछ लोगों ने तो उसे बर्वाद करने की ठान ही रखी है ।
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